पांडे घाट काशी-चाप के उन छोटे, कामकाजी घाटों में से एक है जो खोरी घाट और सर्वेश्वर घाट के बीच पड़ता है — दशाश्वमेध से नदी के ऊपर की ओर थोड़ी दूर। धरोहर-प्रलेखना खोरी, पांडे और सर्वेश्वर को तट की एक ही इकाई मानती है, लगभग 0.126 हेक्टेयर की। इन सीढ़ियों का पुराना नाम वही है जो सत्रहवीं सदी के संस्कृत ग्रंथ गिर्वाण-पदमंजरी में मिलता है: सर्वेश्वर घाट — सर्वेश्वर, अर्थात सबके ईश्वर शिव, जिनका मंदिर जल के ऊपर स्थित है। वर्तमान नाम बाद के एक संरक्षक से आया। लगभग 1805 में बिहार के छपरा के एक संपन्न ब्राह्मण बाबुआ पांडे ने इस घाट को पक्का कराया और उस पर अखाड़ा बनवाया, और सीढ़ियाँ बाबुआ पांडे घाट कहलाने लगीं। कुछ ही वर्षों बाद, 1822 में, जेम्स प्रिंसेप ने — जो उस समय बनारस टकसाल के असे-मास्टर थे और जिन्होंने उसी वर्ष नगर का सर्वेक्षण कर एक सटीक मानचित्र बनाया — इन सीढ़ियों को 'पनरी घाट' लिखा; धरोहर अभिलेख बताते हैं कि स्थानीय नामों की ऐसी बदली हुई वर्तनी उनके यहाँ प्राय: मिलती है।
बाबुआ पांडे ने यहाँ जो बनवाया, वह भक्ति की एक विशेष समझ से जुड़ा है। उत्तर भारत की अखाड़ा-परंपरा में पहलवान का अनुशासन खेल नहीं, व्रत माना जाता है: भोर से पहले उठना, मिट्टी के गड्ढे में नित्य अभ्यास, सादा आहार, इंद्रिय-संयम, और अखाड़े के अधिष्ठाता देव के रूप में हनुमान। एक ही संरक्षण-कार्य में गंगा तक उतरती स्नान-सीढ़ियाँ और उनके ऊपर अखाड़ा बनवाना — यह देह के अनुशासन को नदी के अनुशासन के ठीक बगल में रख देना था; एक ही पत्थर पर स्नान और साधना।
आज पांडे घाट मुख्यतः अपने ऊपर बसे मोहल्ले की सेवा करता है, और धरोहर-प्रलेखना इसे सीधे-सीधे इसी रूप में दर्ज करती है। धरोहर-प्रलेखना सटे हुए खोरी घाट के विषय में लिखती है कि वह धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों की दृष्टि से उपेक्षित है और नित्य स्नान के लिए भी लोग उसे नहीं चुनते; और स्वयं पांडे घाट के विषय में दर्ज है कि यहाँ का दृश्य लंबे समय से धोबियों से भरा रहा है — इतना कि मोतीचंद (1985) ने इसे धोबी घाट कहा। इसकी सीढ़ियों पर ऊपर के मोहल्लों की सामान्य सुबह उतरती है — स्नान, घर के लिए लोटे में गंगाजल, पत्थर पर सूखते कपड़े, किनारे बँधी नावें। घाट-चाप पर चलने वाले यात्री के लिए यही शांति इसकी भेंट है: नदी पर एक ऐसी जगह जहाँ घंटे भर गंगा के साथ बैठा जा सकता है।

इन सीढ़ियों की भक्ति-पहचान उसी मंदिर पर टिकी है जिससे इन्हें पुराना नाम मिला। सर्वेश्वर — सबके ईश्वर — शिव के उन अनेक -ईश्वर रूपों में से एक हैं जिनसे काशी की पावन भूगोल रची गई है; हर लिंग नगरी के किसी कोने या नदी की किसी सीढ़ी को अपना नाम देता है। इसी आसपास सोमेश्वर का मंदिर भी है। सत्रहवीं सदी के ग्रंथ में इस घाट का सर्वेश्वर घाट के रूप में अंकित होना इसे केवल लोक-स्मृति नहीं, काशी की प्रलेखित तीर्थ-परंपरा में स्थान देता है।
धरोहर-प्रलेखना इन सीढ़ियों के निकट तट के दो प्राचीन तीर्थ-स्थल बताती है। प्रभास तीर्थ का स्थल पांडे घाट के आसपास दर्ज है, यद्यपि वही अभिलेख जोड़ता है कि प्रभास के नाम से होने वाले कर्म अब राजा घाट के पास सम्पन्न होते हैं; और गंगा केशव तीर्थ का स्थल सर्वेश्वर घाट के निकट बताया गया है, जिसका दक्षिणी भाग बाबुआ पांडे घाट है। जो यात्री पुरानी तीर्थ-सूचियों का अनुसरण करते हैं, वे इन संबंधों को पहचानेंगे; जो नहीं करते, उन्हें भी वही पुण्य मिलेगा जो परंपरा काशी के गंगा-तट पर कहीं भी मानती है।
