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गंगा महल घाट

Varanasi, UP

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सत्यापित · पिछली समीक्षा 5 महीने पहले

काशी के दक्षिणी छोर पर, अस्सी घाट से सीढ़ी-दर-सीढ़ी जुड़ा हुआ स्नान-घाट, जिसका नाम ऊपर खड़े गंगा महल से आया है। धरोहर-अभिलेख इसका निर्माण लगभग 1830 में बनारस राजपरिवार के संरक्षण में बताते हैं। यहाँ अपनी कोई आरती नहीं होती — इस घाट का धार्मिक जीवन वही प्रात:कालीन स्नान है जो अस्सी से चला आता है, पंचतीर्थ के पहले स्नान से।

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गंगा महल घाट काशी के घाट-क्रम के दक्षिणी सिरे पर है, अस्सी घाट के ठीक उत्तर में। दोनों के बीच केवल पत्थर की एक सीढ़ी-पंक्ति का अंतर है, और घाटों का धरोहर-लेखा गंगा महल को अलग हैसियत वाला घाट नहीं, बल्कि अस्सी घाट का ही विस्तारित भाग बताता है। नाम ऊपर के महल का है: गंगा महल, गंगा की ओर मुँह किए एक निवास, जिसका निर्माण लगभग 1830 में बनारस राजपरिवार के संरक्षण में हुआ, और जिसका भूरे पत्थर का अग्रभाग इस छोटे-से भाग की पहचान है।

यहाँ जो होता है, वही सदा से दक्षिणी अर्धचंद्र पर होता आया है। अँधेरे में ही यात्री स्नान के लिए उतरते हैं, अंजुरी में जल लेकर संकल्प करते हैं, उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं, पितरों का तर्पण करते हैं। परिवार ऊपर की सीढ़ियों पर बैठकर वस्त्र बदलते हैं; नाविक दिन के पहले यात्री की प्रतीक्षा करते हैं; कुछ साधक जप लिए देर तक बैठे रह जाते हैं। भीड़ और ध्वनि-यंत्र अस्सी सँभाल लेता है, इसलिए उसी भक्ति का शांत आधा हिस्सा प्राय: गंगा महल की सीढ़ियों पर उतर आता है — जिसे बिना जमघट के स्नान चाहिए, वह कुछ क़दम उत्तर चल देता है।

साँझ ढलते ही घाट कर्म का नहीं, दृष्टि का स्थान बन जाता है। इन सीढ़ियों पर विधिवत गंगा आरती नहीं होती; दीप बगल में अस्सी पर जलते हैं, और नगर की बड़ी आरती बहुत उत्तर, दशाश्वमेध पर। यहाँ से घाट एक लंबी पत्थर की वक्र रेखा में उत्तर की ओर चले जाते हैं, और ऊपर महल दिन की आख़िरी रोशनी अपने ऊपर ले लेता है। कार्तिक में अँधेरा होते ही सीढ़ियाँ फिर भर जाती हैं — दीपदान के लिए, जब मिट्टी के छोटे दीये जल पर छोड़े जाते हैं और धारा उन्हें उत्तर की ओर, घाटों के साथ-साथ बहा ले जाती है।

गंगा महल घाट
गंगा महल घाट, Varanasi, UP

जिस पवित्रता के लिए यात्री गंगा महल घाट आते हैं, वह इन सीढ़ियों की अपनी अर्जित पवित्रता नहीं है। वह अस्सी तीर्थ की पवित्रता है, जिसे ये सीढ़ियाँ आगे बढ़ाती हैं, और स्वयं गंगा की। यह स्पष्ट कह देना उचित है: काशी में कुछ घाट ऐसे हैं जिनका अपना बड़ा माहात्म्य है — दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, पंचगंगा — और कुछ ऐसे हैं जो अपने पड़ोसी तीर्थ की भक्ति की सेवा के लिए बने। गंगा महल दूसरी श्रेणी का घाट है, और इसमें कोई न्यूनता नहीं।

जिस तीर्थ की यह सेवा करता है, वह कम नहीं। परंपरा अस्सी को पंचतीर्थ में प्रथम गिनती है — वे पाँच स्नान-स्थल जिनका स्नान काशी-यात्रा को पूर्ण करने वाला माना गया है: अस्सी, दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, पंचगंगा और आदि केशव। ये पाँचों नदी के किनारे दक्षिण में अस्सी से उत्तर में आदि केशव तक फैले हैं, और यात्रा का आरंभ अस्सी से होता है। अस्सी को काशी क्षेत्र की दक्षिणी सीमा भी माना जाता है — वह बिंदु जहाँ अस्सी की धारा गंगा से मिलती है और पवित्र नगरी आरंभ होती है। गंगा महल उसी सीमा के भीतर है। जो इन सीढ़ियों पर स्नान करता है, वह क्षेत्र के भीतर स्नान करता है, और यहाँ बोला गया संकल्प घाट का नहीं, काशी और गंगा का नाम लेता है।

