जैन घाट काशी के तट के दक्षिणी भाग में है — असी से थोड़ा-सा नीचे की ओर। इसके ठीक ऊपर वच्छराज घाट है, जिसे लोग बछराज घाट कहते हैं, और नीचे निषादराज घाट। नगर के चौरासी घाटों की पारंपरिक गिनती में यह नवें स्थान पर आता है। अभिलेखों में इसका क्षेत्रफल लगभग 0.26 हेक्टेयर ही दर्ज है; इसकी पहचान आकार से नहीं, इस बात से बनती है कि यह किसका तीर्थ है। यह बनारस का जैन घाट है, और इसकी सीढ़ियों के ऊपर के मंदिर जैन परंपरा के हैं।
नाम भी श्रद्धा से आया है। जैन परंपरा मानती है कि सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का जन्म बनारस के इसी क्षेत्र में, राजा प्रतिष्ठ और रानी पृथ्वी के यहाँ हुआ था; पास का भदैनी मोहल्ला भी यही स्मृति संजोए है और वहाँ उनके जन्म का स्मारक मंदिर है। यहाँ उसी स्मृति में 1885 में घाट के ऊपरी भाग पर सुपार्श्वनाथ का मंदिर बनवाया गया। इसके संप्रदाय पर स्रोत एकमत नहीं हैं: धरोहर-अभिलेख इसे श्वेतांबर मंदिर कहते हैं, जबकि राज्य की अपनी सूची जैन घाट के सुपार्श्वनाथ मंदिर को दिगंबर बताती है और श्वेतांबर मंदिर को साथ लगे वच्छराज घाट पर रखती है। भदैनी–जैन घाट क्षेत्र में दोनों ही संप्रदायों के सुपार्श्वनाथ मंदिर हैं। इस तट-भाग पर तीन जैन मंदिर-संपत्तियाँ दर्ज हैं, और हर एक अपने ट्रस्ट के अधीन है; स्थानीय मान्यता यह भी है कि ये घाट लंबे समय तक जैन व्यापारी परिवारों और जैन राजाओं के अधिकार में रहे।
जैन भक्ति में काशी का स्थान इस घाट से भी पुराना है। परंपरा तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म भी बनारस में, राजा अश्वसेन और रानी वामादेवी के यहाँ मानती है, और उनके कल्याणकों की स्मृति भेलूपुर के मंदिरों में सुरक्षित है; तथा नगर से लगभग तेईस किलोमीटर नीचे की ओर, गोमती-संगम के पास स्थित चंद्रपुरी (चंद्रावती) को आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभ की जन्मभूमि माना जाता है। इसलिए जैन यात्री के लिए बनारस रास्ते में पड़ने वाला नगर नहीं, जन्मभूमियों का एक समूह है।
घाट स्वयं शांत है, और यहाँ दशाश्वमेध जैसे तटवर्ती आयोजन की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। यहाँ जैन आचरण नदी पर नहीं, सीढ़ियों के ऊपर के मंदिर पर टिका है — जहाँ मौन के साथ पहुँचा जाता है, तीर्थंकर की प्रतिमा का दर्शन होता है और णमोकार मंत्र का पाठ किया जाता है; यद्यपि राज्य के अभिलेख यह भी दर्ज करते हैं कि जैन भक्त घाट के दक्षिणी छोर पर स्नान भी करते हैं। नीचे की सीढ़ियाँ मोहल्ले की हैं — जिसका बड़ा हिस्सा मल्लाहों का है, और ठीक नीचे निषादराज घाट पर उनकी बड़ी बस्ती है — जहाँ नित्य स्नान और काम-धंधा चलता रहता है। यहाँ पत्थर के कुछ ही मीटरों में दो परंपराएँ साथ-साथ रहती हैं, और सौ वर्षों से अधिक समय से ऐसे ही रह रही हैं।

