चेत सिंह घाट काशी के दक्षिणी अर्धचंद्र पर, शिवाला क्षेत्र में पड़ता है — असी से उत्तर की ओर गिनें तो तेरहवाँ घाट। सीढ़ियों के ऊपर बनारस के महाराजा चेत सिंह (शासन 1770-1781) का किलानुमा गंगा-मुखी महल उठता है। उसकी छत, उसका विशाल प्रवेश-द्वार और कोनों पर बने अष्टकोणीय गुंबददार मंडप इस पूरे भाग को ऐसी पहचान देते हैं कि नाव से घाट तुरंत पहचान में आ जाता है। काशी के घाटों के लिए तैयार धरोहर-दस्तावेज़ में दर्ज है कि इस परिसर में अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में बने तीन राजकीय शिव मंदिर स्थित हैं।
नीचे का घाट काम आने वाला स्नान-घाट है, और शांत है। इसका उपयोग शिवाला मुहल्ले के परिवार करते हैं, ठीक उत्तर के अखाड़ों के संन्यासी करते हैं, और वे यात्री करते हैं जो दशाश्वमेध की भीड़ के बिना स्नान करना चाहते हैं। यहाँ का दिन साधारण पवित्र कामों से बनता है — पौ फटते ही डुबकी, लोटे में गंगाजल लेकर ऊपर की चढ़ाई, नियत तिथियों पर पितरों का तर्पण, और संध्या को जल पर रखा एक दीया। वाराणसी की ज़िला धरोहर-सूची इस स्थल का वर्णन बस इतना करती है कि यहाँ संन्यासी जप करते हैं और यात्री स्नान करते हैं — और आज भी यही सच है।
घाट-क्रम में चेत सिंह घाट दक्षिण में पंचकोट घाट और उत्तर में निरंजनी घाट के बीच है; उसके आगे महानिर्वाणी और शिवाला घाट पड़ते हैं। ये पड़ोसी घाट कभी इसी राजपरिसर का हिस्सा थे। धरोहर-अभिलेख बताते हैं कि बनारस राजपरिवार ने इसका उत्तरी भाग दशनामी परंपरा के नागा संन्यासियों को दान कर दिया, जिन्होंने वहाँ अपने अखाड़े और अपने घाट बनाए; निरंजनी अखाड़े की स्थापना वहाँ लगे एक अभिलेख के अनुसार 1897 की है। इस तरह कुछ सौ क़दमों में ही यात्री एक राजा की नदी-छत से उतरकर विरक्तों की बस्ती में पहुँच जाता है — काशी के दो बड़े धर्मों, राज और त्याग, को नदी किनारे की एक छोटी-सी चहलक़दमी में समेटता हुआ।

भक्ति की दृष्टि में काशी के तट का कोई भाग साधारण भूमि नहीं है। इस किनारे की गंगा को भी वैसे ही ग्रहण किया जाता है जैसे पूरे नगर में — काम में आने वाली नदी की तरह नहीं, माँ की तरह — और यहाँ लिया गया स्नान काशी में लिया गया स्नान है, उन सब अर्थों के साथ जो परंपरा उससे जोड़ती है। सीधे शब्दों में यही चेत सिंह घाट की पवित्रता है।
इस घाट की अपनी कोई अलग पौराणिक कथा नहीं है, और यह बात सीधे कह देना ही ठीक है। इसका भक्ति-भार तीन चीज़ों से बनता है, और तीनों की ओर उँगली उठाई जा सकती है। पहली है स्वयं गंगा। दूसरे हैं शिव — पूरे मुहल्ले का नाम ही इन सीढ़ियों के ऊपर बने शिवालों से आया है, और महल-परिसर में बनारस राजपरिवार के बनवाए तीन शिव मंदिर हैं; अर्थात् जब से यह किनारा बना हुआ किनारा है, तब से शैव भूमि है। और तीसरी है संन्यासियों की उपस्थिति।
विरक्तों से बना यह भाग
घाट के ठीक उत्तर में, उसी भूमि पर जो बनारस के शासकों ने स्वयं दान की थी, निरंजनी और महानिर्वाणी अखाड़ों के नागा संन्यासी रहते हैं, जिन्हें धरोहर-अभिलेख दस दशनामियों में गिनते हैं — वही संप्रदाय, जिसे परंपरा आदि शंकराचार्य से जोड़ती है। धरोहर-दस्तावेज़ में उल्लेख है कि निरंजनी अखाड़े के परिसर में कार्तिकेय का मंदिर है, जिसे वाराणसी का एकमात्र कार्तिकेय मंदिर बताया गया है, तथा गुरु निरंजनी की चरण-पादुकाओं वाले मंदिर और दुर्गा, गौरी-शंकर एवं गंगा की मूर्तियाँ भी वहीं हैं। शिव-परिवार के प्रति निष्ठा रखने वाले भक्त अकसर केवल इसी कारण यह छोटा-सा भाग पैदल तय करते हैं।