भक्तों की समझ

बनारसी भक्ति-दृष्टि अस्सी से वरुणा तक के पूरे अर्धचंद्र को एक ही तीर्थ-क्षेत्र मानती है, और नामधारी घाटों को उसके द्वार, अलग-अलग गंतव्य नहीं। इसी समझ में कार्तिक या माघ स्नान का फल इस पर निर्भर नहीं करता कि भक्त किस सीढ़ी से उतरा — शर्त यह है कि संकल्प ध्यान से लिया जाए और स्नान लिया नहीं, अर्पित किया जाए। स्थानीय व्यवहार इसकी पुष्टि करता है: बड़े स्नान-पर्वों पर गंगा महल की सीढ़ियाँ अपने प्रसिद्ध पड़ोसी जितनी ही भरी रहती हैं, और वहाँ खड़ा कोई यह नहीं मानता कि वह ग़लत जगह खड़ा है।

घाट के ऊपर एक गृह-भक्ति भी बसती है। ज़िला प्रशासन की अपनी सूची महल के भीतर नागर शैली के राधा-कृष्ण मंदिर का उल्लेख करती है, और अलग से, घाट के पास अठारहवीं शताब्दी के लक्ष्मीनारायण मंदिर का — अर्थात उस महल से भी पुराना, जिससे घाट को नाम मिला। वही पुराना मंदिर इस बात का शांत प्रमाण है कि यह तट स्थापत्य का स्थान बनने से पहले उपासना का स्थान था।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

इस तट का उपासना-जीवन इसकी पत्थर की सीढ़ियों से पुराना है। घाट के पास अठारहवीं शताब्दी के लक्ष्मीनारायण मंदिर का अभिलेख मिलता है, जो इस तट पर पूजा को उस महल से पहले का सिद्ध करता है जिससे घाट को नाम मिला। सीढ़ियाँ स्वयं उन्नीसवीं शताब्दी की हैं।

वाराणसी ज़िला प्रशासन और नगर के घाटों का धरोहर-लेखा, दोनों गंगा महल का निर्माण लगभग 1830 में बताते हैं और संरक्षक के रूप में बनारस राजपरिवार का नाम लेते हैं। दोनों अभिलेख निर्माता के रूप में राजा प्रभु नारायण सिंह का नाम देते हैं, पर यह पहचान निर्विवाद नहीं मानी जा सकती: प्रभु नारायण सिंह का जन्म 1855 में हुआ और उन्होंने बनारस पर 1889 से शासन किया, इसलिए लगभग 1830 का यह काम उसी वंश के किसी पूर्ववर्ती शासक का है। तिथि और राजपरिवार का संरक्षण प्रमाणित है; व्यक्ति का नाम नहीं। महल जल के ऊपर खड़ा हो जाने के बाद नीचे की सीढ़ियों ने उसी का नाम ले लिया, और गंगा महल घाट नगर के घाट-क्रम में अस्सी के उत्तरी विस्तार के रूप में सम्मिलित हो गया। इसके साथ एक और महल-भवन खड़ा हुआ, जिससे सटा हुआ रिवाँ (रेवाँ) घाट बना।

आज इस स्थल की ज़िम्मेदारी बँटी हुई है, जैसी काशी के अधिकांश महल-घाटों की है। धरोहर-लेखा गंगा महल को बनारस राजपरिवार के महारानी ट्रस्ट के अधीन, रिवाँ महल को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के अधीन, और घाट की सीढ़ियों को वाराणसी नगर निगम के अधीन दर्ज करता है। महल को आधुनिक उपयोग मिल गया है — निचली मंज़िलों पर एक वस्त्र-अभिकल्प स्टूडियो और ऊपर कार्लस्टाड विश्वविद्यालय के सहयोग से चलने वाला इंडो-स्वीडिश स्टडी सेंटर — और घाटों के अध्येताओं ने यह भी लिखा है कि यह उपयोग में रहने वाला भवन अपने कई पड़ोसियों से बेहतर सँभाला गया है। इस पूरे समय में सीढ़ियाँ हर सुबह उसी एक काम के लिए उतरती रही हैं।

