निषादराज घाट का नाम निषादराज गुह पर है — शृंगवेरपुर के निषादों के राजा, जिन्होंने रामायण में वनवास की पहली रात राम, सीता और लक्ष्मण को आश्रय दिया और गंगा पार उतारने के लिए नाव और केवट का प्रबंध किया। बनारस में यह नाम कोई सजावट नहीं है। यह वह नाम है जो इस तट के नाविकों ने स्वयं अपने लिए चुना, और यह घाट उस समुदाय की अपनी जगह है।
असी से आदि केशव की ओर चलने वाले पारंपरिक क्रम में यह दसवाँ घाट है — दक्षिण में जैन घाट और उत्तर में प्रभु घाट के बीच। यह तट के उस शांत दक्षिणी अर्धचंद्र का हिस्सा है जो दशाश्वमेध की भीड़ से दूर है। यहाँ न कोई राजमहल की मुखाकृति है, न किसी बड़े आयोजन वाली संध्या आरती। यात्री जो देखता है वह है — जल तक उतरती सादी पत्थर की सीढ़ियाँ, कतार में बँधी लकड़ी की नावें, सूखते जाल और डाँड़, और वे परिवार जिनका पूरा जीवन-क्रम पानी के इर्द-गिर्द बँधा है।
घाट के पीछे बसी निषाद बस्ती बड़ी है — काशी ज़िला पोर्टल आसपास लगभग दस हज़ार नाविकों का उल्लेख करता है, और घाटों के धरोहर-सर्वेक्षण में यह संख्या बारह हज़ार के आसपास बताई गई है। इन सीढ़ियों से खुलने वाली नावें पूरे तट पर चलने वाली आवाजाही का हिस्सा हैं, और यहाँ के परिवारों के परिश्रम से तट का व्यावहारिक जीवन चलता रहता है। सीढ़ियों के ऊपर की गली में निषादराज का एक छोटा मंदिर है, ताकि समुदाय का आराध्य और उसकी आजीविका कुछ ही क़दमों की दूरी पर रहें।
यहाँ आने वाले तीर्थयात्री गंगा के लिए आते हैं — स्नान के लिए, उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए, और जल के उस शांत विस्तार के लिए जहाँ नदी तक बिना भागदौड़ के पहुँचा जा सके। यह घाट जैसा है वैसा ही स्वीकार किए जाने की माँग करता है: एक कर्मरत घाट, ईमानदारी से सादा, और उस समुदाय के हाथों सँभाला हुआ जो पीढ़ियों से काशी के यात्रियों की सेवा करता आया है।

इस घाट का भक्ति-भार रामायण के एक प्रसंग पर टिका है, और उससे भी अधिक उस पर जो निषाद समुदाय ने उस प्रसंग से गढ़ा है। वाल्मीकि के अयोध्याकांड में वनवासी राम शृंगवेरपुर में गंगा तट पर पहुँचते हैं, और गुह — निषादों के प्रधान, वन और नदी के जन — उनसे मिलने आते हैं। वनवास में गुह राम के पहले मित्र हैं। उनके पास जो है वे अर्पित करते हैं, और पार उतरने के लिए नाव तथा केवटों का प्रबंध करते हैं। तमिल कंब रामायणम् में वे राजकुमारों के सोते समय रात भर पहरा देते हैं, और वहीं राम उन्हें अपने भाई के समान कहकर सराहते हैं। परंपरा कहती है कि राम ने उन्हें प्रजा की तरह नहीं, मित्र की तरह स्वीकार किया।
काशी के नाविकों के लिए यह उनके अपने श्रम का पवित्रीकरण है। पवित्र जल पर किसी यात्री को पार उतारना केवल व्यवसाय नहीं; भक्ति की दृष्टि में वह वही सेवा है जो गुह ने अर्पित की थी, हर दिन दोहराई जाती हुई। प्राचीन साहित्य में भी निषाद नदी-जन के रूप में ही आते हैं — मनुस्मृति और महाभारत का अनुशासन पर्व मत्स्य-आजीविका को उनका कर्म बताते हैं, और कालिदास का रघुवंश उन्हें नाविक के रूप में प्रस्तुत करता है। इस प्रकार निषादराज नाम एक बहुत पुरानी कर्म-पहचान को राम-कथा के एक कृपा-क्षण से जोड़ देता है।
यह घाट क्या है, और क्या नहीं
