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अहिल्याबाई घाट

Varanasi, UP

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सत्यापित · पिछली समीक्षा 5 महीने पहले

अहिल्याबाई घाट काशी के तट के मध्य भाग में बसा पत्थर का स्नान-घाट है, जिसे वर्तमान रूप इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर के संरक्षण में मिला — वही संरक्षण जिसने 1780 में काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। धरोहर-अभिलेखों में इसका पुराना नाम केवलगिरि घाट दर्ज है। मुंशी घाट और शीतला घाट के बीच, दशाश्वमेध से थोड़ा ऊपर — यहाँ आज भी स्नान, संकल्प और तर्पण की वही रोज़ की लय चलती है।

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अहिल्याबाई घाट काशी के तट पर चौरासी घाटों की परंपरागत गिनती में उनतालीसवाँ घाट है। ऊपर की ओर मुंशी घाट, नीचे की ओर शीतला घाट — यानी दशाश्वमेध से थोड़ी ही दूरी पर — भीड़ इतनी पास है कि यात्री यहाँ भी उतर आते हैं।

घाट का नाम इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर (1725–1795) का दिया हुआ है। वाराणसी के तट के धरोहर-प्रलेखन में लिखा है कि 1778 से 1785 के बीच उन्हीं के संरक्षण में यह घाट बढ़ाया गया और पूरी तरह नए सिरे से बनवाया गया; इससे पहले इसे केवलगिरि घाट कहा जाता था। सीढ़ियों के ऊपर उनका बनवाया इंदौर एस्टेट का महल खड़ा है; उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग का घाट-विवरण परिसर के हनुमान मंदिर और दो शिव मंदिरों का निर्माण भी उन्हीं का बताता है — वही भाव, जिसने 1780 में कुछ गलियाँ भीतर काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।

यहाँ जो होता है, वह काशी के किसी भी घाट का सामान्य और अटूट जीवन है। भोर की पहली रोशनी में लोग स्नान के लिए उतरते हैं, जल में उतरने से पहले संकल्प लेते हैं, पितरों के लिए तर्पण करते हैं, जल-किनारे गंगा-पूजन करते हैं। संध्या में सीढ़ियों पर छोटी-छोटी कीर्तन-मंडलियाँ बैठ जाती हैं। यहाँ किसी बड़े मंदिर की कतार नहीं है, कोई आयोजन नहीं है — यह घाट जो देता है वह स्वयं गंगा हैं।

नाम किसकी स्मृति है

बनारस का जो तट आज हम देखते हैं, उसका अधिकांश पत्थर अठारहवीं सदी का है — पेशवा, होलकर, सिंधिया और भोंसले घरानों ने एक के बाद एक घाट पक्के कराए। अहिल्याबाई घाट उन जगहों में है जहाँ होलकर महारानी की काशी-सेवा नदी के किनारे साफ़ दिखाई देती है। बनारस उन्हें शासक से अधिक धर्म-संरक्षिका के रूप में याद करता है, और बहुत से यात्रियों के लिए इस घाट पर डुबकी लगाना उस सेवा-परंपरा को प्रणाम करना भी है।

अहिल्याबाई घाट
अहिल्याबाई घाट, Varanasi, UP

अहिल्याबाई घाट के वर्तमान नाम से जुड़ा कोई अलग पौराणिक माहात्म्य अभिलेखों में नहीं मिलता, और सच्चे मार्गदर्शन को यह साफ़ कह देना चाहिए। इसकी पवित्रता काशी में गंगा की पवित्रता है — वही नदी, वही क्षेत्र, वही पुण्य जो परंपरा असी से आदि केशव तक फैले इस अर्धचंद्र पर कहीं भी किए स्नान से जोड़ती है।

भक्तों की मान्यता है कि काशी क्षेत्र में गंगा अपनी कृपा घाट-घाट बाँटकर नहीं देतीं। काशी की भक्ति-दृष्टि में यहाँ उत्तरवाहिनी गंगा का पूरा प्रवाह तीर्थ है; नाम अलग-अलग हैं, जल एक ही है। जिन यात्रियों को दशाश्वमेध की सीढ़ियाँ संकल्प के लिए बहुत भीड़-भरी लगती हैं, उन्हें यहाँ वही गंगा बैठने की जगह के साथ मिलती हैं।

सेवा भी उपासना है

यहाँ एक दूसरा महत्व भी है, और वह मनुष्य का है। हिंदू दृष्टि में तीर्थ का निर्माण और रख-रखाव — सीढ़ियाँ, मंदिर, धर्मशालाएँ, कुएँ — स्वयं में उपासना है। अहिल्याबाई होलकर का दान भारत की पूरी तीर्थ-भूगोल तक पहुँचा: 1780 में काशी विश्वनाथ मंदिर, मणिकर्णिका और दशाश्वमेध पर कार्य, यात्रियों के लिए धर्मशालाएँ, और सप्तपुरी, बद्रीनाथ तथा पुरी और द्वादश ज्योतिर्लिंगों पर मंदिर, घाट और अन्नक्षेत्र। जो इन सीढ़ियों पर खड़ा है, वह उसी सेवा के फल पर खड़ा है। परंपरा मानती है कि ऐसा संरक्षण एक बार नहीं, बल्कि जब तक तीर्थ का उपयोग होता रहे तब तक पुण्य देता रहता है — और ये सीढ़ियाँ आज भी रोज़ काम में हैं।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