गंगा महल घाट — historic view

वास्तुकला

इस घाट की उपस्थिति सीढ़ी नहीं, महल है। गंगा महल नदी की ओर भूरे पत्थर का एक ऊँचा अग्रभाग खोलता है, जिसे ज़िले की सूची गढ़-जैसा बताती है, गंगा की ओर झुका हुआ। धरोहर-लेखा इस भवन को राजपूत और स्थानीय पारंपरिक शैली का मिश्रण कहता है। इससे आगे अभिलेख इसके अंगों का ब्योरा नहीं देते, और यह पृष्ठ भी नहीं देता।

नीचे घाट सीधा-सादा है: जल तक उतरती चौड़ी पत्थर की पंक्तियाँ, दक्षिण में अस्सी से मिलते हुए बदलता तल, और इतना चौड़ा पड़ाव कि स्नानार्थी जुट सकें और नावें किनारे लग सकें। न आरती का चबूतरा, न जलरेखा पर मंदिरों की पंक्ति, न पंडों के छत्रों का जमघट — यह सादगी ही एक कारण है कि घाट शांत रहता है।

महल के भीतर राधा-कृष्ण मंदिर है, नागर शैली में बना; पुराना लक्ष्मीनारायण मंदिर अभिलेखों में महल के भीतर नहीं, घाट के पास दर्ज है। भवन निजी और संस्थागत उपयोग में है, इसलिए ये सार्वजनिक मंदिर की तरह खुले नहीं हैं; यात्री इन्हें एक धरोहर-भवन के गृह-मंदिर की तरह देखें, दर्शन-स्थल की तरह नहीं, और पास जाने से पहले पूछ लें।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

इस घाट का कर्म-दिवस स्नान का दिवस है। सूर्योदय से बहुत पहले भक्त स्नान के लिए उतरते हैं, जल में खड़े होकर संकल्प लेते हैं, पूर्व में उजाला आते ही सूर्य को अर्घ्य देते हैं, और पितरों का तर्पण करते हैं। बहुत-से लोग लौटते समय घर के देवस्थान के लिए छोटी लुटिया में गंगाजल ले जाते हैं। श्राद्ध-कर्म से पहले के मुंडन-क्षौर के लिए नाई ऊपर की सीढ़ियों पर बैठते हैं, और विधि ठीक-ठीक बुलवाने के लिए पंडित मिल जाते हैं — यद्यपि यहाँ केंद्रीय घाटों जैसा बड़ा पंडा-प्रबंध नहीं है।

कार्तिक इस घाट का सबसे भरा मास है। कार्तिक-स्नान का व्रत लेने वाले पूरे मास प्रतिदिन यहीं स्नान करते हैं, और मास की साँझों में इन्हीं सीढ़ियों से दीये प्रवाहित किए जाते हैं — वही दीपदान, जो कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली पर अपने चरम पर पहुँचता है, जब नगर का हर घाट जगमगा उठता है। माघ दूसरा स्नान-व्रत लाता है, और जेठ में गंगा दशहरा गंगा को विशेष अर्पण का दिन।

सीढ़ियों के ऊपर, महल के मंदिर अपना अलग पर्व-क्रम रखते हैं। ज़िला प्रशासन की सूची राधा-कृष्ण मंदिर में कृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, गणेश चतुर्थी और शिवरात्रि मनाए जाने का उल्लेख करती है, और एक कृष्ण लीला का, जिसमें ब्राह्मणों को दान और भोजन कराया जाता है। ये एक निजी भवन के भीतर के गृह-मंदिर के आयोजन हैं; सम्मिलित होने के इच्छुक यात्री प्रवेश मान लेने के बजाय स्थानीय स्तर पर पूछ लें।

गंगा महल घाट पर विधिवत सांध्य गंगा आरती नहीं होती। इन सीढ़ियों के सबसे निकट की आरती अस्सी पर है, दक्षिण में एक मिनट की दूरी पर; नगर की प्रमुख आरती दशाश्वमेध पर। इन सबका समय ऋतु और नदी के साथ बदलता रहता है, इसलिए उसी दिन पुष्टि कर लेना सबसे अच्छा है।

उत्सव एवं पर्व

उत्सवकबभीड़
देव दीपावलीबहुत अधिक — दक्षिणी घाट दोपहर बाद से ही भरने लगते हैं
कार्तिक पूर्णिमा स्नानबहुत अधिक
गंगा दशहराअधिक
मकर संक्रांतिअधिक
कृष्ण जन्माष्टमीमध्यम
नित्य गंगा स्नानप्रात:काल मध्यम, दिन में हल्की

