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महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

Ujjain, MP

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उज्जैन की रुद्र सागर तट पर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक — प्रसिद्ध दक्षिणमुखी स्वयंभू लिंग तथा प्रातः 4 बजे होने वाली अद्वितीय भस्म आरती के लिए विख्यात।

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महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की प्राचीन नगरी उज्जैन में रुद्र सागर सरोवर के तट पर स्थित है और भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में विशेष रूप से पूज्य है। उज्जैन — जिसे प्राचीन काल में 'अवंतिका' कहा जाता था — सप्त पुरियों में गिनी जाती है, जो मोक्षप्रदायिनी मानी जाती हैं, और दो सहस्राब्दियों से अधिक समय से शैव उपासना, ज्योतिष एवं विद्या का महान केंद्र रही है।

मंदिर अपने दक्षिणमुखी स्वयंभू शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है — दक्षिण दिशा यमराज की मानी जाती है, और इसी कारण यहाँ के लिंग को तंत्र परंपरा में अत्यंत विशिष्ट माना गया है। इसके अतिरिक्त महाकाल की प्रातःकालीन भस्म आरती, जो लगभग 4 बजे होती है, समस्त भारत में अद्वितीय है; इसमें लिंग को स्नान कराकर संस्कारित भस्म (विभूति) अर्पित की जाती है।

वर्तमान मंदिर 18वीं शताब्दी में पुनर्निर्मित है, जिसमें अनेक स्तर, शिखर एवं उपशिखर हैं। हर बारह वर्ष में यहाँ सिंहस्थ कुंभ मेला लगता है, जब करोड़ों श्रद्धालु क्षिप्रा स्नान से पूर्व महाकाल का दर्शन करते हैं।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, Ujjain, MP
शिवपुराण के अनुसार अवंति नगरी में एक शिवभक्त ब्राह्मण परिवार को दूषण नामक असुर सताया करता था। जब परिवार ने पूर्ण श्रद्धा से शिव की आराधना की, तब भगवान शिव भूमि को फाड़कर भयंकर रूप में प्रकट हुए और दूषण तथा उसके अनुयायियों को भस्म कर दिया। भक्तों की प्रार्थना पर शिव अवंति में 'महाकाल' रूप में सदा के लिए विराजमान हो गए। लिंग स्वयंभू तथा दक्षिणमुखी है — दक्षिण दिशा यम की है, और यही महाकाल की काल पर विजय का प्रतीक है। मान्यता है कि महाकाल के दर्शन से अकाल मृत्यु, कर्म-भार एवं भय का नाश होता है। 'महाकाल' नाम का अर्थ ही है — 'काल से परे महाप्रभु'।
सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

महाकालेश्वर का उल्लेख महाभारत, पुराणों तथा शास्त्रीय संस्कृत साहित्य में मिलता है — कालिदास ने मेघदूत और रघुवंश में उज्जैन तथा महाकाल का जीवंत वर्णन किया है। परमार वंश एवं अन्य मध्यकालीन राजवंशों के अंतर्गत यह प्रमुख शैव केंद्र रहा। 13वीं शताब्दी में इल्तुतमिश के आक्रमण तथा बाद में भी मंदिर को क्षति पहुँची। वर्तमान स्वरूप का पुनर्निर्माण 18वीं शताब्दी में ग्वालियर के रानोजी शिंदे (सिंधिया) ने अपने दीवान रामचंद्र बाबा शेणवी के माध्यम से करवाया। बाद में सिंधिया शासकों एवं वर्तमान मंदिर प्रशासन द्वारा इसका निरंतर विस्तार एवं नवीकरण होता रहा है।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग — historic view

वास्तुकला

मंदिर भूमिज एवं मराठा दक्कन शैली में निर्मित है; इसका उत्तुंग शिखर, स्तंभयुक्त मंडप तथा तीन स्तरों वाला गर्भगृह विशेष हैं। गर्भगृह में सीढ़ियाँ उतरकर पहुँचा जाता है, जहाँ स्वयंभू दक्षिणमुखी लिंग विराजमान हैं; उनके ऊपर ओंकारेश्वर तथा नागचंद्रेश्वर के मंदिर हैं (नागचंद्रेश्वर केवल नागपंचमी पर खुलते हैं)। पूरा परिसर रुद्र सागर के तट पर है तथा आसपास गणेश, कार्तिकेय, पार्वती व कालभैरव के उपमंदिर भी हैं।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

दिन का आरंभ प्रातः लगभग 4 बजे होने वाली प्रसिद्ध भस्म आरती से होता है, जिसमें लिंग को स्नान कराकर शंख-डमरू की गूँज के बीच संस्कारित भस्म अर्पित की जाती है। इसके पश्चात दधि-पोहा आरती, भोग आरती, संध्या आरती तथा शयन आरती दिनभर में संपन्न होती हैं। अभिषेक, रुद्राभिषेक एवं लघु रुद्र मंदिर प्रशासन की वेबसाइट (shriamahakaleshwar.com) के माध्यम से बुक किए जा सकते हैं; भस्म आरती के लिए पूर्व-बुकिंग अनिवार्य-सी है। श्रावण के सोमवार, महाशिवरात्रि, नागपंचमी तथा सिंहस्थ वर्ष में अत्यधिक भीड़ होती है। बेलपत्र, भांग, धतूरा तथा पंचामृत अर्पित किए जाते हैं।

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निकटतम हवाई अड्डा इंदौर (देवी अहिल्याबाई होल्कर विमानतल) है, लगभग 55 कि॰मी॰ दूर। उज्जैन जंक्शन रेलवे से देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा है। मंदिर तक ऑटो, ई-रिक्शा एवं टैक्सी सुलभ हैं। अक्टूबर से मार्च तक का मौसम सर्वोत्तम है; श्रावण (जुलाई–अगस्त), महाशिवरात्रि एवं सिंहस्थ वर्ष में अपार भीड़ होती है। सामान्य दिनों में दर्शन में 1–2 घंटे लगते हैं, जबकि विशेष दिनों में 4–6 घंटे की प्रतीक्षा संभव है। भस्म आरती हेतु ऑनलाइन बुकिंग एवं पहचान पत्र अनिवार्य है; पुरुष धोती तथा महिलाएँ साड़ी में भाग लेती हैं। आसपास अनेक धर्मशालाएँ, बजट लॉज व मध्यम श्रेणी के होटल उपलब्ध हैं।

स्थान

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