जैन दृष्टि में तीर्थंकर वह हैं जिन्होंने संसार-प्रवाह को पार किया और दूसरों के लिए घाट बना गए — तीर्थ का कर्ता, तीर्थंकर। इस अर्थ में तीर्थ पहले जल की पवित्रता से नहीं बनता, बल्कि उस जीवन के स्पर्श से बनता है। जैन घाट ठीक इसी अर्थ में तीर्थ है: इसकी पवित्रता इस मान्यता पर टिकी है कि सुपार्श्वनाथ ने इसी मोहल्ले में जन्म लिया, न कि इसके नीचे बहती नदी पर।
जैन परंपरा तीर्थंकर के जीवन के पाँच महान क्षणों को कल्याणक कहती है — गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण — और जिन स्थानों पर वे घटित हुए, उन्हें उसी भाव से पूजती है। बनारस ऐसी स्मृति एक बार नहीं, कई बार संजोए है। सुपार्श्वनाथ, जिनका लांछन स्वस्तिक है, यहाँ और भदैनी में स्मरण किए जाते हैं। पार्श्वनाथ, जिनकी प्रतिमाओं पर सिर के ऊपर सात या उससे अधिक फणों वाला सर्प-छत्र होता है — सुपार्श्वनाथ की प्रतिमाओं पर, जहाँ वह मिलता है, पाँच फण होते हैं — भेलूपुर में स्मरण किए जाते हैं, जहाँ के मंदिर उनके तीन कल्याणकों की स्मृति में बने। चंद्रप्रभ, जिनका लांछन अर्धचंद्र है, नगर के पास चंद्रपुरी में स्मरण किए जाते हैं। इतिहासकारों में इस पर मतभेद है कि इसमें से कितना प्रमाणों से सिद्ध होता है; जैन भक्ति-स्मृति इसे उससे स्वतंत्र होकर सँभाले हुए है, और वह सँभालना स्वयं एक निरंतरता है।
यहाँ भक्त जो करता है, वह भीतर की ओर मुड़ा हुआ है। प्रतिमा के सम्मुख दर्शन, फिर णमोकार मंत्र — जो किसी व्यक्ति को नहीं, जागरण के गुणों को नमन करता है: अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और समस्त साधु — और फिर कुछ देर का मौन चिंतन। अर्पण सरल और अहिंसक हैं: पुष्प, अक्षत, चंदन, एक दीप। जैन मंदिर में अहिंसा कोई अतिरिक्त नियम नहीं, वह आधार है जिस पर बाकी सब खड़ा है; जो यात्री यह समझ लेता है, वह इस स्थान का स्वभाव भी समझ लेता है।
एक साझा तट
काशी सदा से कुछ ही क़दमों के भीतर एक से अधिक परंपराओं को साथ रखती आई है, और यह तट-भाग इसे साफ़ दिखा देता है। ठीक ऊपर वच्छराज घाट की चौकियों पर शिव और गणेश के मंदिर हैं, 1931 में बना गंगा माता का मंदिर है, और ऊपर गोपाल मंदिर तथा अक्रूरेश्वर शिव। ठीक नीचे निषादराज घाट उन निषादराज की स्मृति है, जिन्होंने रामायण में श्रीराम को गंगा पार उतारा था। इन दोनों के बीच जैन तीर्थ अपना मौन बिना किसी विरोध के बनाए रखता है। हर परंपरा के यात्री को यह व्यवस्था सहेजने योग्य वस्तु मानकर चलना चाहिए।
इतिहास
नाम के रूप में जैन घाट नया है, जैन स्थान के रूप में पुराना। 1931 तक यह भूमि वच्छराज घाट का ही हिस्सा थी, जिसे अभिलेखों के अनुसार 1790 में बनारस के एक धनी व्यापारी ने बनवाया और जिसका नाम आज भी उन्हीं की स्मृति रखता है। 1931 में बाबू शेखर चंद ने इस भाग को अलग से बनवाया और जैन मुनियों के सहयोग से इसे जैन घाट नाम दिया। उसी वर्ष उन्हीं ने पड़ोसी वच्छराज घाट की मरम्मत भी कराई और वहाँ गंगा माता का मंदिर बनवाया।
घाट के ऊपरी भाग का जैन मंदिर इस विभाजन से पुराना है। सुपार्श्वनाथ का मंदिर 1885 में बना, इसी स्मृति में कि तीर्थंकर का जन्म इसी मोहल्ले में हुआ; यह इस तट-भाग का श्वेतांबर मंदिर है या दिगंबर, इस पर अभिलेख एकमत नहीं हैं। इस क्षेत्र में जैन उपस्थिति इससे भी पुरानी है, और यहाँ के मंदिर आज अपने-अपने ट्रस्टों के अधीन हैं।
