प्रह्लाद घाट मंदिर वाराणसी की उत्तरी तटरेखा का वह वैष्णव तीर्थ है जो त्रिलोचन घाट और राज घाट के बीच स्थित है। परंपरा मानती है कि यह घाट भक्त प्रह्लाद के नाम पर है — वही विष्णु-भक्त बालक जिसने अग्नि, जल, विष और पिता हिरण्यकशिपु के क्रोध के बीच भी हरि-नाम नहीं छोड़ा, और जिसकी अटल भक्ति ने स्वयं भगवान को नरसिंह अवतार — आधा नर, आधा सिंह — के रूप में प्रकट होने को आकर्षित किया। घाट पर स्थित यह मंदिर इस भक्ति-स्मृति को जीवित तीर्थ रूप में सुरक्षित रखता है।
देवभक्त मानते हैं कि काशी की मुख्यतः शैव भूगोल के भीतर यह घाट वैष्णव भक्ति की एक गहरी रेखा वहन करता है। बनारस के वैष्णव परिवार, और गंगा-तट पर वैष्णव-तीर्थ क्रम पर चलने वाले यात्री प्रह्लाद घाट को अपने पड़ावों में गिनते हैं। मंदिर के गर्भगृह में नरसिंह की मूर्ति विराजमान है, प्रायः प्रह्लाद की युग्मित प्रतिमा के साथ — जहाँ बाल-भक्त हाथ जोड़े हुए भगवान के निकट खड़े दिखाई देते हैं।
कथा और स्थानीय विश्वास
प्रह्लाद की कथा हिन्दू परंपरा की मूल भक्ति-कथाओं में से एक है, जो श्रीमद्भागवत और विष्णु पुराण में वर्णित है। असुरराज हिरण्यकशिपु को यह वरदान प्राप्त था कि उसे न मनुष्य मार सके, न पशु; न दिन में, न रात में; न भीतर, न बाहर; न किसी अस्त्र से। इस अहंकार में उसने अपने राज्य में हरि-नाम पर ही प्रतिबंध लगा दिया। पर उसी का पुत्र प्रह्लाद, परंपरा कहती है कि गर्भ से ही, विष्णु-नाम छोड़ने को तैयार नहीं था।
परंपरा बताती है कि प्रह्लाद को अनेक यंत्रणाएँ दी गईं — पर्वतों से गिराया गया, विष पिलाया गया, हाथियों के नीचे डाला गया, और अंत में बुआ होलिका की गोद में जलती चिता पर बैठाया गया — वही प्रसंग जो हिन्दू हर वर्ष होलिका दहन के रूप में स्मरण करते हैं। हर परीक्षा में स्वयं हरि ने अपने भक्त की रक्षा की। अंत में जब हिरण्यकशिपु ने सभा का स्तंभ तोड़कर पूछा कि प्रह्लाद का रक्षक कहाँ है, तब विष्णु नरसिंह रूप में उसी स्तंभ से प्रकट हुए — न नर, न पशु; संधि-काल में; देहली पर; असुर को अपनी जंघाओं पर उठाकर अपने नखों से, जो कोई अस्त्र नहीं थे, उसका अंत किया।
काशी के देवभक्त मानते हैं कि जहाँ-जहाँ प्रह्लाद का नाम लिया जाता है, वहीं नरसिंह रक्षक रूप में उपस्थित रहते हैं। प्रह्लाद घाट के तीर्थ को इसी भाव से दर्शन दिया जाता है — एक ऐसा स्थान जहाँ कठिनाई में परखी गई भक्ति का सम्मान है, और जहाँ भक्त इस आश्वासन के साथ बैठ सकता है कि हरि अपने भक्तों को नहीं भूलते।

प्रह्लाद घाट मंदिर देवभक्तों के लिए निश्चल भक्ति का स्थान है — वह भक्ति जो परीक्षा में डिगती नहीं। मंदिर की केंद्रीय शिक्षा, जो भागवत के प्रह्लाद-चरित्र से ली गई है, यह है कि हरि का सच्चा और निरंतर स्मरण ही उनकी कृपा को नीचे उतार लाने के लिए पर्याप्त है। यहाँ आने वाले अनेक भक्त भीतर कोई कठिनाई लेकर आते हैं — भक्ति-मार्ग में विरोध, भय, रोग, या इस भाव से कि जीवन कोई परीक्षा माँग रहा है। प्रह्लाद-कथा उनके लिए केवल पुरानी कथा नहीं, जीवित आश्वासन है।
परंपरा मानती है कि नरसिंह विष्णु के उग्र रूप हैं — रूप में भयंकर, पर भक्त के लिए अत्यंत कोमल। पुराण उन्हें भक्तवत्सल कहते हैं, अर्थात जिनका भक्तों के प्रति प्रेम माँ के समान है। प्रह्लाद घाट पर नरसिंह का यही दोहरा भाव — भक्ति के विरोधियों के लिए भयानक और भक्त के लिए कोमल — दर्शन का भीतरी अर्थ है। भक्त तुलसी पत्र, पीले पुष्प और मीठे चावल का प्रसाद अर्पित करते हैं, और अनेक उसके पश्चात शांत भाव से नरसिंह स्तुति या नरसिंह कवच का जप करते हैं।
