दिगपतिया घाट काशी-चाप पर पत्थर की एक छोटी सीढ़ी-श्रृंखला है, जो सर्वेश्वर घाट और चौसट्ठी घाट के बीच पड़ती है। वाराणसी के तट की धरोहर-प्रलेखना में दिगपतिया और चौसट्ठी को एक ही पावन परिसर माना गया है — लगभग 0.30 हेक्टेयर का क्षेत्र, जिसके शीर्ष पर चौसट्ठी देवी का मंदिर है, अर्थात चौंसठ योगिनियों का स्थान। घाट का नाम इसके उन्नीसवीं सदी के संरक्षक से आया है: अभिलेखों में चंपारण (बिहार) के दिगपतिया के राजा का नाम मिलता है, जिन्होंने 1830 में घाट का यह निचला भाग बनवाया, और जिनके विषय में दर्ज है कि आगे उन्नीसवीं सदी में उन्होंने पूरे घाट की मरम्मत और जीर्णोद्धार कराया।
यह भीड़ वाला नहीं, मोहल्ले का कामकाजी घाट है। सुबह आसपास की गलियों से स्नानार्थी उतरते हैं, जल-किनारे धुलाई होती है, पत्थर से बँधी नावें डोलती हैं — काशी के उस घाट की सहज, बिना जल्दी वाली भक्ति, जहाँ न कोई आरती होती है और न भीड़ जुटती है। जो संकल्प लेकर आते हैं, वे प्राय: देवी के लिए आते हैं — पहले जल पर स्नान, फिर ऊपर मंदिर-प्रांगण तक की चढ़ाई। सीढ़ियों पर ही मयूरी योगिनी की पाषाण प्रतिमा है; धरोहर-प्रलेखना के अनुसार पारंपरिक चौंसठ योगिनी-प्रतिमाओं में से केवल सोलह ही अब वाराणसी में शेष हैं, और उनमें दो चौसट्ठी देवी के निकट हैं — इन्हीं में मयूरी घाट की सीढ़ियों पर है।
सीढ़ियों के ऊपर दिगपतिया संरक्षक का बनवाया भवन खड़ा है, जिसके दोनों ओर बरामदे हैं और जिसकी शैली को धरोहर-प्रलेखना बंगाली कहती है। यह अब राजमहल नहीं रहा; आज इसमें सीताराम ओंकार दास काशी आश्रम है, अर्थात भवन तट की भक्ति-परंपरा से बाहर नहीं गया, उसी के भीतर बना रहा। यात्रियों के लिए दिगपतिया दशाश्वमेध से नदी के साथ-साथ कुछ ही मिनट की चाल पर है — अहिल्याबाई, मुंशी, दरभंगा और राणा महल घाटों से होते हुए — इतना पास कि सुबह की घाट-यात्रा में सहज जुड़ जाए, और इतना शांत कि यह मोड़ लेना सार्थक लगे।

तट के इस भाग की पावन पहचान योगिनियों से है। वाराणसी तट की धरोहर-प्रलेखना बताती है कि काशी खंड (61.176–177) इस घाट का और योगिनी-प्रतिमाओं का वर्णन करता है तथा यहाँ दो जल-तीर्थों का उल्लेख करता है — जल से जुड़े पावन स्थल। वही अभिलेख कहते हैं कि देवी चौसट्ठी और उनका घाट गिर्वाण-पदमंजरी (1600–60) में अंकित हैं, जिससे यह स्थान केवल बाद की लोक-स्मृति नहीं, बल्कि काशी की प्रलेखित तीर्थ-परंपरा का अंग ठहरता है।
परंपरा योगिनियों को देवियों के सबसे प्राचीन समूहों में गिनती है। उनकी संख्या चौंसठ की व्याख्या भक्ति-परंपरा और विद्वत्-परंपरा दोनों में दिशा और गुणन के प्रतीक के रूप में की जाती है: आठ मातृ-देवियाँ, और प्रत्येक की आठ सहायक देवियाँ; अथवा पृथ्वी की आठ दिशाएँ और उनके समक्ष आकाश-लोक की आठ दिशाएँ। दोनों ही भावों में चौंसठ उस पूर्णता का सूचक है जो भक्त को हर ओर से घेर लेती है।
यात्री के लिए दर्शन का क्रम स्वयं एक अर्थ रखता है। पहले गंगा — सीढ़ियों पर स्नान, थोड़ा जल अर्पण, संकल्प — और उसके बाद ही देवी तक चढ़ाई। नीचे जल, ऊपर शक्ति: यह घाट कोई दृश्य-स्थल नहीं, एक देहरी है, और भक्ति-भाव में स्नान ही वह तैयारी है जो दर्शन के योग्य बनाती है।