यह स्पष्ट कह देना उचित है: निषादराज घाट का काशी खंड की शास्त्रीय परंपरा में अपना कोई पृथक तीर्थ-माहात्म्य नहीं है, और यह पंचतीर्थ घाटों में नहीं गिना जाता। इसकी पवित्रता काशी में बहती गंगा की पवित्रता है, जिसे परंपरा पूरे अर्धचंद्र में अखंड मानती है — तट की हर सीढ़ी तीर्थ मानी गई है। यहाँ जो विशिष्ट है वह कोई अलग कथा नहीं, बल्कि एक जीवंत समुदाय है जिसकी भक्ति-आत्मपहचान राम के केवट से बँधी हुई है। जो यात्री यहाँ कुछ देर ठहरता है, उसे दिखने लगता है कि काशी एक तीर्थनगरी के रूप में वास्तव में चलती कैसे है — वह श्रम, जिस पर हज़ारों के दर्शन चुपचाप टिके हुए हैं।
इतिहास
अपने अधिकांश अभिलिखित जीवन में यह तट-खंड कोई अलग घाट था ही नहीं। यह प्रभु घाट का दक्षिणी भाग था — जिसे उन्नीसवीं सदी के मध्य में बंगाल के एक धनी व्यापारी निर्मल कुमार ने बनवाया और जिसका नाम आगे चलकर बनारस के राजा प्रभु नारायण सिंह पर पड़ा — और इससे अलग यह बीसवीं सदी में हुआ, जब यहाँ की नाविक बस्ती इतनी बड़ी हो चुकी थी कि इस खंड की अपनी पहचान बन गई।
वाराणसी के घाटों के धरोहर-दस्तावेज़ में दर्ज है कि सीढ़ियाँ 1946 में पक्की बनाई गईं, और यह काम नाविक संगठन के सहयोग से हुआ। यही इस घाट का आधारभूत तथ्य है, और इस तट पर असामान्य तथ्य है: वाराणसी के अधिकांश घाट राजाओं, रानियों, मराठा सरदारों या धनी व्यापारियों ने पक्के कराए, जबकि यह घाट उसी कर्मरत समुदाय के सहयोग से पक्का हुआ जो इसका उपयोग करता है।
वर्तमान नाम कब स्थिर हुआ, इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं। काशी ज़िला पोर्टल नामकरण को 1940 के दशक में रखता है — नाविक-राज के मंदिर की स्थापना और मोहल्ले में निषाद घरों की स्पष्ट बहुलता के बाद; वहीं धरोहर-सर्वेक्षण उस मंदिर के खुलने की तिथि 1970 के दशक में बताता है। सार पर मतभेद नहीं है — कि यह खंड प्रभु घाट से अलग हुआ, कि इसका नाम निषादराज पर पड़ा, और यह प्रेरणा किसी संरक्षक से नहीं, स्वयं समुदाय से आई। कुछ ही वर्ष पहले दक्षिण में इससे मिलती-जुलती बात हुई थी, जब 1931 में जैन घाट बच्छराज घाट से अलग किया गया — तट के इस शांत दक्षिणी हिस्से में किसी समुदाय का सीढ़ियों का अपना टुकड़ा सँभाल लेना असामान्य नहीं है। आज घाट-क्षेत्र नगर निगम के अधीन है, जबकि ऊपर के भवन निवासी परिवारों और न्यासों के हैं।

वास्तुकला
निषादराज घाट छोटा घाट है — धरोहर-सर्वेक्षण इसका क्षेत्रफल लगभग एक चौथाई हेक्टेयर बताता है — और इसकी बनावट सादी है। यहाँ न कोई तटवर्ती महल है, न मंज़िलदार मंडप, न अलंकृत द्वार। जो है वह जल तक उतरती पत्थर की सादी सीढ़ियों की एक पंक्ति है, वही 1946 का पक्का काम जिसमें नाविक संगठन का सहयोग रहा, और जिसे नदी की वार्षिक चढ़ाई के विरुद्ध कई बार जोड़ा और मरम्मत किया गया है।
यहाँ जो विशेषताएँ महत्व रखती हैं वे कर्म की विशेषताएँ हैं। निचली सीढ़ियों का रूप बनावट ने नहीं, उपयोग ने गढ़ा है: वे स्थान जहाँ नावें कतार में बाँधी जाती हैं, वे समतल हिस्से जहाँ मौसम से पहले नावों को खींचकर उनकी सिलाई और रँगाई होती है, वे कगारें जहाँ जाल और डाँड़ सुखाए जाते हैं। चिनाई नीचे जाकर उस जल-रेखा तक गहरी पड़ जाती है जो जाड़े के निम्न जल और बरसात की बाढ़ के बीच खिसकती रहती है। घाट पर की गई पत्रकारिता दर्ज करती है कि बाढ़ उतरने के बाद कम पानी के महीनों में यहाँ के नाविक गंगा के उस पार कछार में जाकर सब्ज़ी की खेती करते हैं।
