चौसट्टी घाट — जिसे चौसट्ठी और चौमसाठी भी लिखा जाता है — का नाम चौसठ से बना है, उन चौंसठ योगिनियों से, जिन्हें शाक्त परंपरा में महादेवी के चारों ओर खड़ी सहचरी शक्तियों के रूप में पूजा जाता है। उनका स्थान, चौसट्ठी देवी मंदिर, सीढ़ियों के शिखर पर है, और नीचे का घाट नदी की ओर से उसका मार्ग। भक्त के लिए दोनों एक ही स्थान हैं — गंगा में स्नान, और फिर माँ के दर्शन के लिए ऊपर की चढ़ाई।
यह मध्य तट की अपेक्षाकृत सँकरी और खड़ी सीढ़ियों में से एक है, ऊपर की ओर दिगपतिया घाट और नीचे की ओर राणा महल घाट के बीच; उसके बाद क्रम से दरभंगा, मुंशी, अहिल्याबाई और शीतला घाट आते हैं, और फिर दशाश्वमेध। पड़ोस ही इस भाग को उसका चेहरा देता है। उत्तरी छोर से सटा राणा महल उदयपुर घराने की राजस्थानी शैली का महल संजोए है; दक्षिण में लगा दिगपतिया घाट चंपारन के दिगापतिया नरेश के नाम से जाना जाता है, जिनका बंगाली शैली का तटवर्ती महल आज सीतारामा ओंकार दास काशी आश्रम है।
धरोहर-प्रलेखना बताती है कि चौंसठ योगिनी-प्रतिमाओं में से वाराणसी में अब केवल सोलह शेष हैं। उनमें से दो यहीं देवी के निकट हैं — गजानना, गजमुखी, और मयूरी, मयूरमुखी; मयूरी की प्रतिमा तो घाट की सीढ़ियों में ही जड़ी है, जहाँ से हर सुबह स्नानार्थी गुज़रते हैं। ऊपर मंदिर-परिसर में काली, शिव, गणेश और कार्तिकेय की तथा लोक-देवियों की बहुत पुरानी प्रतिमाएँ हैं।
घाट का रोज़ का जीवन शांत और नियमित है। भक्त स्नान के लिए और पत्थर पर कुछ देर ठहरने के लिए आते हैं; आसपास की गलियों के बंगाली परिवार लंबे समय से इन्हीं सीढ़ियों पर स्नान, ध्यान और घर-गृहस्थी के छोटे संस्कार करते आए हैं।

शाक्त दृष्टि में एक ही देवी अनगिनत रूपों में पूजी जाती हैं, और चौंसठ योगिनियाँ उनमें सबसे प्रिय रूपों में हैं — वे सहचरी शक्तियाँ, जो माँ के चारों ओर उनके सामर्थ्य का जीवंत मंडल बनकर खड़ी रहती हैं। चौसट्टी उसी मंडल का घाट है। धरोहर-प्रलेखना इस संख्या को दिशा और गुणन के प्रतीक-भाव से समझाती है: आठ मातृ-देवियाँ और प्रत्येक की आठ सहायिकाएँ, अथवा पृथ्वी की आठ दिशाएँ और उनके सामने आकाश-मंडल की आठ — दोनों मिलकर चौंसठ का आदि-रूप बनाते हैं। भक्ति-भाव में योगिनियों के आगे शीश झुकाना उसी एक माँ के आगे झुकना है, उनकी समस्त शक्तियों सहित।
तट की धरोहर-प्रलेखना काशी खंड (61.176–177) को उद्धृत करती है, जिसमें इस घाट और योगिनी-प्रतिमाओं का वर्णन है और यहाँ दो जल-तीर्थों का उल्लेख भी — वे पावन स्थल जो जल से जुड़े हैं। देवी चौसट्ठी और उनके घाट का नाम लगभग 1600–60 की संस्कृत रचना गीर्वाणपदमंजरी में भी आता है। अर्थात यहाँ की उपासना कोई नई श्रद्धा नहीं, नगरी की अपनी ग्रंथ-स्मृति में प्रमाणित एक निरंतरता है।
यह घाट काशी की विद्या-परंपरा में भी अपना स्थान रखता है: धरोहर-अभिलेख बताते हैं कि इसने महान संस्कृत विद्वान मधुसूदन सरस्वती (1540–1623) को आश्रय दिया था। यात्रियों के लिए यह भी घाट के स्वभाव का अंग है — एक देवी-स्थान, जहाँ साधना और अध्ययन सदा पास-पास बैठे रहे हैं।
काशी के देवी-क्रम में
