आनंदमयी घाट काशी के तट के दक्षिणी हिस्से में, भदैनी मुहल्ले में है — अस्सी से आरंभ होने वाले घाट-क्रम में सातवाँ, जानकी घाट और वच्छराज घाट के बीच। वाराणसी के घाटों की धरोहर-दस्तावेज़ी में दर्ज है कि पहले इसे इमलिया घाट कहा जाता था, और वर्तमान नाम इसे 1944 के बाद मिला, जब श्री आनंदमयी माँ ने यह घाट लेकर ऊपर की भूमि पर अपना आश्रम विकसित किया। खेओड़ा में 1896 में निर्मला सुंदरी के रूप में जन्मी इस साधिका को 1920 के दशक में भक्तों ने ‘आनंदमयी माँ’ नाम दिया, और उनके अनुयायी उन्हें देवी का अवतार मानते रहे।
सीढ़ियों के ऊपर कोई महल नहीं, एक चलता हुआ आश्रम है। धरोहर-दस्तावेज़ में यहाँ बनी दो जुड़ी हुई इमारतों का उल्लेख है — आनंदमयी आश्रम, जिसमें अन्नपूर्णा और शिव का मंदिर तथा यज्ञ के लिए एक बड़ा सभागार है; और उससे सटा आनंदमयी कन्यापीठ, एक आवासीय विद्यालय जहाँ बालिकाओं को सामान्य शिक्षा के साथ-साथ साधना की शिक्षा दी जाती है। 1950 के दशक से माँ के नाम पर बने संघ का मुख्यालय वाराणसी में स्थापित हुआ, और तब से संघ की त्रैमासिक पत्रिका इसी नगर से छपती है।
घाट स्वयं बिना हड़बड़ी का है। यहाँ आरती का कोई मंच नहीं है, और धरोहर-दस्तावेज़ी इन सीढ़ियों पर नित्य स्नान के अलावा किसी अनुष्ठान का उल्लेख नहीं करती। सूर्योदय से पहले भदैनी के लोग स्नान के लिए उतरते हैं और थोड़ी देर में सीढ़ियाँ फिर ख़ाली हो जाती हैं। अस्सी से दशाश्वमेध की ओर पैदल जाते यात्री के लिए आनंदमयी घाट वह जगह है जहाँ तट अब भी घरेलू है — ऊपर की छत से उतरता कीर्तन का स्वर, सीढ़ियों पर बैठे कुछ लोग, और सामने उत्तर की ओर बहती गंगा।

काशी के अर्धचंद्र के हर घाट की तरह आनंदमयी घाट भी नदी की उसी पवित्रता का भागी है। यहाँ गंगा उत्तरवाहिनी हैं, अपनी ही धारा के विरुद्ध उत्तर मुड़ी हुई, और परंपरा मानती है कि इस तट पर कहीं भी किया गया स्नान तीर्थ-स्नान है। यहाँ स्नान करने वाला भक्त वही गंगा पाता है जो दशाश्वमेध पर स्नान करने वाला; संकल्प और पितृ-तर्पण यहाँ भी वैसे ही हो सकते हैं जैसे किसी और घाट पर।
इस घाट की विशेषता कोई प्राचीन कथा नहीं, बल्कि एक आधुनिक कथा है — बमुश्किल सौ वर्ष पुरानी एक भक्ति-परंपरा, जिसे उस नगर में स्थायी घर मिला जो न जाने कब से संप्रदायों को अपने भीतर बसाता आया है। काशी ने नएपन को कभी अयोग्यता नहीं माना; उसने संत, सिद्ध और आचार्य — सबको जगह दी है, और आनंदमयी घाट उसी तट पर बीसवीं शताब्दी का जोड़ है, जो तट पहले की कई शताब्दियों में बनता-बनता आया है। 1944 में बना आश्रम पुराणों में नामित घाटों से कुछ ही मिनट की दूरी पर बैठा है — बनारस में यह बिलकुल साधारण बात है।
ऊपर की छत पर अन्न देने वाली माँ
आश्रम का प्रमुख मंदिर अन्नपूर्णा और शिव को समर्पित है। काशी में अन्नपूर्णा वह माँ हैं जो नगर का पेट भरती हैं — पार्वती का वह रूप, जिनके विषय में बनारसी परंपरा कहती है कि स्वयं शिव उनसे भिक्षा लेते हैं, और इसीलिए इस क्षेत्र में कोई भूखा नहीं रहता। जिस साधिका को भक्तों ने ‘माँ’ कहा, उसी की स्थापना के केंद्र में अन्नपूर्णा हों — भक्त इसे संयोग नहीं, सहज उचित मानते हैं। यह मंदिर 1950 की दीपावली पर माँ की उपस्थिति में खोला गया था।
समाधि अन्यत्र, उपस्थिति यहाँ
यह बात स्पष्ट कह देना ज़रूरी है, क्योंकि इसमें प्राय: भ्रम होता है: श्री आनंदमयी माँ ने 27 अगस्त 1982 को देहरादून में देह त्यागी, और दो दिन बाद उनकी समाधि हरिद्वार के पास कनखल स्थित आश्रम के प्रांगण में बनी। इस घाट पर कोई समाधि नहीं है। काशी के पास वह है जो उन्होंने यहाँ बनाया और जो आज भी उसमें चल रहा है — मंदिर, यज्ञशाला, विद्यालय और कीर्तन। उनके अनुयायियों के लिए यह कोई कम विरासत नहीं। भक्त मानते हैं कि जिस स्थान को किसी सिद्ध जीवन ने गढ़ा हो, वह उस जीवन का कुछ अंश अपने पास रखता है; इसी भाव से लोग घाट और आश्रम में आकर बैठते हैं।