घाट का जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण 1988 में उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग ने कराया, और आज जिन पत्थरों पर यात्री उतरते हैं वे उसी काम के हैं। पड़ोसी घाट भी इसी आधुनिक शताब्दी में बने: वच्छराज घाट का वर्तमान ढाँचा राज्य सरकार ने 1965 में बनवाया, और निषादराज घाट 1946 में मल्लाह संगठन के सहयोग से पक्का हुआ।
घाट के किनारे की मंदिर-संपत्तियाँ अपने-अपने ट्रस्टों के अधीन हैं, जबकि घाट की सतह नगर निगम के ज़िम्मे है। तट की धरोहर-प्रलेखन यह भी दर्ज करती है कि यहाँ संरक्षण मुख्यतः ट्रस्टों की अपनी पहल पर टिका रहा है, किसी संयोजित योजना पर नहीं, और घाट के मुहाने पर अनधिकृत निर्माण को एक बनी हुई चिंता बताती है — यही एक कारण है कि यात्रियों और निवासियों, दोनों से नदी के इस बने हुए किनारे को सावधानी से बरतने का आग्रह किया जाता है।

वास्तुकला
घाट स्वयं छोटा और सादा है: बनारसी ढंग की पत्थर की सीढ़ियाँ, 1988 में फिर से बनी, जो गली से जल तक लगभग 0.26 हेक्टेयर के मुहाने पर उतरती हैं। इसकी उल्लेखनीय वास्तुकला जल पर नहीं, जल के ऊपर है। जैन मंदिर घाट के ऊपरी भाग पर है और गली की ओर से प्रवेश होता है; मंदिर-परिसर का द्वार असी की ओर मुड़ने वाले मोड़ के पास है।
उत्तर भारत की जैन मंदिर-वास्तु, चाहे किसी भी आकार की हो, गर्भगृह में विराजित तीर्थंकर-प्रतिमा के चारों ओर संयोजित होती है — पद्मासन में बैठी हुई या कायोत्सर्ग मुद्रा में खड़ी — जिस तक भक्तों के मंडप से पहुँचा जाता है। प्रतिमा की पहचान उसके नीचे अंकित लांछन से होती है; सुपार्श्वनाथ का लांछन स्वस्तिक है, जो जैन तथा व्यापक भारतीय परंपरा में प्राचीन मंगल-चिह्न है। जैन मंदिरों का अलंकरण महीन और संयत होता है — संगमरमर, सधी हुई नक़्क़ाशी, और एक व्यवस्थित समरूपता, जो स्थिरता को तोड़ती नहीं, सँभालती है।
ठीक ऊपर वच्छराज घाट पर तट और ऊपरी तल के बीच चौकियों की परतें हैं, जिन पर शिव और गणेश के मंदिर बने हैं, और ऊपर 1968 में बना गोपाल मंदिर तथा अक्रूरेश्वर शिव मंदिर। नाव से देखने पर दोनों घाट पत्थर का एक ही अटूट किनारा जान पड़ते हैं, और ऊपर के द्वार ही बताते हैं कि किस परंपरा की भूमि कहाँ से शुरू होती है।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
इस घाट पर जैन आचरण तटवर्ती कर्मकांड का नहीं, भीतरी उपासना का है। भक्त ऊपर मंदिर तक जाते हैं, तीर्थंकर का दर्शन करते हैं, अपने संप्रदाय और कुल की रीति से पूजा करते हैं, णमोकार मंत्र का पाठ करते हैं, और कुछ देर मौन चिंतन या सामायिक में बैठते हैं। अर्पण सरल और अहिंसक हैं — पुष्प, अक्षत, चंदन, एक दीप। जैन यात्री की यात्रा मंदिर पर ही पूर्ण हो जाती है; राज्य के अभिलेख दर्ज करते हैं कि भक्त घाट के दक्षिणी छोर पर स्नान भी करते हैं, पर आचरण का आधार सीढ़ियों के ऊपर ही है।
