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भदैनी घाट

Varanasi, UP

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सत्यापित · पिछली समीक्षा 5 महीने पहले

भदैनी घाट दक्षिणी काशी का घाट है — अस्सी से शुरू होने वाली घाट-श्रृंखला में पाँचवाँ, तुलसी घाट और जानकी घाट के बीच। इसका नाम पीछे बसे भदैनी मुहल्ले से आया है, और यह ऐतिहासिक रूप से लोलार्क घाट नामक पुराने घाट का ही अंग था। तट के विरासत-दस्तावेज़ साफ़ दर्ज करते हैं कि इस घाट पर कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता; इसकी सीढ़ियों पर जो खड़ा है वह 1907 में खुला नगर का जल-पंप है, जिसके कारण बनारस इसे जलकल घाट भी कहता है। इस छोटे हिस्से की पवित्रता ऊपर के मुहल्ले की है — भद्रेश्वर शिव और भद्र विनायक के देवालयों की, और जैन परंपरा की, जो भदैनी को सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ की जन्म-भूमि मानती है।

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भदैनी घाट बनारस के तट की दक्षिणी अर्धचंद्र-रेखा पर है, उस हिस्से में जिससे होकर अधिकांश तीर्थयात्री अस्सी से नगर के पुराने हृदय की ओर बढ़ते हैं। घाटों की प्रचलित गणना — जो दक्षिण में अस्सी से आरंभ होकर उत्तर में आदि केशव तक जाती है — में भदैनी पाँचवें स्थान पर आता है: ठीक तुलसी घाट के बाद, जो गोस्वामी तुलसीदास के नाम पर है और जहाँ रहकर उनके द्वारा रामचरितमानस की रचना मानी जाती है, और जानकी घाट से ठीक पहले। घाट का नाम किसी संरक्षक या मंदिर से नहीं, अपने पीछे बसे मुहल्ले से आया है।

विरासत-दस्तावेज़ बताते हैं कि भदैनी ऐतिहासिक रूप से लोलार्क घाट नामक उस पुराने घाट का अंग था जिसकी प्रशंसा पुराण-साहित्य में मिलती है, और यह भी कि पुराने साहित्य में यह क्षेत्र भद्र वन कहलाता था — भद्र वृक्षों का वन — जिसकी पहचान दो प्रतिमाएँ थीं: भद्रेश्वर शिव और भद्र विनायक (गणेश), जो आज भी पास के देवालयों में विराजमान हैं। दक्षिण की लंबी घाट-रेखा आधुनिक काल में अलग-अलग घाटों में बँटी, और भदैनी उसी विभाजन से बना।

यह कह देना ईमानदारी है और ज़रूरी भी कि यह घाट क्या नहीं है। वाराणसी का विरासत-दस्तावेज़ भदैनी के बारे में दर्ज करता है कि यहाँ कोई धार्मिक गतिविधि नहीं होती, और नगर का शासकीय पोर्टल भी इसे इन्हीं शब्दों में बताता है — न आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए जाना जाने वाला, न कथाओं से भरा, न अलंकृत देवालयों से सजा। इन सीढ़ियों पर जो है वह नगर के काम-काज का एक हिस्सा है: 1907 में नगर निगम ने यहाँ जल-आपूर्ति का पंप खोला, जिसके कारण घाट जलकल घाट भी कहलाता है, और वह पंप आज भी चालू है। लंबे समय तक नदी तक केवल जल-संस्थान की ईंट की ढलान उतरती थी और शेष किनारा कच्ची ज़मीन ही रहा; घाट को पक्का नगर निगम ने 1997 में किया।

भदैनी की पवित्रता असल में कहाँ है

जो सीढ़ियों के पास नहीं, वह ऊपर के मुहल्ले के पास है। जैन परंपरा काशी को चार तीर्थंकरों की जन्मभूमियों में गिनती है, और भदैनी उस मुहल्ले के रूप में पूजित है जहाँ सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का जन्म माना जाता है; वाराणसी का शासकीय पोर्टल यहाँ के जैन देवालयों को श्री भदैनी तीर्थ कहता है। थोड़ा भीतर की ओर लोलार्क कुंड है, दक्षिणी काशी का सूर्य-तीर्थ, जिसके पुराने घाट से यह घाट अलग हुआ। दो घाट आगे वह घाट है जो माता आनंदमयी का नाम धारण करता है — दर्ज है कि उन्होंने 1944 में तब के इमिलिया घाट की भूमि ख़रीदकर उसे पक्का कराया। कुछ सौ क़दमों के भीतर कई भक्ति-संसार अगल-बगल बसे हैं; भदैनी स्वयं उनके बीच की सादी, काम आने वाली ज़मीन है।