यात्रियों के लिए चेत सिंह घाट का महत्व कथा से अधिक स्थिति में है। यहीं आकर काशी का तट असी की ओर के खुले, बाग़-जैसे दक्षिणी विस्तार से बदलकर वह सघन, बहुमंज़िला, मंदिरों से भरा किनारा बनने लगता है जो केदार और दशाश्वमेध तक चला जाता है। भोर में इन सीढ़ियों पर खड़ा यात्री अर्धचंद्र के दोनों रूप एक साथ देख सकता है।
इतिहास
इस किनारे का भक्ति-जीवन यहाँ की किसी भी इमारत से पुराना है; इतिहास केवल यह बताता है कि पत्थर कब रखा गया। शिवाला घाट के धरोहर-दस्तावेज़ में दर्ज है कि बनारस नरेश और चेत सिंह के पिता राजा बलवंत सिंह ने 1767 में इस भाग को पक्का कराया, और चेत सिंह ने 1770 में, अपने महल के निर्माण-काल में, इसका विस्तार किया। वाराणसी की ज़िला धरोहर-सूची घाट और क़िला दोनों का श्रेय बलवंत सिंह को देती है और बताती है कि यह निर्माण अभियंता बैजनाथ मिश्र के निर्देशन में हुआ, तथा पूरे भाग का मूल नाम शिवाला घाट था। दूसरी ओर काशी के घाटों के लिए तैयार विश्व धरोहर दस्तावेज़ उस किलानुमा महल का निर्माता स्वयं चेत सिंह को बताता है। दोनों अभिलेख परिवार और सदी पर एकमत हैं; व्यक्ति को लेकर जहाँ मतभेद है, वहाँ चुनने के बजाय दोनों बातें कह देना ही उचित है।
चेत सिंह नारायण वंश के बनारस राज्य के तीसरे शासक थे और 1770 में अपने पिता के उत्तराधिकारी बने। 1781 में ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती माँगों को अस्वीकार करने पर इसी परिसर में उनकी सेना और वॉरेन हेस्टिंग्स की सेना आमने-सामने आ गई। चेत सिंह पराजित हुए, क़िला छोड़ा, और 1810 में ग्वालियर में उनका देहांत हुआ; 14 सितंबर 1781 को उसी वंश के महीप नारायण सिंह बनारस की गद्दी पर बैठाए गए (दोनों के बीच का नाता अभिलेखों में एक-सा नहीं मिलता)। बनारस इस प्रसंग को युद्ध की तरह कम और नगर के अपने इतिहास-ग्रंथों में दर्ज एक दोहे की तरह अधिक याद रखता है — घोड़े पे हौदा, हाथी पे जीन, ऐसे भागा वॉरेन हेस्टिंग्स। क़िला अंग्रेज़ों के अधिकार में चला गया और लगभग सवा सौ वर्ष वहीं रहा।
ज़िला धरोहर-सूची के अनुसार 1895 में महाराजा प्रभु नारायण सिंह ने शिवाला की यह संपत्ति बनारस राजपरिवार के लिए पुन: प्राप्त की, और उसी पुनर्प्राप्ति के बाद से यह घाट पुराने नाम शिवाला के स्थान पर चेत सिंह की स्मृति में उनका नाम धारण करता है। परिसर का उत्तरी भाग नागा संन्यासियों को दे दिया गया, और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से वहाँ निरंजनी और महानिर्वाणी अखाड़े तथा उनके घाट विकसित हुए।
एक लुप्त परंपरा का उल्लेख यहाँ बनता है। बीसवीं सदी के मध्य तक चेत सिंह घाट और शिवाला घाट के बीच का जल बुढ़वा मंगल का मंच था — बनारसी संगीत का वह वसंत-उत्सव, जब सजी हुई नावें इस पूरे विस्तार में बाँधी जातीं और अलग-अलग गायक-वादक मंडलियाँ रात भर अपनी कला प्रस्तुत करतीं। यहाँ यह परंपरा टूट गई; बाद में उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग ने उसका एक रूप उत्तर की ओर राजेंद्र प्रसाद घाट पर पुनर्जीवित किया।
