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दरभंगा घाट

Varanasi, UP

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सत्यापित · पिछली समीक्षा 5 महीने पहले

काशी की तट-रेखा के मध्य भाग पर बसा एक जीवंत स्नान-घाट, दशाश्वमेध से थोड़ा दक्षिण, जहाँ श्रद्धालु दर्शन के लिए भीतर मुड़ने से पहले गंगा-स्नान करते हैं और पितरों को तर्पण देते हैं। घाट का नाम बिहार के मिथिला राजघराने, दरभंगा के महाराजाओं से आया है, जिन्होंने 1915 में ऊपर बना नदी-तटीय महल ग्रहण किया। महल स्वयं 1812 में श्रीधर नारायण मुंशी ने बनवाया था, और चुनार के बलुआ पत्थर का उसका अग्रभाग इस तट-खंड के स्थलचिह्नों में है।

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दरभंगा घाट काशी की तट-रेखा के मध्य भाग का एक स्नान-घाट है, जो राणा महल घाट और मुंशी घाट के बीच पड़ता है और दशाश्वमेध से थोड़ा ही दक्षिण है। यह किसी एक बड़ी कथा या किसी एक प्रसिद्ध मंदिर का घाट नहीं है। यह उस अटूट पत्थर-शृंखला की एक स्थिर, कार्यरत कड़ी है जो बनारस को गंगा तक उतारती है, और तीर्थयात्री के लिए इसका मोल ठीक यही है — चौड़ी साफ़ सीढ़ियाँ, खुली नदी, और जल में खड़े होकर संकल्प लेने की जगह, जहाँ भीड़ आपको बहा न ले जाए।

यहाँ वही होता है जो इस तट पर सदियों से होता आया है। भोर से पहले श्रद्धालु स्नान के लिए उतरते हैं, सामने गंगा रखकर संकल्प लेते हैं, और अंजुरी में गंगाजल लेकर पितरों को तर्पण अर्पित करते हैं। संध्या को मिट्टी के छोटे दीये धारा पर छोड़े जाते हैं। मल्लाह निचली सीढ़ियों पर नाव बाँधे रहते हैं और यात्रियों को संध्या आरती के लिए दशाश्वमेध की ओर उत्तर ले जाते हैं; अनेक परिवार वही रास्ता घाटों-घाटों पैदल तय करते हैं। दिन भर ये सीढ़ियाँ जितनी यात्री की हैं उतनी ही मोहल्ले की — कपड़े धोते लोग, सुस्ताते बुज़ुर्ग, नदी के सामने चुपचाप बैठे लोग।

सीढ़ियों के ऊपर वह विशाल बलुआ-पत्थर का महल खड़ा है जिससे घाट को उसका वर्तमान नाम मिला। यही इस घाट की दूसरी सीख है। काशी को अकेले काशी ने नहीं बनाया: मराठा, मिथिला, बंगाल, राजपूताना और दक्षिण भारत — हर घराने ने इस तट पर एक भवन, एक घाट या एक धर्मशाला रखी, ताकि उनके लोग मोक्ष-नगरी में स्नान कर सकें, ठहर सकें, और यहीं देह छोड़ सकें। दरभंगा घाट उस लंबी दीवार में मिथिला का पत्थर है।

दरभंगा घाट
दरभंगा घाट, Varanasi, UP

बनारसी परंपरा दरभंगा घाट से कोई अलग कथा नहीं जोड़ती, और उसे जबरन कोई कथा देना उचित भी नहीं होगा। इसकी पवित्रता स्वयं गंगा की पवित्रता है। भक्तजन मानते हैं कि काशी में गंगा उत्तर की ओर मुड़ जाती हैं — उत्तरवाहिनी — और असी से आदि केशव तक फैला यह उत्तरमुखी जल-विस्तार अलग-अलग पवित्र बिंदुओं की माला नहीं, बल्कि एक अखंड तीर्थ है। इस भाव में दरभंगा पर किया गया स्नान उसी पावन जल में किया गया स्नान है जो किसी भी बड़े घाट पर है, और पुण्य सीढ़ी की प्रसिद्धि में नहीं, स्नान करने वाले के संकल्प और श्रद्धा में माना गया है।