भदैनी घाट
भदैनी घाट, Varanasi, UP

भक्ति की दृष्टि में दक्षिण में असि से लेकर उत्तर में आदि केशव तक का पूरा अर्धचंद्र एक ही तीर्थ की तरह देखा जाता है — वह विस्तार जहाँ गंगा उत्तर की ओर मुड़कर अपने उद्गम की दिशा में बहती हैं, और भक्तजन इसी को इस तट पर पवित्र नगरी बसने का कारण मानते हैं। परंपरा काशी में गंगा-स्नान को शुद्धिकारक कहती है, और कार्तिक तथा माघ को वह ऋतु मानती है जब यह विशेष फलदायी माना जाता है।

किंतु भदैनी अनुष्ठान का घाट नहीं है, और यह पन्ना ऐसा होने का दिखावा नहीं करेगा। विरासत और शासकीय, दोनों दस्तावेज़ दर्ज करते हैं कि यहाँ कोई धार्मिक गतिविधि नहीं होती; इन सीढ़ियों पर न आरती है, न पंडों की बैठक, न किसी अनुष्ठान की व्यवस्था। जिन्हें संकल्प लेना है, सूर्य को अर्घ्य देना है या पितरों का तर्पण करना है, वे कुछ मिनट ऊपर तुलसी घाट या अस्सी घाट चले जाते हैं, जहाँ ये आचरण प्रतिष्ठित हैं। भदैनी पंचतीर्थ के पाँच घाटों — असि, दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, पंचगंगा, आदि केशव — में भी नहीं गिना जाता, और होने का दावा भी नहीं करता।

ऊपर के मुहल्ले की पवित्रता

भदैनी में जो सचमुच पावन है वह सीढ़ियों पर नहीं, उनके पीछे है। जैन स्रोत काशी को तीर्थंकरों की बड़ी जन्मभूमियों में गिनते हैं — पार्श्वनाथ, सुपार्श्वनाथ, चंद्रप्रभ और श्रेयांसनाथ, इन सबका जन्म इसी नगर या इसके निकट के क्षेत्र में माना जाता है। सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी में राजा प्रतिष्ठ और रानी पृथ्वी के यहाँ हुआ कहा जाता है, और भदैनी के जैन देवालय उसी जन्म की स्मृति में हैं। वाराणसी का शासकीय पोर्टल इस स्थान को श्री भदैनी तीर्थ कहता है, यहाँ उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में बने दिगंबर और श्वेतांबर मंदिरों की जोड़ी दर्ज करता है, और यह स्थानीय मान्यता भी कि सुपार्श्वनाथ के पाँच में से चार कल्याणक — गर्भ, जन्म, दीक्षा और ज्ञान — इसी भूमि से जुड़े हैं।

इसके साथ मुहल्ले की पुरानी शैव और गाणपत्य स्मृति नामों में ही जीवित है: भद्रेश्वर शिव और भद्र विनायक — वे दो प्रतिमाएँ जिनसे विरासत-अभिलेख के अनुसार पुराना भद्र वन पहचाना जाता था — आज भी घाट के पास के देवालयों में पूजित हैं। दो परंपराएँ इस मुहल्ले को अलग-अलग कारणों से आदर देती हैं, और नीचे की सादी सीढ़ियाँ दोनों के काम आती हैं, किसी एक की हुए बिना।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

भदैनी का दर्ज इतिहास किसी बड़े की एक शाखा के रूप में शुरू होता है। तट के विरासत-दस्तावेज़ बताते हैं कि यह घाट ऐतिहासिक रूप से लोलार्क घाट का अंग था — वह पुराना घाट जिसकी प्रशंसा पुराण-साहित्य में है — और यह भी कि आसपास का क्षेत्र पुराने साहित्य में भद्र वन कहलाता था, जिसकी पहचान भद्रेश्वर शिव और भद्र विनायक की प्रतिमाएँ थीं, जो आज भी पास के देवालयों में हैं। असि से चलने वाला वह लंबा दक्षिणी घाट आधुनिक काल में अलग-अलग घाटों में बँटा, और भदैनी ने अपना नाम उस मुहल्ले से लिया जिसके सामने वह है।

भदैनी घाट के लिए किसी निर्माता, संरक्षक परिवार या समर्पण-तिथि का उल्लेख हमें उपलब्ध विरासत-दस्तावेज़ों में नहीं मिलता, और हम इस रिक्ति को दर्ज कर देते हैं, भरते नहीं। जो अभिलेख तय करता है वह आधुनिक और नगरपालिका का है। 1907 में वाराणसी नगर निगम ने इस घाट पर जल-आपूर्ति का पंप खोला, जिसके बाद यह जलकल घाट कहलाने लगा; वह पंप आज भी चालू है और पास ही एक नया पंप भी है। गंगा की ओर जल-संस्थान की ढलान ईंट से बनी थी जबकि शेष घाट-क्षेत्र कच्ची ज़मीन छोड़ दिया गया था, और घाट को पक्का नगर निगम ने 1997 में किया। विरासत-अभिलेख यह भी दर्ज करता है कि घाट से लगी संपत्तियाँ निजी हैं जबकि घाट-क्षेत्र नगर निगम का है।