इतिहास
इस घाट की भक्ति-परंपरा इसके पत्थरों से पुरानी है। दिगपतिया चौसट्ठी घाट का निचला भाग माना जाता है, इसलिए अभिलेख दोनों का साझा है। धरोहर-प्रलेखना के अनुसार देवी चौसट्ठी और उनका घाट गिर्वाण-पदमंजरी (1600–60) में नामांकित हैं, और काशी खंड यहाँ की योगिनी-प्रतिमाओं का वर्णन करता है — अर्थात वर्तमान सीढ़ियों के बनने से बहुत पहले यह एक प्रतिष्ठित तीर्थ था। वही अभिलेख बताते हैं कि इसी घाट ने संस्कृत मनीषी मधुसूदन सरस्वती (1540–1623) को आश्रय दिया था, जिन्हें अद्वैत-परंपरा में स्मरण किया जाता है।
निर्माण की कथा कई हाथों से होकर गुज़री है। घाट पहली बार सोलहवीं सदी के उत्तरार्ध में राजा प्रतापादित्य के समय पक्का बना, और वह काम समय के साथ आंशिक रूप से नष्ट हो गया। लगभग 1670 में उदयपुर के राजा ने इसका जीर्णोद्धार और विस्तार कराया। वर्तमान निर्मित ढाँचा 1807 का है। अठारहवीं सदी तक चौसट्ठी देवी की मुख्य प्रतिमा पास के राणा महल में थी, जिसे बाद में उस स्थान पर लाया गया जहाँ आज उसकी पूजा होती है।
दिगपतिया नाम उन्नीसवीं सदी की देन है। धरोहर-प्रलेखना के अनुसार दिगपतिया के राजा ने — जिन्हें वाराणसी हेरिटेज डोज़ियर चंपारण, बिहार का बताता है — 1830 में घाट का निचला भाग बनवाया, पूरे घाट की मरम्मत और नवीकरण कराया, और सीढ़ियों के ऊपर बंगाली शैली का भवन खड़ा किया। इसी संरक्षण से निचला घाट दिगपतिया कहलाया। सीढ़ियों को आज का पक्का रूप 1965 में उत्तर प्रदेश सरकार ने दिया। आज मंदिर की देखरेख चौसट्ठी मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय परिवार करते हैं, और घाट नगर निगम के अधीन है; पर इस स्थान को जीवित किसी संरक्षण-योजना ने नहीं, मोहल्ले की अखंड दैनिक पूजा ने रखा है।

वास्तुकला
दिगपतिया एक छोटा घाट है, और इसका स्वरूप तीन चीज़ों के संबंध से बनता है: जल, पत्थर की छोटी सीढ़ी-श्रृंखला, और उनके ऊपर खड़ा भवन। सीढ़ियों को वर्तमान पक्का रूप 1965 में उत्तर प्रदेश सरकार के पुनर्निर्माण से मिला। घाट और मंदिर-परिसर मिलाकर लगभग 0.30 हेक्टेयर का क्षेत्र है — अर्थात यह एक सिमटी हुई उतराई है, दशाश्वमेध जैसा चौड़ा पत्थर-रंगमंच नहीं।
दिगपतिया संरक्षक का बनवाया भवन ही यहाँ की दृष्टि-केंद्र है। धरोहर-प्रलेखना उसे बंगाली कला और शैली का एक सुगठित, वास्तु-कुशल निर्माण बताती है, जिसके दोनों ओर बरामदे बने हैं। आज इसमें सीताराम ओंकार दास काशी आश्रम है, इसलिए इसके कक्ष और बरामदे आज भी भक्ति-उपयोग में हैं।
सीढ़ियों के ऊपर और बगल में चौसट्ठी देवी का मंदिर-प्रांगण है, जिसमें काली, शिव, गणेश और कार्तिकेय की तथा लोक-देवियों की पुरानी प्रतिमाएँ हैं। चौसट्ठी देवी के निकट दो योगिनी-प्रतिमाएँ शेष हैं — पास के एक घर में दर्ज गजानना, अर्थात गजमुखी, और स्वयं घाट की सीढ़ियों पर मयूरी, अर्थात मयूरमुखी। इसकी गरिमा विस्तार में नहीं, निरंतर उपयोग में है।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
