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श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, श्रीशैलम

Kurnool, AP

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आंध्र प्रदेश के नल्लमला पर्वतों पर स्थित मल्लिकार्जुन — एकमात्र स्थान जो ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों है।

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आंध्र प्रदेश के नल्लमला वनों से घिरे पर्वतों पर स्थित श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भारतीय प्रायद्वीप का सबसे शक्तिशाली तीर्थस्थलों में से एक है। इसकी एक अद्वितीय विशेषता है जो किसी और तीर्थ को प्राप्त नहीं — यह एक साथ भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और माँ आदिशक्ति के अठारह महाशक्तिपीठों में से भी एक है। गर्भगृह में भगवान मल्लिकार्जुन स्वामी विराजमान हैं और निकट ही माँ भ्रमरांबा देवी का मंदिर है। अतः श्रीशैलम की एक यात्रा सनातन धर्म की दो महान यात्राओं के समान फल देती है।

यह मंदिर कृष्णा नदी के दक्षिण तट पर, घने वन, गहरी घाटियों और प्राचीन तपस्या गुफाओं के बीच स्थित है। तेलुगु, कन्नड़, तमिल और मराठी भक्तजन एक सहस्राब्दी से अधिक समय से इस स्थान की आराधना करते आए हैं। आदि शंकराचार्य से लेकर अक्का महादेवी तक के संतों ने इसे मोक्ष का द्वार कहा है। यहाँ तीर्थयात्री केवल दर्शन के लिए ही नहीं, पर्वत की परिक्रमा, कृष्णा के पाताल गंगा स्नान और शिव–शक्ति के एकत्व की शांति अनुभव करने आते हैं।

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, श्रीशैलम
श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, श्रीशैलम, Kurnool, AP

शिव पुराण के अनुसार, बालक कार्तिकेय अपने भाई गणेश के साथ दिव्य फल की प्रतियोगिता में आहत होकर क्रोधित होकर कैलाश छोड़ चले गए और दक्षिण के क्रौंच पर्वत पर निवास करने लगे। पुत्र-विरह से व्याकुल शिव–पार्वती अपने पुत्र के समीप रहने हेतु इसी पर्वत पर स्वयं को प्रकट कर गए — शिव मल्लिकार्जुन (जिन्हें मल्लिका अर्थात् जूही के पुष्प प्रिय हैं) रूप में और पार्वती भ्रमरांबा (भ्रमरों की देवी) रूप में। एक अन्य परंपरा में राजकुमारी चंद्रवती ने शिव को जूही के पुष्पों से पूजा और पांडव अर्जुन ने यहीं तप किया — इसी से 'मल्लिका' एवं 'अर्जुन' का संयुक्त नाम बना।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

श्रीशैलम का उल्लेख महाभारत, स्कंद पुराण और शिव पुराण में मिलता है; यह पर्वत एक सहस्राब्दी से अधिक समय से अखंड तीर्थ रहा है। वर्तमान मंदिर परिसर सातवाहन, इक्ष्वाकु, चालुक्य और काकतीय राजवंशों के समय विकसित हुआ। चौदहवीं शताब्दी के रेड्डी राजाओं तथा विजयनगर सम्राट कृष्णदेवराय ने भव्य मंडप और प्राकार निर्मित कराए। मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने यहीं 'शिवानंद लहरी' की रचना की। दुर्गम वन में स्थित होने के कारण यह मंदिर आक्रमणों से सुरक्षित बना रहा।

श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, श्रीशैलम — historic view

वास्तुकला

मंदिर द्रविड़ शैली में ऊँचे प्राकार से घिरा एक किलेनुमा परिसर है, जिसकी दीवारों पर पुराणों के दृश्य उकेरे हैं। गर्भगृह में स्वयंभू मल्लिकार्जुन लिंग एक साधारण विमान के नीचे विराजमान है, और पीछे भ्रमरांबा देवी का पृथक मंदिर है। मुख मंडप, स्तंभयुक्त सभागृह और गोपुर काकतीय एवं विजयनगर कालीन मूर्तिकला प्रदर्शित करते हैं। सहस्र-स्तंभ शैली का मंडप और वीरशैव परंपरा से जुड़ा मल्लिकार्जुन शिवालय विशेष आकर्षण हैं।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

नित्य पूजा शैव आगम पद्धति से होती है — प्रातःकाल से रात्रि तक अभिषेक, अलंकरण और आरतियाँ क्रमशः सम्पन्न होती हैं; सटीक समय देवस्थानम द्वारा निर्धारित होता है, अतः यात्रा के समय पुष्टि करना उत्तम है। रुद्राभिषेक, भ्रमरांबा मंदिर में कुमकुमार्चना और सोमवार एवं प्रदोष की विशेष पूजा अति लोकप्रिय हैं। सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि है, जिसमें लाखों भक्त लिंगोद्भव और रात्रि जागरण में भाग लेते हैं। उगादि, दशहरा और कार्तिक मास में भी अपार भीड़ होती है। अनेक तीर्थयात्री महान्यास पूर्वक रुद्राभिषेक का संकल्प लेते हैं।

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श्रीशैलम हैदराबाद से लगभग 210 किमी और कुरनूल से 180 किमी दूर है; मार्ग नल्लमला वन से होकर जाता है और घाट-यात्रा अपेक्षा से अधिक समय ले सकती है। निकटतम रेलवे स्टेशन मार्कापुर रोड (लगभग 85 किमी) तथा निकटतम हवाई अड्डा हैदराबाद है। देवस्थानम और निजी होटलों में निवास उपलब्ध है। दर्शन प्रातः या सायंकाल करें; ब्रेक-दर्शन टिकट प्रायः मिल जाते हैं। पाताल गंगा, साक्षी गणपति, हाटकेश्वरम और रोपवे-दृश्यबिंदु अवश्य देखें। सर्दियों में हलके ऊनी वस्त्र और वन-मार्ग पर पानी साथ रखें।

स्थान

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