इतिहास
वर्तमान नाम मिलने से पहले यह घाट इमलिया घाट कहलाता था। वाराणसी के घाटों की धरोहर-दस्तावेज़ी के अनुसार इसे पहली बार लगभग 1942 में राय बलदेव सहाय ने पक्का कराया; 1944 में श्री आनंदमयी माँ ने यह घाट लिया और ऊपर के भाग को आश्रम के रूप में विकसित किया; और 1945 में नीचे का हिस्सा शिव प्रसाद गुप्त ने पक्का कराया। आश्रम की अपनी तिथि-सूची भी लगभग यही कहती है: मार्च 1944 में माँ ने वाराणसी की नई आश्रम-भूमि पर पहली बार चरण रखे और उसी मास वहाँ पहली वासंती दुर्गा पूजा हुई; अप्रैल 1945 में नए आश्रम में दूसरी बासंती पूजा हुई और स्वामी अखंडानंद की स्मृति में स्मृति मंदिर का उद्घाटन हुआ।
इसके बाद के दो दशक आश्रम के निर्माण-वर्ष रहे, और उनका लेखा असाधारण रूप से सुरक्षित है। जनवरी 1947 में वाराणसी आश्रम में तीन वर्ष चलने वाला अखंड गायत्री महायज्ञ आरंभ हुआ, जिसका समापन जनवरी 1950 में विशाल ब्राह्मण-भोज और नगर में शोभायात्रा के साथ हुआ। जुलाई 1950 में विरजा मंदिर खुला; उसी वर्ष दीपावली पर माँ की उपस्थिति में अन्नपूर्णा मंदिर का उद्घाटन हुआ। अक्टूबर 1951 में कन्यापीठ का शिल्प प्रतिष्ठान भवन और शिशु कल्याण केंद्र खोले गए। अगस्त 1952 में पहला संयम सप्ताह — सामूहिक ध्यान, प्रवचन और कीर्तन का वह सप्ताह जो आगे चलकर संघ का वार्षिक अनुष्ठान बना — यहीं आयोजित हुआ।
1950 के दशक से माँ के नाम पर बने संघ का मुख्यालय वाराणसी में स्थापित हुआ। उनके अनुयायियों में महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज भी थे — संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान और दार्शनिक, वाराणसी के राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य। निर्माण चलता रहा: अप्रैल 1968 में इसी आश्रम में आनंद ज्योति मंदिर का उद्घाटन हुआ, और उसी वर्ष माँ की प्रेरणा से पड़ोसी वच्छराज घाट पर गोपाल मंदिर बना। जुलाई 1971 में माता आनंदमयी चिकित्सालय का अंत:रोगी विभाग चलने लगा — यह चिकित्सालय संघ का है और नदी के किनारे कुछ उत्तर, शिवाला में है। मार्च 1972 में इसी आश्रम में नए शिव मंदिर का उद्घाटन हुआ।
27 अगस्त 1982 को श्री आनंदमयी माँ ने देहरादून में देह त्यागी। उनका स्थापित संघ वाराणसी में आज भी कार्यरत है और अमृत वार्ता नामक त्रैमासिक पत्रिका अंग्रेज़ी, हिंदी, गुजराती और बांग्ला में प्रकाशित करता है। धरोहर-दस्तावेज़ों के अनुसार घाट से लगी संपत्ति न्यास की है, जबकि घाट का हिस्सा नगर निगम की देखरेख में है — यही व्यवस्था है जिसने सीढ़ियों को साधारण सार्वजनिक उपयोग में बनाए रखा, और घाट इसी के लिए होता है।

वास्तुकला
घाट की बनावट सादी है और वह दो चरणों में पक्का हुआ — लगभग 1942 में राय बलदेव सहाय के हाथों, और नीचे का हिस्सा 1945 में शिव प्रसाद गुप्त के हाथों। धरोहर-दस्तावेज़ी इसे पड़ोसी भदैनी और जानकी घाटों के साथ एक ही इकाई मानती है — नदी के इस हिस्से पर लगभग 0.32 हेक्टेयर का समूह — और सीढ़ियों पर किसी अलंकरण का उल्लेख नहीं करती। सीढ़ियाँ वही करती हैं जो सीढ़ियों को करना चाहिए — लोगों को गंगा तक ले जाना और वापस लाना।
देखने योग्य जो है वह पीछे उठता है। छत पर दो जुड़ी इमारतें हैं: एक आश्रम, जिसमें अन्नपूर्णा और शिव का मंदिर तथा यज्ञ के लिए बना बड़ा सभागार है; और उससे सटा कन्यापीठ, एक आवासीय विद्यालय। दोनों बीसवीं शताब्दी के मध्य की संस्थागत इमारतें हैं, दिखावे के लिए नहीं, काम के लिए बनी — आश्रम का सभागार तीन वर्ष चलने वाले यज्ञ को समा लेने भर बड़ा था, और कन्यापीठ अपनी छात्राओं को रखता और पढ़ाता है।