पावन क्रम में इसका स्थान स्थिति का विषय है। दरभंगा उसी मध्य-विस्तार के भीतर है जिसमें दशाश्वमेध पड़ता है — वह घाट जो काशी के पंचतीर्थ में गिना जाता है और जिसका स्नान परंपरा में काशी-यात्रा की पूर्णता माना गया है। इस तट पर ठहरे यात्री प्राय: दिन का आरंभ यहीं एक शांत स्नान से करते हैं, फिर पंचतीर्थ स्नान और काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए उत्तर की ओर चलते हैं, और संध्या को लौटते हैं जब पूरी घाट-पंक्ति दीपों से भर जाती है।

गंगा-तट पर एक धर्मनिष्ठ घराना

घाट जो नाम धारण करता है, वह स्वयं एक धार्मिक तथ्य है। मिथिला का दरभंगा राज अपने समय के प्रमुख हिंदू घरानों में था। महाराजा रामेश्वर सिंह, जिनका शासनकाल 1898 से 1929 तक रहा और जिन्हें वाराणसी ज़िले की सूची 1915 में महल ग्रहण करने वाले के रूप में नामित करती है, उस काल की सनातनी सभा भारत धर्म महामंडल के अध्यक्ष रहे, और हिंदू यूनिवर्सिटी सोसाइटी के अध्यक्ष भी रहे। ऐसे घराने के लिए काशी में गंगा-तट पर स्थान रखना उसी कोटि का कर्म था जैसा किसी पाठशाला या मंदिर का दान — तीर्थ पर सदा के लिए खड़े रहने का एक ढंग।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

यहाँ का पत्थर उन्नीसवीं सदी के आरंभ का है। वाराणसी के घाटों के धरोहर-अभिलेख बताते हैं कि नागपुर रियासत के वित्त-मंत्री श्रीधर नारायण मुंशी ने यह घाट और ऊपर के महल का एक भाग बनवाया था, और इसी कारण यह पूरा विस्तार मुंशी घाट कहलाता था। वाराणसी ज़िले की सूची इस निर्माण का वर्ष 1812 बताती है।

1915 में दरभंगा के महाराजा ने महल ग्रहण किया और घाट का विस्तार कराया; विस्तारित भाग दरभंगा घाट कहलाने लगा, जबकि सटा हुआ हिस्सा आज भी मुंशी घाट के पुराने नाम से जाना जाता है। ब्योरों पर स्रोत एकमत नहीं हैं: वाराणसी ज़िले की सूची रामेश्वर सिंह बहादुर को वह महाराजा बताती है जिन्होंने संपत्ति ली, जबकि कुछ विवरण घराने के किसी परवर्ती शासक का नाम लेते हैं; यह भी विवाद में है कि महल क्रय किया गया था या भेंट में मिला। जो विवाद में नहीं है, वह है वर्ष और घराना।

इस पूरे दौर में नीचे का घाट अपना साधारण पावन कर्म बिना रुके करता रहा — भोर का स्नान, तर्पण, संध्या के दीये — और सीढ़ियाँ आज भी किसी निजी स्वामी की नहीं, नगर निगम की देखरेख में हैं।

ऊपर का भवन 1994 में फिर हस्तांतरित हुआ, जब क्लार्क्स होटल समूह ने उसे लेकर धरोहर-होटल में बदलने के लिए ब्रिजरामा पैलेस नाम दिया। स्थल के धरोहर-अभिलेख दर्ज करते हैं कि उस रूपांतरण में पुराने ढाँचे का बड़ा भाग गिराकर उसे अधिक ऊँचा और चौड़ा बनाया गया, और आगे की तोड़-फोड़ तब रुकी जब नागरिक संरक्षण संस्थाओं ने समाज और न्यायालय के सहयोग से यह विषय उठाया। इसलिए यात्री जो अग्रभाग देखते हैं उसे एक जीर्णोद्धारित और काफ़ी हद तक पुनर्निर्मित रूप समझें — जो खड़ा एक प्राचीन और प्रामाणिक स्थल पर ही है।