दिगपतिया पर जो कुछ होता है, वह अधिकतर एक नदी-घाट का नित्य आचरण है: भोर का स्नान, घर के देवस्थान के लिए लोटे में ले जाया गया गंगाजल, पितरों के लिए तर्पण, संध्या को जल पर छोड़ा गया एक दीप। यहाँ कोई संगठित आरती नहीं है, न आगंतुकों के लिए कोई आयोजन; लय घरेलू है और अटूट है।
वर्ष में दो अवसर यात्रियों को विशेष रूप से इन सीढ़ियों तक लाते हैं। चैत्र कृष्ण द्वादशी (मार्च–अप्रैल) को श्रद्धालु बड़ी संख्या में योगिनी मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं और इसी घाट पर विधिवत स्नान करते हैं। दूसरा अवसर होली की संध्या है, जो चैत्र के आरंभ का सूचक है, जब घाट पर श्रद्धांजलि-विधि सम्पन्न होती है।
जो यात्री यहाँ औपचारिक संकल्प, तर्पण या श्राद्ध कराना चाहते हैं, वे व्यवस्था पहले से कर लें — यह आशा न रखें कि बड़े घाटों की तरह पंडे सीढ़ियों पर प्रतीक्षा करते मिलेंगे। चौसट्ठी देवी मंदिर के दर्शन-समय ट्रस्ट द्वारा निर्धारित होते हैं; जाने वाले दिन स्थानीय स्तर पर पुष्टि कर लेना उचित है।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
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| Pilgrim Guidance | घाट कहाँ पड़ता हैदिगपतिया वाराणसी के घाटों के मुख्य दक्षिणी चाप पर, सर्वेश्वर घाट और चौसट्ठी घाट के बीच है; आगे राणा महल, दरभंगा और मुंशी घाट पड़ते हैं। सबसे सरल रास्ता दशाश्वमेध से नदी के साथ-साथ पैदल चलना है — शीतला, अहिल्याबाई, मुंशी, दरभंगा और राणा महल से होते हुए कुछ ही मिनट। पीछे की गलियों से, दशाश्वमेध मार्ग से उतरकर भी पहुँचा जा सकता है, या नाव से — मल्लाह से चौसट्ठी पर उतारने को कहें। मानसून में जब जल निचली सीढ़ियों के ऊपर चढ़ जाता है, तो घाटों के बीच का तटीय रास्ता प्राय: बंद रहता है और गली वाला मार्ग ही एकमात्र विकल्प बचता है। आने का सर्वोत्तम समयभोर का समय वह है जब घाट सबसे अधिक अपना-सा लगता है — स्नानार्थी, उस पार पड़ती धूप, गुज़रती नावें। अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल ऋतु है। चैत्र कृष्ण द्वादशी और होली की संध्या — अभिलेखों में यही दो दिन घाट पर जमावड़े के रूप में दर्ज हैं। जुलाई से सितंबर के मानसून-चरम से बचें, जब निचली सीढ़ियाँ डूबी और फिसलन भरी रहती हैं। क्या अपेक्षा रखेंयह छोटा और अलंकरण-रहित घाट है, और इसे इसी भाव से देखना चाहिए। सीढ़ियों पर कोई सुविधा नहीं है, न दुकानें, न कोई औपचारिक आयोजन। अपना जल साथ रखें, स्नान करना हो तो अंगवस्त्र, और मंदिर में अर्पण के लिए छुट्टे पैसे। घाट की सीढ़ियाँ ऊबड़-खाबड़ हैं और नदी की गाद से चिकनी हो सकती हैं, इसलिए बुजुर्ग यात्रियों के साथ हों तो जल की ओर से चढ़ने के बजाय गली से मंदिर तक जाना बेहतर रहेगा। लंबी घाट-यात्रा के साथ जोड़ रहे हों तो यहाँ बीस से तीस मिनट रखें; बैठना चाहें तो उससे अधिक। |
स्थान
Varanasi, UP
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