घाट अपने वर्तमान नाम से पुराना है। वाराणसी के तट के धरोहर-प्रलेखन में इसका पुराना नाम केवलगिरि घाट दर्ज है, और यह भी कि इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर के संरक्षण में 1778 से 1785 के बीच इसे बढ़ाकर पूरी तरह नया बनवाया गया। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के घाट-विवरण में यह कार्य 1785 का बताया गया है, जब इंदौर की महारानी ने घाट के साथ तट पर एक बड़ा महल भी खड़ा कराया। दोनों विवरणों का अंतर केवल यह है कि एक ही निर्माण-अभियान को वे किस वर्ष से जोड़ते हैं।

अहिल्याबाई होलकर (जन्म 1725; 1767 से 1795 में देहावसान तक मालवा की शासिका) पूरे हिंदू तीर्थ-मानचित्र पर अपने निर्माण और जीर्णोद्धार के लिए स्मरण की जाती हैं। काशी में उनके कार्यों में 1780 का काशी विश्वनाथ मंदिर पुनर्निर्माण, मणिकर्णिका तथा दशाश्वमेध घाटों पर संरक्षण, तट पर मंदिर और यात्रियों के लिए धर्मशालाएँ शामिल हैं। काशी के बाहर उन्होंने सप्तपुरी, बद्रीनाथ और जगन्नाथ पुरी तथा द्वादश ज्योतिर्लिंगों पर दान किया। इस घाट के सरकारी विवरण में परिसर के हनुमान मंदिर और दो शिव मंदिरों का निर्माण भी उन्हीं का बताया गया है।

यही धरोहर-प्रलेखन यह भी बताता है कि 1831 में जेम्स प्रिंसेप ने इसे केवलगिरि घाट ही लिखा था, और 1868 में शेरिंग ने अहिल्याबाई घाट — नाम का बदलना इन्हीं दोनों के बीच पड़ता है। तब से घाट सामान्य उपासना में बना रहा है; राज्य पर्यटन विभाग का विवरण बताता है कि आज भी बड़ी संख्या में लोग यहाँ स्नान के लिए आते हैं। आज इसकी देख-रेख बँटी हुई है: महल और उससे जुड़ी संपत्तियाँ अहिल्याबाई इंदौर एस्टेट ट्रस्ट के पास हैं, घाट नगर निगम के पास। धरोहर-सर्वेक्षण बताते हैं कि सामान्य मरम्मत से आगे इन सीढ़ियों के लिए कोई विशेष संरक्षण योजना नहीं है, और नदी की ओर के कुछ बरामदे और ओसारे अतिक्रमण की चपेट में हैं — यह बात उन सबको जाननी चाहिए जिन्हें इस घाट के आगे सौंपे जाने की चिंता है।

अहिल्याबाई घाट — historic view

वास्तुकला

अहिल्याबाई घाट पूरी तरह पक्का है; उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग का विवरण इसे बस साफ़ और पक्का बताता है। धरोहर-सर्वेक्षण महल और घाट, दोनों को मिलाकर इस खंड का क्षेत्रफल 0.23 हेक्टेयर बताते हैं।

सीढ़ियों के ऊपर प्रमुख इमारत इंदौर एस्टेट का महल है, अपने सेवा-प्रांगण के साथ, जिसका नगर की ओर का प्रवेश-द्वार नौबत से सज्जित है — वही नगाड़ा, जो परिसर की रखवाली करता था। पास ही दस घरों की ब्रह्मपुरी है — सब एक साथ बने, इसीलिए उनके अग्रभाग इतने एक-से हैं — जहाँ महारानी के मंदिरों की सेवा करने वाले ब्राह्मण और पुजारी रहते थे; और एक अखाड़ा, वही कुश्ती-स्थल जो बनारस के कई घाट आज भी सँजोए हुए हैं।

परिसर में महारानी के बनवाए दो शिव मंदिर और एक हनुमान मंदिर हैं; धरोहर-प्रलेखन एक शिव मंदिर को बारह खंभों की योजना पर बना बताता है और हनुमान मंदिर में स्थापित विग्रहों का उल्लेख करता है। ये छोटी इमारतें हैं, और इनमें दर्शन घाट के रोज़ के उपयोग का ही हिस्सा है, कोई अलग आयोजन नहीं।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

यह स्नान-घाट है, और इसकी साधना नदी की साधना है। यात्री पहली रोशनी में स्नान के लिए आते हैं, जल में उतरने से पहले संकल्प लेते हैं, पितरों के लिए तर्पण करते हैं। जल-किनारे गंगा-पूजन — मिट्टी का दीया, फूल, थोड़ा दूध, लाल धागा — दिन भर चलता रहता है, प्राय: ऊपरी सीढ़ियों पर बैठे पंडों के सहयोग से।