महात्म्य और होलिका-प्रह्लाद स्मृति
प्रह्लाद-होलिका प्रसंग के कारण यह तीर्थ ऋतु-संधि के समय विशेष भार रखता है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात, जब पूरे देश में होलिका दहन का अग्नि जलता है, तो जिस स्मृति का सम्मान किया जा रहा होता है वही इस तीर्थ पर सुरक्षित है — होलिका, जो असुर की बहन थी और जिसे ऐसी चादर का वरदान था कि वह अग्नि से न जले, बालक प्रह्लाद को अपनी गोद में जलाकर मारने बैठी। परंपरा मानती है कि स्वयं हरि ने उस चादर को बदल दिया, और रक्षा भक्त को मिल गई जबकि होलिका स्वयं भस्म हो गई। काशी के देवभक्त होली से पहली रात इसी कथा का स्मरण करते हैं और मानते हैं कि रंगों का उत्सव वस्तुतः उसी विजय से आरंभ होता है — उस सबके दहन से जो भक्ति का विरोध करता है।
देवभक्त मानते हैं कि प्रह्लाद की चार परीक्षाएँ — अग्नि, जल, विष और हाथी — एक भीतरी संकेत भी हैं। जो भक्त जिह्वा पर हरि-नाम लिए हुए सहता है, उसके लिए, कृपा से, वही चीज़ें जो उसे तोड़ने आई थीं, अंत में उसके हृदय को सशक्त करने वाली बन जाती हैं।
इतिहास
वाराणसी की उत्तरी तटरेखा — त्रिलोचन और राज घाट के बीच — काशी के शैव केंद्र के समानांतर एक सुदीर्घ वैष्णव भक्ति-परत वहन करती आई है। परंपरा प्रह्लाद घाट को इस तटरेखा के पुराने घाटों में गिनती है, जिसका नाम भक्त प्रह्लाद के साथ जुड़ा है और जिसे बनारसी स्मृति में दीर्घकाल से एक वैष्णव उपासना-स्थल के रूप में स्वीकार किया गया है।
काशी के अनेक तीर्थों की तरह इस मंदिर ने भी मध्यकाल की कठिनाइयों के दौर देखे, पर उपासना की धारा कभी नहीं टूटी। स्थानीय वैष्णव परिवार, घाट की पंडा-परंपरा और बनारस का व्यापक भक्ति-जीवन प्रह्लाद-नरसिंह परंपरा को बचाए रखते रहे। वर्तमान मंदिर सामान्यतः अठारहवीं शताब्दी के मराठा-कालीन पुनर्निर्माण से जुड़ा माना जाता है — वह युग जब होल्कर, भोंसले और पेशवा जैसे संरक्षकों ने काशी के अनेक तीर्थों का जीर्णोद्धार कराया।
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में भी यह घाट काशी की नियमित तीर्थ-परिक्रमा का अंग बना रहा, विशेषकर वैष्णव परिवारों के लिए और उन यात्रियों के लिए जो उत्तरी घाटों से होते हुए राज घाट और आदि केशव तक चलते थे। आज भी मंदिर आकार में छोटा है, पर उसकी उपासना अखंड है, और उसके नीचे की सीढ़ियों पर सदियों से चलते आ रहे स्नानार्थियों, नाविकों और तीर्थयात्रियों का क्रम वैसा ही बना हुआ है।

वास्तुकला
प्रह्लाद घाट मंदिर बनारसी शैली का एक सघन वैष्णव तीर्थ है, जो काशी के छोटे घाट-मंदिरों की विशिष्ट रचना का प्रतिनिधि है। इसकी शक्ति विस्तार में नहीं, निकटता और अखंड उपासना में है। मंदिर घाट की सीढ़ियों से थोड़ा ऊपर उठा हुआ है, और इसका द्वार उस प्रवाह की ओर खुलता है जिसमें तीर्थयात्री, स्नानार्थी और प्रातः-आरती एक साथ बहते हैं।
गर्भगृह में नरसिंह की मूर्ति प्रतिष्ठित है, प्रायः भक्त प्रह्लाद की हाथ जोड़े खड़ी प्रतिमा के साथ। नरसिंह मूर्ति को नित्य चंदन-लेप से अनुलिप्त किया जाता है और तुलसी पत्र तथा पीले पुष्पों से सजाया जाता है — विष्णु को प्रिय अर्पण। देवभक्त प्रायः कहते हैं कि भगवान का उग्र स्वरूप — उठे हुए नख, चरणों में पड़ा असुर — नित्य चंदन, कोमल वस्त्र और दीये की छोटी लौ में पूजा के समय स्वतः मृदु हो जाता है।