महल और उसका परिसर आज बनारस के महाराजा के काशीराज ट्रस्ट के अधीन है, संपदा की अन्य संपत्तियों के साथ।

वास्तुकला
इस स्थल का वैभव नीचे की सीढ़ियों में नहीं, ऊपर की छत में है — और उसे नदी से देखना चाहिए, क्योंकि वह वहीं से देखे जाने के लिए बना था। धरोहर-दस्तावेज़ महल का वर्णन करते हुए कहता है कि गंगा से इसका संबंध विशेष रूप से घनिष्ठ है: यह सीधे घाट पर खुलता है, और घाट इस इमारत की सेवा भर नहीं करता, उसका विस्तार है; प्रवेश विशाल द्वारों से होता है। द्वार के भीतर वह सीढ़ी है जो छत तक ले जाती है, और उस छत पर बना केंद्रीय मंडप गंगा की ओर देखता है — वही स्थान जहाँ से महाराजा नगर को दर्शन देते थे। छत के दो कोनों पर भारी-भरकम संरचनाएँ हैं, जिनके शिखर पर अष्टकोणीय गुंबददार मंडप बने हैं; नाव से घाट की पहचान इन्हीं से होती है।
परिसर एक छोटे दुर्ग की तरह तीन हिस्सों में बना था: गंगा-मुखी मंडपों वाला महल; घर की स्त्रियों के लिए बनी इमारतें, जो अब ध्वस्त हो चुकी हैं; और दरबार तथा जल-स्तंभ वाला मुग़ल शैली का बाग़। भीतर अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में बने तीन राजकीय शिव मंदिर हैं। वाराणसी की ज़िला सूची बताती है कि क़िले की दीवारें आज भी 1781 के निशान रखती हैं — पत्थर में तोप के छेद और दरकी हुई प्राचीरें।
घाट स्वयं सादा है, और यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए: पत्थर की चौड़ी सादी सीढ़ियाँ, जिन पर दरभंगा या मुंशी घाट जैसे तराशे हुए नदी-अग्रभाग नहीं हैं; धरोहर-दस्तावेज़ घाट और महल को मिलाकर लगभग 0.47 हेक्टेयर का क्षेत्र दर्ज करता है। धरोहर-दस्तावेज़ यह भी दर्ज करता है कि परिसर में बाद के निर्माण और मरम्मत अनियोजित रहे हैं और पुरानी बनावट को इससे क्षति पहुँची है। फिर भी जो बचा है वह पढ़ा जा सकता है — एक नदी-महल, जो गंगा की ओर मुख किए खड़ा है और गंगा से ही देखे जाने के लिए बना है।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
यह सबसे पहले स्नान-घाट है, और इसकी क्रियाएँ काशी-तट की वही साधारण क्रियाएँ हैं। भक्त पौ फटते ही गंगा स्नान करते हैं, जल में उतरने से पहले संकल्प लेते हैं, और सूर्य को अर्घ्य देते हैं। पितरों का तर्पण यहाँ अमावस्या को, किसी बुज़ुर्ग की तिथि पर और पितृ पक्ष के पूरे पखवाड़े में होता है — प्राय: किसी स्थानीय पंडा के सहयोग से, किसी संगठित व्यवस्था से नहीं।
इन सीढ़ियों से लिया गया गंगाजल शिवाला मुहल्ले के शिवालों तक चढ़ाया जाता है, और यही इस घाट की सबसे विशिष्ट दैनिक गति है — जल से लिंग तक की छोटी चढ़ाई, जिसे गृहस्थ सावन के सोमवारों और महाशिवरात्रि पर बार-बार दोहराते हैं। कार्तिक में परिवार संध्या के समय जल पर मिट्टी के दीये रखते हैं, दीप-दान के रूप में।