भक्त काशी को जितनी शिव की नगरी मानते हैं, उतनी ही देवी की भी। मीर घाट की विशालाक्षी, नगरी का पेट भरने वाली अन्नपूर्णा, दक्षिण में अपने मंदिर की दुर्गा, और इस घाट के ऊपर की योगिनियाँ — सब एक ही उपस्थिति के अनेक रूप अनुभव किए जाते हैं। घाट-यात्रा करने वाले अनेक श्रद्धालु चौसट्टी को इसी कारण अपने क्रम में जोड़ते हैं: यहाँ माँ का अभिवादन नदी की ओर से ही हो जाता है, वहीं जहाँ यात्रा पहले से चल रही होती है।
इतिहास
इस तट पर योगिनी-उपासना इतनी पुरानी है कि नगरी के संस्कृत साहित्य में दर्ज हो चुकी है, और घाट के पत्थर उस भक्ति के चारों ओर बार-बार बने और बदले हैं, जो स्वयं नहीं बदली। धरोहर-प्रलेखना बताती है कि अठारहवीं सदी तक चौसट्ठी देवी की मुख्य प्रतिमा उत्तर में लगे राणा महल में रखी जाती थी, और बाद में उसे सीढ़ियों के ऊपर उसके वर्तमान स्थान पर लाया गया।
यहाँ पहला पक्का घाट सोलहवीं सदी के उत्तरार्ध में राजा प्रतापादित्य ने बनवाया — वाराणसी ज़िले की धरोहर-सूची उन्हें इसी नाम के बंगाल के शासक के रूप में पहचानती है — और समय के साथ वह आंशिक रूप से नष्ट हो गया। लगभग 1670 में उदयपुर के राजा राणा जगत सिंह ने घाट का जीर्णोद्धार और विस्तार कराया तथा उसके उत्तरी छोर पर राणा महल बनवाया, जहाँ वे अपनी काशी-यात्रा के समय ठहरे थे। घाट की वर्तमान निर्मित संरचना 1807 की है।
उन्नीसवीं सदी में बिहार के चंपारन के दिगापतिया नरेश ने घाट का पूरा जीर्णोद्धार और मरम्मत कराई; 1830 में निचले हिस्से पर किए गए उनके कार्य के कारण ही सटा हुआ घाट आज दिगपतिया घाट कहलाता है। सीढ़ियाँ अपने वर्तमान रूप में 1965 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पक्की कराई गईं। मंदिर और उसका परिसर चौसट्ठी मंदिर न्यास के अधीन है; घाट का क्षेत्र नगर निगम का है, और उसकी देखरेख मुख्यतः न्यास तथा उन स्थानीय परिवारों पर टिकी है जो उसे रोज़ काम में लाते हैं।

वास्तुकला
घाट और मंदिर-परिसर का धरोहर-क्षेत्र मिलाकर लगभग 0.30 हेक्टेयर दर्ज है। दशाश्वमेध के चौड़े रंगमंच की तुलना में चौसट्टी सँकरा और खड़ा है — जल से सीधे मंदिर के द्वार तक चढ़ती एक सघन सीढ़ी, जो 1807 में बनी, 1830 में नीचे की ओर बढ़ी और 1965 में पुनः पक्की हुई; इस तरह तीन अलग-अलग कालों की चिनाई एक ही छोटी चढ़ाई में एक के ऊपर एक बैठी है।
शिखर पर चौसट्ठी देवी का मंदिर है, आकार में साधारण, जिसके परिसर में काली की, शिव, गणेश और कार्तिकेय की, तथा उन लोक-देवियों की पुरानी प्रतिमाएँ हैं जिनकी उपासना काशी में पौराणिक देवताओं के साथ-साथ चलती रही है। मयूरी नाम की मयूरमुखी योगिनी-प्रतिमा घाट की सीढ़ियों में जड़ी है, और गजमुखी गजानना देवी के निकट ही — ये मूर्तियाँ प्रदर्शन में नहीं, पूजा में हैं।
घाट को दोनों ओर से घेरने वाले दो महल इस अग्रभाग को उसका विशिष्ट अंतर देते हैं। उत्तर का राणा महल राजस्थानी शिल्प का स्पष्ट उदाहरण है: गंगा की ओर मुख किए तीन बरामदे, पत्थर की जालीदार खिड़कियाँ, हर पाँच सीढ़ी पर एक चबूतरा, और ऊपरी चढ़ाई में उत्तर तथा दक्षिण की ओर बने आलों में स्थापित शिवलिंग; ऊपर गली में वक्रतुंड विनायक का स्थान है। दक्षिण का दिगपतिया महल बंगाली शैली में बना है, जिसके दोनों ओर बरामदे हैं। इन्हीं दोनों के बीच से देवी की सीढ़ी सीधी-सादी उतरकर नदी तक जाती है।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