मंदिर का बाहरी रूप बनारसी घाट-तीर्थों की सामान्य रचना के अनुरूप है — गर्भगृह के ऊपर एक छोटा शिखर, एक संक्षिप्त मंडप, और नदी की ओर खुलता द्वार। मंदिर परिसर से गंगा की ओर उतरती सीढ़ियाँ उन पीढ़ियों की स्मृति वहन करती हैं जिन्होंने पहले नीचे स्नान किया और फिर ऊपर आकर दर्शन किया।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
प्रह्लाद घाट मंदिर की नित्य पूजा बनारसी घाट-तीर्थों की सामान्य वैष्णव लय के अनुरूप होती है। सटीक समय ऋतु और अवसर के अनुसार बदल सकते हैं, इसलिए विशेष दर्शन की योजना से पहले यात्रियों को मंदिर अधिकारियों से समय की पुष्टि कर लेनी चाहिए।
दिन की शुरुआत मंगला आरती और नरसिंह मूर्ति के अभिषेक से होती है, उसके पश्चात चंदन-लेप, तुलसी पत्र और पीले पुष्पों का अर्पण। दिनभर भक्त मीठे चावल, पंचामृत और ऋतु-फल का प्रसाद अर्पित करते हैं। संध्या आरती छोटे गर्भगृह को दीप-प्रकाश और घंटा-नाद के एक वृत्त में बदल देती है, जिसमें प्रायः नरसिंह-स्तुति या भागवत के प्रह्लाद-चरित्र के चुने हुए श्लोकों का पाठ भी जुड़ जाता है।
इस तीर्थ पर परंपरागत रूप से प्रिय अर्पण माने जाते हैं:
- तुलसी पत्र
- पीले पुष्प, विशेषतः गेंदा और सेवंती
- चंदन और अक्षत
- मीठे चावल या पंचामृत का प्रसाद
अनेक भक्त इस तीर्थ पर नरसिंह कवच का जप या प्रह्लाद-चरित्र का पाठ करते हैं, विशेषतः जब उनके भक्ति-मार्ग में कठिनाई आ रही हो। बनारस के वैष्णव परिवारों में एकादशी व्रत भी व्यापक रूप से रखा जाता है, और द्वादशी की प्रातः यहाँ दर्शन कर व्रत पारण किया जाता है। शनिवार को भी अतिरिक्त भक्त आते हैं, क्योंकि अनेक क्षेत्रीय परंपराओं में यह दिन नरसिंह से जुड़ा माना जाता है।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
|---|---|---|
| नरसिà¤à¤¹ à¤à¤¯à¤à¤¤à¥ | — | बहà¥à¤¤ ठधिठ|
| हà¥à¤²à¤¿à¤à¤¾ दहन à¤à¤° हà¥à¤²à¥ | — | ठधिठ|
| à¤à¤à¤¾à¤¦à¤¶à¥ | — | मधà¥à¤¯à¤® सॠठधिठ|
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| Pilgrim Guidance | पहुँच और उत्तरी घाटों का क्रमप्रह्लाद घाट वाराणसी की उत्तरी तटरेखा पर त्रिलोचन घाट (दक्षिण) और राज घाट (उत्तर) के बीच स्थित है। तीर्थयात्री इस मंदिर तक दो परंपरागत मार्गों से पहुँचते हैं। पहला, दशाश्वमेध या अस्सी से नाव लेकर उत्तर की ओर बहते हुए, बीच के घाटों से होकर प्रह्लाद घाट की सीढ़ियों पर उतरना। दूसरा, त्रिलोचन या मच्छोदरी की ओर से पुरानी काशी की संकरी गलियों से चलना। वैष्णव यात्री प्रह्लाद घाट को प्रायः उस व्यापक उत्तरी-घाट क्रम में सम्मिलित करते हैं जिसमें त्रिलोचन, पंचगंगा और वरुणा-गंगा संगम पर स्थित आदि केशव — काशी का वैष्णव उत्तरी सिरा — भी आते हैं। यात्रियों के लिए तैयारी
आने का सर्वोत्तम समयवैशाख शुक्ल चतुर्दशी (अप्रैल या मई) को आने वाली नरसिंह जयंती इस तीर्थ का प्रमुख वार्षिक अवसर है और इस दिन भक्तों की संख्या बहुत अधिक होती है। होलिका दहन और होली से पहली रात भी यहाँ प्रह्लाद-होलिका कथा के कारण विशेष भार रखती है। प्रत्येक पक्ष की एकादशी और शनिवार स्थिर भक्ति-प्रवाह लाते हैं। सामान्य दर्शन के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे सुखद रहता है, और मंगला आरती के बाद का प्रात:काल प्रायः सबसे शांत अनुभव देता है। |
स्थान
Varanasi, UP
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