मंदिरों से परे, भक्त को यहाँ जो अर्थ सबसे अधिक अनुभव होगा वह वही है जो बाबुआ पांडे के संरक्षण ने इस भूमि में गूँथ दिया: पवित्रता नित्य अनुशासन में बसती है। पहलवान का व्रत और स्नानार्थी का व्रत एक ही तत्व से बने हैं — भोर में उठना, संयम, पुनरावृत्ति, और एक अभ्यास को अर्पित की गई देह। भक्ति-भाव में गंगा-तट पर कोई कर्म छोटा नहीं होता; उसे साधना उसकी नित्यता बनाती है।
इतिहास
सीढ़ियाँ अपने वर्तमान नाम से पुरानी हैं। सत्रहवीं सदी की संस्कृत रचना गिर्वाण-पदमंजरी तट के इस भाग को सर्वेश्वर घाट के रूप में दर्ज करती है, और तीर्थ के रूप में इसकी ऐतिहासिकता इसी उल्लेख पर आधारित मानी जाती है। धरोहर अभिलेखों के अनुसार घाट का समूचा परिसर अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में मथुरा पांडेय के संरक्षण में पक्का बना।
आज प्रचलित नाम लगभग 1805 का है, जब बिहार के छपरा के संपन्न ब्राह्मण बाबुआ पांडे ने घाट को पक्का कराया और यहाँ अखाड़ा बनवाया; उन्हीं के संरक्षण से सीढ़ियाँ बाबुआ पांडे घाट कहलाईं। 1822 में जेम्स प्रिंसेप ने, जो उस समय बनारस टकसाल के असे-मास्टर थे, नगर का सर्वेक्षण कर एक सटीक मानचित्र बनाया; धरोहर अभिलेख बताते हैं कि उन्होंने इन सीढ़ियों को 'पनरी घाट' लिखा — उनके मानचित्रों में अनेक स्थानीय नाम इसी तरह बदली हुई वर्तनी में आए हैं।
सटा हुआ खोरी घाट, जिसे गंगा महल घाट भी कहते हैं, उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में कविंद्र नारायण सिंह ने पक्का कराया, और धरोहर-प्रलेखना इन सीढ़ियों के शीर्ष पर पाँच मंदिरों के एक समूह का उल्लेख करती है। घाट को आज का रूप 1965 में उत्तर प्रदेश सरकार के पुनर्निर्माण से मिला — वही कार्यक्रम जिसने वाराणसी के अनेक घाटों को उनकी वर्तमान चिनाई दी। सीढ़ियों के किनारे की मंदिर-संपत्तियाँ अपने-अपने ट्रस्टों के पास हैं और घाट नगर निगम के अधीन; धरोहर अभिलेख बताते हैं कि यहाँ के घाटों के लिए कोई विशेष संरक्षण-योजना नहीं है; ट्रस्ट अपनी-अपनी संपत्तियों की देखरेख अपने विवेक से करते हैं।

वास्तुकला
पांडे घाट छोटा घाट है और भव्यता का कोई प्रयास नहीं करता। इसकी सीढ़ियों को वर्तमान रूप 1965 में उत्तर प्रदेश सरकार के पुनर्निर्माण से मिला। खोरी–पांडे–सर्वेश्वर का पूरा भाग लगभग 0.126 हेक्टेयर में है, जो दशाश्वमेध जैसे बड़े घाट के विस्तार का एक अंश भर है।
यहाँ देखने योग्य वस्तु जल के पास नहीं, ऊपर है। धरोहर-प्रलेखना सटे हुए खोरी घाट के शीर्ष पर पाँच मंदिरों के एक समूह का उल्लेख करती है, जहाँ से नदी का सुंदर दृश्य खुलता है; इसी भाग में वह सर्वेश्वर मंदिर है जिससे इन सीढ़ियों को पुराना नाम मिला, और पास ही सोमेश्वर का मंदिर है। उनके ऊपर और पीछे रिहायशी गलियाँ सटकर खड़ी हैं, जैसा दक्षिणी चाप के अधिकांश हिस्से में है — इसलिए यह घाट किसी स्मारक से अधिक एक मोहल्ले के नदी-मुखी छोर की तरह पढ़ा जाता है।
बाबुआ पांडे का खोला हुआ अखाड़ा आज भी धरोहर अभिलेख में इस घाट की पहचान-वस्तु के रूप में, मकान-संख्या सहित, दर्ज है। उसका स्वरूप वास्तु-रूप में कभी था ही नहीं: अखाड़े की भूमि गूँथी हुई मिट्टी होती है — खोदी, सींची और नरम रखी गई — चिनाई नहीं। उनके संरक्षण ने पत्थर में जो छोड़ा वह घाट स्वयं है: वे पक्की सीढ़ियाँ, जो आज भी हर सुबह मोहल्ले को गंगा तक पहुँचाती हैं।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