मंदिर की लय उसके ट्रस्ट की रीति से चलती है, किसी सार्वजनिक समय-सारणी से नहीं। जैन वर्ष के विशेष पर्व-दिन, जो नगर भर के जैन मंदिरों में निभाए जाते हैं, ये हैं: चैत्र में महावीर जयंती; पर्युषण के दिन, जो श्वेतांबर परंपरा में आठ दिन और दिगंबर परंपरा में दस लक्षण पर्व के रूप में दस दिन मनाए जाते हैं; तथा दीपावली, जिसे जैन भगवान महावीर के निर्वाण की रात्रि के रूप में मानते हैं। इनमें से किसी दिन यहाँ के मंदिर में विशेष आयोजन होता है या नहीं, यह उसका ट्रस्ट ही बता सकता है। शेष दिनों में मंदिर शांत रहता है — और वही शांति यहाँ का मर्म है।
नीचे सीढ़ियों पर मोहल्ला अपनी अलग लय रखता है — प्रात:कालीन स्नान, धुलाई, और मल्लाहों का काम-धंधा। दोनों एक-दूसरे में दख़ल नहीं देते।
मंदिर खुलने का समय ट्रस्ट तय करता है और वह कहीं छपा हुआ नहीं है। जो यात्री विशेष रूप से दर्शन के लिए आ रहे हों, वे समय स्थानीय स्तर पर सत्यापित कर लें; और कोई विशेष पूजा करानी हो तो पहले से ट्रस्ट से बात कर लें।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
|---|---|---|
| महावà¥à¤° à¤à¤¯à¤à¤¤à¥ | — | बनारस à¤à¥ à¤à¥à¤¨ समाठमà¥à¤ ठधिà¤; शà¥à¤· à¤à¥ लिठशाà¤à¤¤ |
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| नितà¥à¤¯ दरà¥à¤¶à¤¨ | — | à¤à¤® |
महावà¥à¤° à¤à¤¯à¤à¤¤à¥: ठहिà¤à¤¸à¤¾, सतà¥à¤¯, ठसà¥à¤¤à¥à¤¯, बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤à¤°à¥à¤¯ à¤à¤° ठपरिà¤à¥à¤°à¤¹ à¤à¤¾ महावà¥à¤° à¤à¤¾ à¤à¤ªà¤¦à¥à¤¶ à¤à¥à¤¨ à¤à¤à¤°à¤£ à¤à¤¾ à¤à¤§à¤¾à¤° हà¥, à¤à¤° à¤à¤¨à¤à¤¾ à¤à¤¨à¥à¤® à¤à¤¸ यà¥à¤ मà¥à¤ à¤à¤¸ परà¤à¤ªà¤°à¤¾ à¤à¥ à¤à¤°à¤à¤ à¤à¥ रà¥à¤ª मà¥à¤ पà¥à¤à¤¾ à¤à¤¾à¤¤à¤¾ हà¥à¥¤
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Practical guidance to help you plan your pilgrimage
| Pilgrim Guidance | कैसे पहुँचेंयह घाट भदैनी–शिवाला क्षेत्र में है, असी घाट से थोड़ा नीचे की ओर। पैदल जाना हो तो असी से तट-तट उत्तर की ओर चलें — गंगा महल, रीवाँ, तुलसी, भदैनी, जानकी और आनंदमयी घाट पार करने पर वच्छराज (बछराज) घाट आता है और उसके ठीक बाद जैन घाट; सहज चाल से लगभग बीस मिनट। सड़क की ओर से मंदिर-परिसर का प्रवेश-द्वार असी की ओर मुड़ने वाले मोड़ के पास है। ऑटो और रिक्शा वाले इस भाग को जैन घाट से अधिक बछराज घाट के नाम से पहचानते हैं, इसलिए दोनों नाम बता दें। यात्रियों के लिए तैयारी
आने का सर्वोत्तम समयबनारस में अक्टूबर से मार्च तक का मौसम सबसे अनुकूल है, और इस घाट पर प्रात:काल सबसे शांत घड़ी होती है। चैत्र की महावीर जयंती और भाद्रपद के पर्युषण के दिन नगर के जैन समाज को यहाँ ले आते हैं; यदि सामूहिक उपासना का साथ चाहिए तो वही दिन चुनें, और यदि एकांत चाहिए तो उन्हें टालें। मानसून में निचली सीढ़ियाँ जल में डूब जाती हैं और नावें किनारे न लग पाएँ यह संभव है, पर ऊपर का मंदिर गली से तब भी पहुँच में रहता है। |
स्थान
Varanasi, UP
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