सीढ़ियों के ऊपर, पिछली गली में, निषादराज का वह विनम्र मंदिर है जो घाट को उसका केंद्र देता है — स्मारक नहीं, एक छोटा देवालय, जो धरोहर-सर्वेक्षण में भवन संख्या बी 3/78 पर दर्ज है। कुल प्रभाव ऐसे घाट का है जो देखे जाने के लिए नहीं, बरते जाने के लिए बना — और उस नगरी में यह अपने आप में देखने योग्य है जहाँ तट का बहुत कुछ संरक्षकों ने श्रद्धा के सार्वजनिक कार्य के रूप में खड़ा किया था।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
यहाँ की क्रियाएँ किसी सामान्य स्नान-घाट की क्रियाएँ हैं, पर उन्हें वह समुदाय निभाता है जिसके लिए नदी कर्मभूमि भी है। पौ फटने से पहले सीढ़ियाँ स्नान करने वालों से भर जाती हैं; अंजुरी में जल उठाकर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है; कुछ फूल और एक दीप धार पर बहा दिए जाते हैं। सुबह भर नावें खोली जाती हैं और दिन की खेवाई शुरू होती है।
ऊपर की गली में निषादराज के छोटे देवालय का दर्शन किसी औपचारिक मंदिर-विधान से अधिक एक घरेलू आचरण है: यह देवालय समुदाय ने ही नाविक-राज की स्मृति में बनवाया और समुदाय ही इसे सँभालता है। इस घाट पर कोई बड़ी नियत आरती नहीं होती; जो यात्री गंगा आरती में सम्मिलित होना चाहते हैं वे उत्तर में दशाश्वमेध जाते हैं — प्राय: इन्हीं सीढ़ियों से खुली नाव पर।
यहाँ की एक जीवंत परंपरा अनुष्ठान नहीं, संगीत है। इस घाट के नाविक चैती गाते हैं — चैत मास के ऋतु-गीत — और ठुमरी, वह उपशास्त्रीय विधा जिसका बनारस से पुराना नाता है। इन्हीं सीढ़ियों पर की गई पत्रकारिता ने साठ पार के एक नाविक को दर्ज किया है जो डाँड़ भी चलाते हैं और गाते भी हैं, और जो कहते हैं कि जो कुछ सीखा, यहीं गंगा मैया से सीखा। चैत में यहाँ से नाव लेने वाले यात्री को यह सुनने को मिल सकता है।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
|---|---|---|
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| Pilgrim Guidance | कैसे पहुँचेंनिषादराज घाट तट के दक्षिणी हिस्से में है — असी घाट से उत्तर, और केदार घाट से काफ़ी पहले। अधिकांश यात्री घाट-मार्ग से पैदल पहुँचते हैं — असी से तुलसी, भदैनी, जानकी, बच्छराज और जैन घाट होते हुए उत्तर की ओर लगभग पंद्रह-बीस मिनट की पैदल दूरी है। सड़क मार्ग से सोनारपुरा या भदैनी तक ऑटो या ई-रिक्शा लेकर गलियों के मुहाने तक पहुँचा जा सकता है, और वहाँ से थोड़ा पैदल चलकर सीढ़ियाँ मिलती हैं। जल-मार्ग से भी आना सहज है, क्योंकि असी और दशाश्वमेध की नावें यहाँ से निरंतर गुज़रती हैं। नाव और यहाँ का व्यवहार
सर्वोत्तम समयप्रात:काल इस घाट का अपना समय है — स्नान, नावों का खुलना, और जल पर सबसे स्वच्छ प्रकाश। यात्रियों के लिए अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल ऋतु है, मौसम ठहरा हुआ और नदी नीची तथा चौड़ी। चैत (मार्च-अप्रैल) में चैती के स्वर सुनाई देते हैं, और निषादराज जयंती की तिथि भी इसी मास में पड़ती है। बरसात में निचली सीढ़ियाँ जल में डूब जाती हैं और प्रशासन की सलाह पर नौका-संचालन सीमित रहता है; जुलाई से सितंबर के बीच कोई भी नौका-यात्रा तय करने से पहले स्थानीय जानकारी अवश्य लें। |
स्थान
Varanasi, UP
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