यहाँ का आचरण काशी के एक स्नान-घाट का सीधा-सादा आचरण है। भक्त भोर की पहली रोशनी में स्नान के लिए उतरते हैं, संकल्प लेते हैं, सूर्य को अर्घ्य देते हैं, घर के देवस्थान के लिए लोटे में गंगाजल ले जाते हैं, और संध्या को मिट्टी का दीप जल पर छोड़ते हैं। पितरों के लिए तर्पण जल-किनारे किया जाता है, जैसा नदी के किसी भी स्थल पर किया जा सकता है। इन सीढ़ियों पर कोई संगठित आरती नहीं है और न आगंतुकों के लिए कोई आयोजन।
घाट के ऊपर के छोटे मंदिरों में दर्शन मोहल्ले के देवालयों की सामान्य लय से चलता है — गंगाजल से लिंग का अभिषेक, बिल्वपत्र, एक दीप — और उनके खुलने का समय ट्रस्ट तय करते हैं, वह कहीं छपा नहीं होता। भीतर जाना हो तो जाने वाले दिन स्थानीय स्तर पर पूछ लें।
जो यात्री यहाँ औपचारिक कर्म कराना चाहते हैं — संकल्प, तर्पण, श्राद्ध — वे पुरोहित की व्यवस्था पहले से कर लें। बड़े घाटों की तरह यहाँ पुरोहित नियमित रूप से नहीं बैठते, इसलिए मौके पर कुछ तय नहीं हो पाता।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
|---|---|---|
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Practical guidance to help you plan your pilgrimage
| Pilgrim Guidance | कैसे पहुँचेंपांडे घाट वाराणसी के घाटों के दक्षिणी चाप पर, खोरी घाट और सर्वेश्वर घाट के बीच है; आगे दिगपतिया, चौसट्ठी और राणा महल घाट पड़ते हैं और ऊपर की ओर राजा तथा नारद घाट। सबसे सरल रास्ता दशाश्वमेध से नदी के साथ-साथ पैदल चलना है — शीतला, अहिल्याबाई, मुंशी, दरभंगा, राणा महल, चौसट्ठी, दिगपतिया और सर्वेश्वर से होते हुए लगभग दस से पंद्रह मिनट। दशाश्वमेध मार्ग की गलियों से उतरकर भी पहुँचा जा सकता है, या नाव से — मल्लाह से पांडे घाट या सर्वेश्वर कहें। मानसून में जब जल निचली सीढ़ियों को ढक लेता है, घाटों के बीच का तटीय रास्ता प्राय: बंद रहता है और गलियाँ ही एकमात्र मार्ग बचती हैं। आने का सर्वोत्तम समयभोर से लगभग नौ बजे तक का समय वह है जब घाट अपनी लय में होता है — स्नानार्थी, उस पार से आती धूप, नदी पर चलती नावें। बैठने के लिए तीसरा पहर अच्छा रहता है। अधिकांश यात्रियों के लिए अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल है; जुलाई से सितंबर में जल ऊँचा रहता है और सीढ़ियाँ गाद से फिसलन भरी। देव दीपावली की रात वाराणसी के घाट दीपों की पंक्तियों से सज जाते हैं, यद्यपि मुख्य दर्शन-स्थल यहाँ से नदी के नीचे की ओर पड़ते हैं। क्या अपेक्षा रखेंयह छोटा, सादा और रिहायशी घाट है, और इसे इसी भाव से देखना चाहिए। न आरती, न बाज़ार, न गाइड-व्यवस्था, न सीढ़ियों पर कोई सुविधा। अपना पेयजल साथ रखें, स्नान करना हो तो अंगवस्त्र, और मंदिर में अर्पण के लिए छुट्टे पैसे। जहाँ नदी की गाद बैठी हो वहाँ पत्थर चिकना हो सकता है, इसलिए सँभलकर चलें और बुजुर्गों या बच्चों के साथ हों तो ऊपर की सूखी सीढ़ियों पर ही रहें। इस भाग में धोबी लंबे समय से काम करते आए हैं, इसलिए सीढ़ियों पर धुलाई घाट के रोज़मर्रा जीवन का हिस्सा मानें। यदि केवल देखना हो तो आधा घंटा पर्याप्त है; बैठने आए हों तो जितना मन चाहे — यहाँ किसी बात की जल्दी नहीं। |
स्थान
Varanasi, UP
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