देव दीपावली: परंपरा मानती है कि देव दीपावली शिव के त्रिपुरासुर-विजय और देवताओं के गंगा-स्नान हेतु अवतरण का स्मरण है। घाटों पर दीप जलाना उन्हीं का स्वागत माना जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा स्नान: पुराण कार्तिक के स्नान की, और उसमें भी कार्तिक पूर्णिमा की, विशेष महिमा कहते हैं। इस दिन काशी क्षेत्र के भीतर स्नान विशेष पुण्यप्रद माना गया है।

गंगा दशहरा: परंपरा मानती है कि इस दिन गंगा को अर्पित स्नान दस प्रकार के पापों (दश-पाप) का शमन करता है। यह बनारस के वर्ष के प्रमुख नदी-पर्वों में है।

मकर संक्रांति: सूर्य के मकर में प्रवेश और उत्तरायण के आरंभ का पर्व। इस दिन स्नान और दान का बड़ा फल माना गया है।

कृष्ण जन्माष्टमी: यह आयोजन घाट की सीढ़ियों का नहीं, ऊपर के गृह-मंदिर का है। सम्मिलित होने के इच्छुक यात्री स्थानीय स्तर पर पूछ लें, क्योंकि भवन निजी और संस्थागत उपयोग में है।

नित्य गंगा स्नान: किसी एक पर्व से अधिक यही अटूट दैनिक उपयोग है, जो काशी के किसी घाट को धरोहर-स्थल नहीं, जीवित तीर्थ बनाए रखता है।

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कैसे पहुँचें

गंगा महल घाट वाराणसी जंक्शन से लगभग छह किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और अस्सी घाट से लगभग सौ मीटर उत्तर है। सबसे सरल रास्ता यह है कि ऑटो या टैक्सी से अस्सी घाट आ जाइए — अस्सी चौराहा हर चालक जानता है — और वहाँ से किनारे-किनारे उत्तर चल दीजिए; दोनों घाटों को अलग करती पत्थर की सीढ़ी-पंक्ति ही एकमात्र पहचान है। नगर की ओर से भदैनी और अस्सी की गलियाँ इसी बिंदु पर उतारती हैं। जल-मार्ग से अस्सी, तुलसी या केदार घाट की कोई भी नाव यहाँ के पड़ाव पर लगा देगी, और गंगा महल का अग्रभाग नदी से पहचान में आ जाता है। ठीक उत्तर के घाट — रिवाँ, तुलसी, भदैनी — सूखे मौसम में किनारे-किनारे पैदल चले जा सकते हैं।

इन सीढ़ियों पर क्या मिलेगा

  • यह कार्यरत स्नान-घाट है, स्मारक नहीं: चौड़ी सीढ़ियाँ, वस्त्र बदलने की व्यवस्था जो बनाई नहीं, निभाई जाती है, और सुबह भर किनारे लगती नावें।
  • बगल के अस्सी से शांत। यदि आपको बिना भीड़ के स्नान या जप चाहिए, तो यहाँ आने का कारण यही है।
  • ऊपर का महल निजी और संस्थागत उपयोग में है। न टिकट है, न दर्शन की पंक्ति; उसके द्वारों को सार्वजनिक न समझें।
  • संकल्प, तर्पण और श्राद्ध-संबंधी विधि के लिए पंडित प्राय: मिल जाते हैं, पर संख्या कम है — कोई विशेष कर्म कराना हो तो एक दिन पहले बात कर लें।
  • नाव का किराया चढ़ने से पहले तय करें और बीच धारा में नहीं, किनारे पर चुकाएँ।
  • वर्षाकाल में नीचे की सीढ़ियाँ डूब जाती हैं और उपयोग योग्य घाट बहुत छोटा रह जाता है; जल उतरने के बाद भी पत्थर कई सप्ताह फिसलन भरा रहता है।

सर्वोत्तम समय

सूर्योदय से पहले का पहर इस घाट का सबसे सच्चा समय है — स्नान, अर्घ्य, और उस पार के रेतीले तट पर चढ़ता उजाला। वृद्धजनों या बच्चों के साथ यात्रा करने वालों के लिए अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल है। कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली पूरे दक्षिणी अर्धचंद्र को दीपों से भर देती हैं, पर भीड़ भी बहुत लाती हैं; गंगा दशहरा और मकर संक्रांति पर सीढ़ियाँ भोर से पहले ही भर जाती हैं। नदी के शांत दर्शन के लिए पर्व-मास से बाहर का कोई कार्यदिवस-प्रात: सबसे उत्तम है।

स्थान

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