नदी से देखने पर यही बात इस घाट को उत्तर के महल-मुखी हिस्से से बिलकुल अलग कर देती है। जहाँ दरभंगा और राणा महल राजघरानों के ओसारे सामने रखते हैं, वहाँ आनंदमयी घाट एक चलते हुए आश्रम की दीवारें सामने रखता है, और उनके बीच एक मंदिर। आश्रम का निर्माण अपनी सीमा पर रुका भी नहीं: पड़ोसी वच्छराज घाट पर गोपाल मंदिर 1968 में माँ की प्रेरणा से बना, जिससे भदैनी तट का यह पूरा छोटा-सा हिस्सा एक ही स्थापना की छाप रखता है।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
जल के किनारे की साधना सीधी और रोज़ की है। भदैनी के लोग सूर्योदय से पहले स्नान के लिए उतरते हैं, उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और ऊपर लौट जाते हैं। काशी आए परिवार यहाँ संकल्प और तर्पण करा सकते हैं; इस घाट पर पंडों की किसी स्थायी बैठक का उल्लेख दस्तावेज़ों में नहीं मिलता, इसलिए जिन्हें पंडा चाहिए वे विधि प्राय: अस्सी या केदार घाट पर करा लेते हैं और शांति के लिए यहाँ आते हैं।
स्थान का भक्ति-जीवन ऊपर की छत पर है। आश्रम में अन्नपूर्णा और शिव के मंदिरों की नित्य पूजा होती है, कीर्तन और सत्संग होते हैं, और बड़े सभागार में यज्ञ होते हैं — यहाँ दीर्घ यज्ञ की परंपरा 1947 से 1950 तक चले अखंड गायत्री महायज्ञ से चली आ रही है। कन्यापीठ अपनी आवासी छात्राओं के लिए अध्ययन और साधना का अपना दैनिक क्रम चलाता है। संयम सप्ताह — सामूहिक ध्यान, प्रवचन और भजन को समर्पित एक सप्ताह — पहली बार अगस्त 1952 में इसी आश्रम में हुआ और आगे चलकर संघ का वार्षिक अनुष्ठान बना; वार्षिक संयम महाव्रत का आयोजन अब संघ हरिद्वार से करता है, इसलिए इसमें सम्मिलित होने के इच्छुक यात्री स्थान पहले से पता कर लें।
दो व्यावहारिक बातें। आनंदमयी घाट पर कोई नियमित संध्या गंगा आरती नहीं होती; निकटतम आरती दक्षिण में अस्सी घाट पर है, और बड़ी आरती उत्तर में दशाश्वमेध पर। दूसरी, आश्रम कोई स्मारक नहीं बल्कि साधकों और छात्राओं से भरी एक चलती हुई संस्था है — दर्शन, सत्संग या किसी कार्यक्रम का समय मान लेने के बजाय आश्रम कार्यालय से पूछ लेना चाहिए।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
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| Pilgrim Guidance | कैसे पहुँचेंआनंदमयी घाट अस्सी से आरंभ होने वाले घाट-क्रम में सातवाँ है, भदैनी मुहल्ले में। सबसे सुखद रास्ता अस्सी घाट से नदी के किनारे पैदल है — गंगा महल, रेवाँ, तुलसी, भदैनी और जानकी घाट पार करते हुए छोटी और समतल दूरी, जो सुबह की ठंडक में अधिकतर यात्री आराम से तय कर लेते हैं। शहर की ओर से रास्ता भदैनी की गलियों से आता है; ऑटो और रिक्शा मुहल्ले तक पहुँच जाते हैं और नदी तक का अंतिम हिस्सा पैदल है। नाव से आएँ तो यह अस्सी और दशाश्वमेध के बीच के मार्ग पर पड़ता है और इस हिस्से का कोई भी नाविक इसे जानता है। आश्रम में जाने से पहले
सर्वोत्तम समयघाटों पर चलने के लिए अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल है। इस हिस्से का सबसे अच्छा समय भोर है — स्नान की बेला, और वह घड़ी जब नदी नावों से सबसे ख़ाली रहती है। आश्रम के प्रमुख दिन हैं श्री आनंदमयी माँ का जन्मोत्सव (वैशाख, हिंदू पंचांग के अनुसार अप्रैल-मई में), चैत्र की वासंती दुर्गा पूजा और आश्विन के नवरात्र; उस वर्ष का कार्यक्रम आश्रम कार्यालय से पूछ लें। बरसात में नीचे की सीढ़ियाँ जल में डूब जाती हैं; ऊपर की छतों पर ही रहें और गीले पत्थर पर सँभलकर चलें। |
स्थान
Varanasi, UP
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