महल-परिसर के तीन शिव मंदिर संपदा के अधीन हैं, किसी सार्वजनिक दर्शन-क्रम का हिस्सा नहीं। धरोहर-दस्तावेज़ में दर्ज है कि महल वर्ष में एक-दो बार किसी आयोजन के लिए ही खोला जाता है, इसलिए यात्री भीतर प्रवेश की योजना बनाकर न आएँ; यह नियमित रूप से खुला संग्रहालय नहीं है। जहाँ द्वार खुला हो और दर्शन की अनुमति हो, वह वहाँ के रखवालों की उदारता है और उसी भाव से ग्रहण की जानी चाहिए। प्रवेश और समय की जानकारी उसी दिन स्थानीय स्तर पर पुष्ट कर लेना ठीक रहता है।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
|---|---|---|
| दà¥à¤µ दà¥à¤ªà¤¾à¤µà¤²à¥ | — | पà¥à¤°à¥ तठपर बहà¥à¤¤ ठधिà¤; à¤à¤¨ सà¥à¤¢à¤¼à¤¿à¤¯à¥à¤ पर मधà¥à¤¯ à¤à¥ à¤à¤¾à¤à¥à¤ सॠà¤à¤® |
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| महाशिवरातà¥à¤°à¤¿ | — | शिवाला à¤à¥ à¤à¤²à¤¿à¤¯à¥à¤ मà¥à¤ ठधिà¤, सà¥à¤¢à¤¼à¤¿à¤¯à¥à¤ पर मधà¥à¤¯à¤® |
| सावन सà¥à¤®à¤µà¤¾à¤° | — | सà¥à¤®à¤µà¤¾à¤° à¤à¥ ठधिà¤, ठनà¥à¤¯ दिनà¥à¤ मà¥à¤ मधà¥à¤¯à¤® |
| à¤à¤à¤à¤¾ दशहरा | — | मधà¥à¤¯à¤® सॠठधिठ|
| पितॠपà¤à¥à¤· तरà¥à¤ªà¤£ | — | मधà¥à¤¯à¤® |
| नितà¥à¤¯ à¤à¤à¤à¤¾ सà¥à¤¨à¤¾à¤¨ | — | à¤à¤® सॠमधà¥à¤¯à¤® |
दà¥à¤µ दà¥à¤ªà¤¾à¤µà¤²à¥: परà¤à¤ªà¤°à¤¾ मानतॠहॠà¤à¤¿ दà¥à¤µ दà¥à¤ªà¤¾à¤µà¤²à¥ पर दà¥à¤µà¤à¤£ à¤à¤¾à¤¶à¥ मà¥à¤ à¤à¤à¤à¤¾-सà¥à¤¨à¤¾à¤¨ à¤à¥ लिठà¤à¤¤à¤°à¤¤à¥ हà¥à¤à¥¤ दà¥à¤¯à¥ à¤à¤¨à¥à¤¹à¥à¤ à¤à¥ सà¥à¤µà¤¾à¤à¤¤ मà¥à¤ रà¤à¥ à¤à¤¾à¤¤à¥ हà¥à¤, à¤à¤° नदॠà¤à¤¾ पà¥à¤°à¤¾ ठरà¥à¤§à¤à¤à¤¦à¥à¤° à¤à¤ हॠठà¤à¤à¤¡ ठरà¥à¤ªà¤£ à¤à¥ तरह दà¥à¤à¤¾ à¤à¤¾à¤¤à¤¾ हà¥à¥¤
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सावन सà¥à¤®à¤µà¤¾à¤°: परà¤à¤ªà¤°à¤¾ शà¥à¤°à¤¾à¤µà¤£ à¤à¥ शिव à¤à¤¾ ठपना मास मानतॠहà¥, à¤à¤° लिà¤à¤ पर à¤à¤à¤à¤¾à¤à¤² à¤à¤¢à¤¼à¤¾à¤¨à¤¾ पà¥à¤°à¥ à¤à¤¾à¤¶à¥ मà¥à¤ à¤à¤¸à¤à¤¾ à¤à¥à¤à¤¦à¥à¤°à¥à¤¯ à¤à¤à¥à¤¤à¤¿-à¤à¤°à¥à¤® हà¥à¥¤
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| Pilgrim Guidance | तट पर घाट की स्थितिचेत सिंह घाट काशी के अर्धचंद्र के दक्षिणी हिस्से में, शिवाला क्षेत्र में है — दक्षिण में पंचकोट घाट और उत्तर में निरंजनी, महानिर्वाणी तथा शिवाला घाट। असी से पैदल चलें तो घाट-मार्ग से बीस-पच्चीस मिनट लगते हैं, और रास्ते में तुलसी, भदैनी, जानकी, आनंदमयी, वच्छराज, जैन, निषादराज, प्रभु और पंचकोट घाट पड़ते हैं। दशाश्वमेध से नीचे उतरें तो केदार, विजयानगरम, लाली, हरिश्चंद्र, कर्नाटक, हनुमान, दंडी, गुलरिया और शिवाला घाट पार करने पड़ते हैं — यह रास्ता लंबा है और हरिश्चंद्र के महाश्मशान से होकर जाता है, जिसे चुपचाप और बिना कैमरा उठाए पार करना चाहिए। कैसे पहुँचें
सर्वोत्तम समयपौ फटने से लगभग नौ बजे तक का समय इस घाट का अपना समय है — स्नान चल रहा होता है, पत्थर ठंडे रहते हैं, और नदी की ओर से सीधी रोशनी महल के मुख पर पड़ती है। दूसरा अच्छा समय देर दोपहर है, और भी शांत, सीढ़ियों पर बैठने के लिए सबसे उपयुक्त। अक्टूबर से मार्च तक का मौसम सबसे अनुकूल है; वर्षा-काल में नीचे की सीढ़ियाँ जल में डूब जाती हैं और उसके बाद हफ़्तों तक पत्थर फिसलन भरा रहता है। कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली पर पूरा तट भर जाता है, यह घाट भी — उस दिन जल्दी पहुँचना और धैर्य रखना दोनों ज़रूरी हैं। |
स्थान
Varanasi, UP
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