दरभंगा घाट — historic view

वास्तुकला

घाट स्वयं सामान्य और उत्तम बनारसी ढंग का है: चरणों में जल तक उतरती चौड़ी पत्थर-सीढ़ियाँ, बीच-बीच में चौड़े चबूतरे जहाँ परिवार अपनी गठरियाँ रख सकें, और सबसे नीचे वह पंक्ति जिसे हर वर्षा-ऋतु में नदी लौटा लेती है और हर जाड़े में वापस दे देती है। पत्थर चुनार का गरम बादामी बलुआ पत्थर है, जो ऊपर की ओर की खदानों से आकर वाराणसी के पुराने घाटों में सर्वत्र लगा है और नंगे पाँवों तथा नदी की गाद से घिसकर चिकना हो चुका है।

ऊपर का महल इस तट-खंड की विशिष्ट पहचान है। धरोहर-अभिलेख उसे चुनार के बलुआ पत्थर से बना बताते हैं, गहरे बरामदों और यूनानी स्तंभों के साथ — वे नव-शास्त्रीय स्तंभ जो उन्नीसवीं सदी में बनारस के नदी-तटीय भवनों में आए। नदी की ओर की छतें, पंक्तिबद्ध झरोखे और मेहराबदार ऊँचा अग्रभाग भवन को वह लंबवत उपस्थिति देते हैं जिससे वह जल से देखने पर दिशासूचक स्थलचिह्न बन जाता है।

नदी के बीच से नाव पर बैठकर देखें तो दरभंगा का अग्रभाग मध्य घाट-पंक्ति की सुदृढ़ खड़ी रेखाओं में गिना जाता है, राणा महल घाट और मुंशी घाट के बीच खड़ा। पर स्मरण रहे कि काशी में ये भवन कभी मूल विषय नहीं थे। मूल विषय सीढ़ियाँ हैं; भवन वह हैं जो धर्मनिष्ठ घरानों ने सीढ़ियों के पीछे खड़े किए, ताकि सीढ़ियाँ बनी रहें।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

दरभंगा स्नान-घाट है, मंदिर-घाट नहीं, और उसकी साधना भी उसी अनुरूप सरल और नित्य है, आयोजनपरक नहीं। यहाँ अपनी कोई आरती नहीं होती।

सूर्योदय से पहले भक्त गंगा स्नान के लिए उतरते हैं, नदी की ओर मुख कर संकल्प लेते हैं, और तर्पण अर्पित करते हैं — अंजुरी में जल और कुश लेकर पितरों को दिया जाने वाला अर्घ्य — यह कर्म इन सीढ़ियों पर प्रतिदिन प्रात: होता है। कुछ लोग घर के देवस्थान के लिए छोटे लोटे में गंगाजल भर ले जाते हैं। संध्या को मिट्टी के दीये धारा पर छोड़े जाते हैं, और कार्तिक मास भर घाट-पंक्ति पर वैसे ही दीप उठाए जाते हैं जैसे पूरे बनारस में।

संध्या दशाश्वमेध की होती है। दरभंगा के आसपास ठहरे अधिकांश यात्री या तो गंगा आरती के लिए घाटों-घाटों उत्तर चल पड़ते हैं, या यहीं की निचली सीढ़ियों से नाव लेते हैं, जिससे आरती-मंचों का बिना भीड़ का, इत्मीनान वाला दर्शन मिल जाता है। देव दीपावली पर पूरी घाट-पंक्ति, यह घाट भी, मिट्टी के दीपों की कतारों से जगमगा उठती है, और उस एक रात यह घाट स्वयं भी दीपदान का स्थल बन जाता है।