आधुनिक काल में भदैनी के आसपास का मुहल्ला भक्ति से भरता गया, यद्यपि घाट स्वयं सादा बना रहा। ठीक ऊपर तुलसी घाट गोस्वामी तुलसीदास की स्मृति वहन करता है। भदैनी की गलियों के जैन मंदिर — उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य के दिगंबर और श्वेतांबर देवालयों की जोड़ी — सुपार्श्वनाथ के जन्म की स्मृति में हैं। दो घाट आगे, दर्ज है कि आनंदमयी माँ ने 1944 में तब के इमिलिया घाट की भूमि ख़रीदकर उसे पक्का कराया, जिसके बाद वह उनके नाम से जाना गया; श्री श्री माँ आनंदमयी संघ ने 1950 के दशक से वाराणसी में अपना केंद्र स्थापित किया।

भदैनी घाट — historic view

वास्तुकला

भदैनी पर दिखावे के अर्थ में घाट-वास्तु है ही नहीं — न कोई अलंकृत प्रवेश-द्वार, न सीढ़ियों पर ताज की तरह बैठी किसी संरक्षक की हवेली, न नक़्क़ाशीदार मंडप। विरासत-अभिलेख इसका कारण साफ़ बताता है: अपने दर्ज इतिहास के अधिकांश समय यहाँ नदी तक बनी हुई एकमात्र उतराई जल-संस्थान की ईंट की ढलान थी, और शेष किनारा कच्ची ज़मीन छोड़ दिया गया था। आज दिखने वाली चौड़ी पत्थर की सीढ़ियाँ 1997 की हैं, जब नगर निगम ने घाट को पक्का किया।

जिस एक इमारत से भदैनी को उसका दूसरा नाम मिला वह 1907 में खुला जल-पंप-गृह है, जो आज भी चालू है और जिसके पास एक नया पंप भी लगा है। यह पावन नहीं, नागरिक इमारत है — और यही कारण है कि तट यहाँ जैसा है वैसा है: यह घाट किसी के चरणों से पहले नगर के जल के लिए बना।

यह सादगी दरिद्रता नहीं है, और असफलता भी नहीं। बनारस में घाट-निर्माण काम की चीज़ है: उसका उद्देश्य इतना है कि मनुष्य नगर की गली से सुरक्षित उतरकर बहती नदी तक पहुँच सके, और हर बाढ़ के बाद फिर वही कर सके। इसकी पूरी बनावट नदी के वर्ष-चक्र से तय होती है — बरसात में नीचे की उड़ानें डूब जाती हैं और उपयोग का घाट सीढ़ी-दर-सीढ़ी ऊपर खिसकता जाता है; पानी उतरने पर गाद हटाई जाती है और वही पत्थर फिर काम में आ जाते हैं। भदैनी यह काम बिना सजावट के करता है, और यहाँ की ढाल बीच के तीखे घाटों से आसान है।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

यह सीधे कह देना चाहिए, क्योंकि यात्री इसी के अनुसार योजना बनाते हैं: भदैनी घाट पर कोई आयोजित अनुष्ठान नहीं होता। वाराणसी का विरासत-दस्तावेज़ इस घाट के बारे में दर्ज करता है कि यहाँ धार्मिक गतिविधियाँ नहीं होतीं, और नगर का शासकीय पोर्टल भी इसे इसी तरह बताता है — ऐसा घाट जो आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए नहीं जाना जाता और जिस पर अलंकृत देवालय नहीं हैं। भदैनी पर गंगा आरती नहीं होती, दिन भर बैठने वाले पंडे नहीं होते, और सीढ़ियों पर न पूजा-सामग्री मिलती है न पुरोहित।

जो यात्री नदी के आचरण के लिए दक्षिणी काशी आए हैं, वे उन्हें कुछ मिनट ऊपर ले जाएँ। स्नान, जल में खड़े होकर संकल्प, उगते सूर्य को अर्घ्य और पितरों का तर्पण — ये सब तुलसी घाट और अस्सी घाट पर प्रतिष्ठित हैं, और नगर की संध्या गंगा आरती अस्सी तथा दशाश्वमेध की है। विधिवत कर्म — श्राद्ध, पिंडदान, या पुरोहित और पूरी सामग्री वाली कोई पूजा — उन्हीं घाटों पर या परिवार के अपने आचार्य से पहले से तय करके कराएँ।