स्नान के बाद बहुत से लोग कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर परिसर के हनुमान मंदिर और शिव मंदिरों में दर्शन करते हैं, और कुछ आगे काशी विश्वनाथ तक जाते हैं। संध्या में सीढ़ियों पर छोटी कीर्तन-मंडलियाँ बैठती हैं; उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के विवरण में इस घाट की संध्या-चर्या के अंग के रूप में बंगाली स्त्रियों के भजन-गायन का उल्लेख है।

इस घाट पर कोई औपचारिक गंगा आरती नहीं होती — वह भव्य संध्या आरती थोड़ी दूर नीचे दशाश्वमेध पर है। यहाँ के छोटे मंदिरों के समय अनौपचारिक हैं; किसी छपे हुए समय-पत्रक पर भरोसा करने के बजाय घाट पर ही पूछ लेना बेहतर है।

उत्सव एवं पर्व

उत्सवकबभीड़
देव दीपावलीपूरे तट पर अत्यधिक
कार्तिक पूर्णिमा स्नानबहुत अधिक
गंगा दशहराअधिक
मकर संक्रांतिअधिक
नित्य गंगा स्नानभोर से लगातार

देव दीपावली: परंपरा मानती है कि इस रात देवगण काशी में गंगा-स्नान के लिए उतरते हैं, और घाटों पर दीये उन्हीं के स्वागत में जलाए जाते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा स्नान: पुराण कार्तिक मास के स्नान की, और उसमें भी कार्तिक पूर्णिमा की, विशेष महिमा गाते हैं। अनेक परिवार पूरे मास नित्य गंगा-स्नान का कार्तिक व्रत रखते हैं।

गंगा दशहरा: भक्तों की मान्यता है कि इस दिन गंगा-स्नान विशेष रूप से पावन करता है; काशी में यह वर्ष के प्रमुख गंगा-उपासना दिनों में है।

मकर संक्रांति: सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण के आरंभ का पर्व; इस दिन स्नान और दान का विशेष पुण्य माना जाता है।

नित्य गंगा स्नान: किसी एक पर्व से अधिक यही रोज़ का उपयोग वह कारण है जिसके लिए यह घाट बना था, और जिसने इसे अठारहवीं सदी से जीवित रखा है।

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Practical guidance to help you plan your pilgrimage

Pilgrim Guidance

कैसे पहुँचें

घाट मध्य तट पर मुंशी घाट और शीतला घाट के बीच है। पैदल आना हो तो दशाश्वमेध से तट के किनारे थोड़ी दूर ऊपर की ओर — नदी की ओर मुँह करने पर बाईं तरफ़। ऊपर से आना हो तो दशाश्वमेध घाट रोड से निकलती गलियों से रास्ता है; गाड़ी गोदौलिया तक ही जाती है, आख़िरी हिस्सा पैदल तय करना होता है। नाव से आने पर मध्य घाटों पर चलने वाली कोई भी साझा या निजी नाव कहने पर यहाँ उतार देती है।

यात्रा की तैयारी

  • यह स्मारक नहीं, कार्यरत स्नान-घाट है; सबसे अधिक चहल-पहल भोर में रहती है।
  • जल के पास पत्थर फिसलन भरा होता है, ख़ासकर वहाँ जहाँ बरसात की गाद जमी हो; धीरे उतरें और जहाँ रेलिंग हो वहाँ उसका सहारा लें।
  • गंगाजल के लिए छोटा लोटा, बदलने के कपड़े, और सीढ़ियों पर मर्यादा से कपड़े बदलने के लिए एक चादर साथ रखें — स्थानीय स्नानार्थी यही करते हैं।
  • दीया, फूल और दक्षिणा के लिए खुले पैसे रखें; घाट पर और कुछ ख़रीदने को है भी नहीं।
  • ऊपरी सीढ़ियों पर बैठे पंडे संकल्प, तर्पण या गंगा-पूजन कराने का प्रस्ताव देंगे। दक्षिणा पहले तय कर लें, और विनम्रता से मना कर देना भी पूरी तरह ठीक है।
  • बुज़ुर्गों के साथ हों तो जल तक उतरने से पहले ऊपरी चबूतरे पर बैठने की जगह देख लें।

सबसे अच्छा समय

भोर से लगभग नौ बजे तक घाट सबसे भावपूर्ण और सबसे कम भीड़-भरा रहता है। मौसम की दृष्टि से अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल है। कार्तिक — और उसमें भी कार्तिक पूर्णिमा तथा देव दीपावली — पूरे तट को दीयों से भर देती है और भीड़ भी बहुत बड़ी होती है। बरसात में गंगा निचली सीढ़ियों के ऊपर चढ़ आती हैं और घाट का उपयोग-योग्य हिस्सा काफ़ी घट जाता है; उन दिनों जल में उतरने से पहले स्थानीय सलाह ज़रूर लें।

स्थान

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Varanasi, UP

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