उत्सव एवं पर्व

उत्सवकबभीड़
देव दीपावलीअत्यधिक — दोपहर से ही पूरी घाट-पंक्ति भर जाती है
कार्तिक पूर्णिमा और कार्तिक स्नानमास भर अधिक, पूर्णिमा पर अत्यधिक
गंगा दशहराबहुत अधिक
छठ पूजाबहुत अधिक
मकर संक्रांतिबहुत अधिक

देव दीपावली: परंपरा मानती है कि इस रात देवता काशी में गंगा-स्नान के लिए उतरते हैं, और घाटों के दीये उन्हीं के स्वागत में जलाए जाते हैं। भक्तजन इस दिन को त्रिपुरासुर पर शिव की विजय से भी जोड़ते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा और कार्तिक स्नान: पुराण कार्तिक मास में गंगा-तीर्थ पर स्नान को महान पुण्यदायी कहते हैं, और कार्तिक पूर्णिमा इस मास का सबसे शुभ स्नान-दिवस मानी जाती है।

गंगा दशहरा: परंपरा कहती है कि इस दिन गंगा-तीर्थ पर स्नान दस प्रकार के पापों को हर लेता है — वही दश-पाप जिनसे पर्व का नाम बना है।

छठ पूजा: छठ सूर्यदेव और छठी मैया को परिवार के कल्याण हेतु अर्पित होती है। यह व्रत हिंदू पंचांग के सबसे कठिन व्रतों में है, जो लंबे निर्जल उपवास के साथ रखा जाता है।

मकर संक्रांति: सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण के आरंभ का चिह्न। इस दिन गंगा-तीर्थ पर स्नान और दान विशेष पुण्यदायी माने गए हैं।

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कैसे पहुँचें

सामान्य रास्ता गोदौलिया चौराहे से पैदल है — गलियों से होते हुए नदी की ओर, फिर अहिल्याबाई और मुंशी घाट पार करते हुए घाटों-घाटों दक्षिण। बलुआ पत्थर का ऊँचा महल-मुख दूर से पहचान में आ जाता है और वही स्थलचिह्न है। काशी विश्वनाथ से यह तट के सहारे दक्षिण की ओर थोड़ी दूर है। जल-मार्ग से दशाश्वमेध या अस्सी से ली गई कोई भी नाव आपको इन सीढ़ियों पर उतार देगी, और मल्लाह घाट को नाम से जानते हैं। वाहन घाट तक नहीं आते; अंतिम हिस्सा सदा गलियों से पैदल ही है।

क्या अपेक्षा रखें

यह दशाश्वमेध से शांत घाट है, जितना यात्रियों का उतना ही स्थानीय लोगों का, जहाँ बिना दबाव के स्नान करने और बैठने की जगह मिल जाती है। जल-रेखा के पास सीढ़ियाँ गीली और फिसलन भरी रहती हैं — धीरे उतरें और बुज़ुर्गों को सहारे वाली ओर रखें। वर्षा-ऋतु में निचली सीढ़ियाँ डूब जाती हैं और स्नान की पंक्ति ऊपर खिसक आती है। ऊपर का महल निजी धरोहर-होटल है; सीढ़ियाँ सार्वजनिक हैं, पर संपत्ति की सीमा वहीं से आरंभ होती है जहाँ छतें आरंभ होती हैं।

आने का सर्वोत्तम समय

काशी यात्रा के लिए अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल ऋतु है, और विशेषकर कार्तिक में ये सीढ़ियाँ मास-पर्यंत स्नान करने वाले श्रद्धालुओं से भरी रहती हैं। पहली किरण से लगभग नौ बजे तक का समय घाट का सबसे भक्तिमय समय है। देर अपराह्न की धूप बलुआ पत्थर के अग्रभाग पर पूरी पड़ती है और भवन का चित्र लेने के लिए वही सर्वोत्तम घड़ी है। यदि उद्देश्य स्नान है तो गहरे मानसून के सप्ताह टालें, क्योंकि तब यहाँ धार तेज़ रहती है और सुरक्षित स्नान-क्षेत्र बहुत सिमट जाता है।

स्थान

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