भदैनी में भक्तों को जो खींचता है वह जल के पास नहीं, ऊपर की गलियों में है: भदैनी तीर्थ के जैन देवालयों का दर्शन, और पास ही भद्रेश्वर शिव तथा भद्र विनायक के देवालय। इन सबका दर्शन-समय स्थानीय स्तर पर तय होता है और जाने से पहले पक्का कर लेना चाहिए।

उत्सव एवं पर्व

उत्सवकबभीड़
सुपार्श्वनाथ जन्म कल्याणकमध्यम; घाट की सीढ़ियों पर नहीं, मुहल्ले के जैन देवालयों में केंद्रित
लोलार्क षष्ठीआसपास की गलियों में बहुत अधिक
देव दीपावलीपूरे तट पर अधिक; इस दक्षिणी हिस्से में स्पष्ट रूप से शांत

सुपार्श्वनाथ जन्म कल्याणक: जैन परंपरा में तीर्थंकर का जन्म पाँच कल्याणकों में एक है, और जिस भूमि पर वह हुआ वह उसी आदर की पात्र मानी जाती है। भदैनी तीर्थ की स्थानीय मान्यता सुपार्श्वनाथ के पाँच में से चार कल्याणक इसी स्थान से जोड़ती है। यही वह तथ्य है जो भदैनी को अपने पड़ोसी घाटों से सबसे अलग करता है।

लोलार्क षष्ठी: लोलार्क षष्ठी उत्तर भारत की सबसे विशिष्ट व्रत-परंपराओं में है — संतान के लिए परिवार की प्रार्थना, जो पीढ़ियों से अटूट चली आ रही है। इस दिन दक्षिणी काशी में रहने की योजना बनाने वालों को समझ लेना चाहिए कि पूरा मुहल्ला उसी में लगा रहेगा।

देव दीपावली: परंपरा मानती है कि इस रात देवगण काशी में गंगा-स्नान के लिए उतरते हैं, और घाटों के दीप उन्हीं के स्वागत में जलाए जाते हैं।

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Pilgrim Guidance

घाट-रेखा पर भदैनी कहाँ है

दक्षिण से गिनें तो क्रम है — अस्सी घाट, गंगा महल (प्रथम), रीवाँ घाट, तुलसी घाट, फिर भदैनी घाट, फिर जानकी घाट, माता आनंदमयी घाट, वच्छराज (बछराज) घाट और जैन घाट। यह क्रम जान लेना सचमुच काम आता है: अस्सी से तट-तट चलकर भदैनी कुछ ही मिनटों में पहुँचा जा सकता है, और एक सुबह में अस्सी, तुलसी घाट, भदैनी, थोड़ा भीतर लोलार्क कुंड और नीचे के जैन घाट — सब बिना किसी वाहन के देखे जा सकते हैं।

कैसे पहुँचें

  • अस्सी घाट से घाटों के साथ-साथ पैदल — सबसे सरल रास्ता, और हम प्राय: यही सुझाते हैं।
  • भदैनी मुहल्ले की गलियों से — अस्सी चौराहे तक ऑटो, फिर नदी की ओर थोड़ी पैदल उतराई।
  • नाव से, अस्सी से दक्षिणी हिस्से की सैर में एक पड़ाव की तरह — कहने पर मल्लाह सीढ़ियों पर नाव लगा देते हैं।
  • ध्यान रहे कि किसी भी घाट तक अंतिम पहुँच हमेशा पैदल ही है; वाहन जल तक नहीं आते।

तैयारी और सबसे उपयुक्त समय

  • सही अपेक्षा लेकर आएँ। यह नगर के जल-संस्थान वाला शांत घाट है, अनुष्ठान का घाट नहीं — नदी के आचरण कुछ मिनट ऊपर तुलसी और अस्सी घाट पर हैं।
  • सुबह यहाँ का सुखद समय है, और तभी ऊपर की गलियों के जैन देवालय तथा भद्रेश्वर और भद्र विनायक के देवालय दर्शन के लिए खुले रहते हैं।
  • अक्टूबर से मार्च इस हिस्से की सबसे सुखद ऋतु है।
  • बरसात में और उसके तुरंत बाद नीचे की सीढ़ियाँ डूबी, गाद से फिसलनभरी रहती हैं और धार तेज़ होती है। उस समय जल में उतरना उन्हीं पर छोड़ें जो नदी को जानते हैं; पहले स्थानीय लोगों से पूछ लें।
  • नाव के लिए थोड़े खुले पैसे रखें। घाट पर किसी प्रकार का कोई शुल्क या टिकट नहीं है।
  • बुज़ुर्ग यात्रियों को यहाँ की ढाल बीच के घाटों से आसान लगेगी, पर पत्थर ऊबड़-खाबड़ हैं — किसी साथी का हाथ किसी भी रेलिंग से अधिक काम आता है।

स्थान

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