घाट की नित्य साधना स्नान और मौन उपासना है। भक्त सीढ़ियों पर गंगा स्नान करते हैं और ऊपर मंदिर में देवी के दर्शन के लिए चढ़ते हैं, जहाँ पुजारी के माध्यम से लाल पुष्प, सिंदूर और दीप अर्पित किए जाते हैं। आसपास की गलियों के परिवार — जिनमें अनेक बंगाली घर हैं — इन्हीं सीढ़ियों पर प्रात:स्नान करते हैं और यहीं जीवन के छोटे संस्कार निभाते हैं; और सामने बहती नदी के साथ चुपचाप बैठकर ध्यान करने के लिए यह घाट विशेष रूप से प्रिय है।
दो अवसर इस घाट के अपने माने जाते हैं। धरोहर-प्रलेखना बताती है कि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी (मार्च–अप्रैल) को अनेक तीर्थयात्री योगिनी मंदिर के दर्शन करते हैं और इसी घाट पर विधिपूर्वक स्नान करते हैं; और होली की संध्या को यहाँ एक श्रद्धांजलि-विधान संपन्न होता है। वाराणसी ज़िले की सूचियाँ नवरात्रि को, तथा होली से पहले रंगभरी एकादशी के आसपास किए जाने वाले अर्पणों को भी उन अवसरों में गिनती हैं जब घाट और मंदिर सबसे अधिक सक्रिय रहते हैं।
चौसट्टी पर दशाश्वमेध जैसी औपचारिक संध्या गंगा आरती नहीं होती; वह महाआरती नीचे की ओर थोड़ी ही दूर है, और अनेक यात्री पहले यहाँ देवी के दर्शन कर फिर वहाँ पहुँचते हैं। मंदिर अपने न्यास और पुजारियों के अनुसार समय रखता है, जो ऋतु और पर्व के साथ बदलता है; दर्शन के दिन मंदिर पर ही समय की पुष्टि कर लेना उचित है।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
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| Pilgrim Guidance | कैसे पहुँचेंसबसे सरल रास्ता दशाश्वमेध से तट-तट चलते हुए ऊपर की ओर है — शीतला, अहिल्याबाई, मुंशी, दरभंगा और राणा महल घाट पार करते हुए लगभग दस से पंद्रह मिनट की इत्मीनान भरी पैदल दूरी। ऊपर की गलियों से आना हो तो पुराने शहर के सोनारपुरा–बंगाली टोला की ओर से एक सँकरी गली सीधे मंदिर के द्वार तक उतरती है। दशाश्वमेध या असी से नाव भी आपको सीढ़ियों पर उतार देगी; नदी से पहचान इस तरह होती है कि राणा महल के राजस्थानी बरामदों और दिगपतिया के बंगाली शैली के महल के बीच एक खड़ी, सँकरी सीढ़ी ऊपर चढ़ती दिखती है। देवी-दर्शन और नीचे का घाटअधिकांश यात्री दोनों को एक ही यात्रा मानते हैं: सीढ़ियों पर स्नान या गंगाजल का स्पर्श, और फिर ऊपर चौसट्ठी देवी मंदिर तक चढ़ाई। मंदिर छोटा है, और पर्व के दिनों को छोड़कर दर्शन बिना भीड़ के हो जाते हैं। लाल पुष्प, सिंदूर और एक दीया सामान्य अर्पण हैं, जो पुजारी के हाथों चढ़ाए जाते हैं। यदि आप काशी यात्रा के अंग के रूप में घाट-मार्ग चल रहे हों तो चौसट्टी दक्षिण के केदार घाट और उत्तर के दशाश्वमेध के बीच स्वाभाविक रूप से पड़ता है, और उसी सुबह किसी एक के साथ जोड़ा जा सकता है। तैयारी और सर्वोत्तम समय
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स्थान
Varanasi, UP
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