राजा घाट काशी के तट के मध्य भाग में है — उस पट्टी में जो मानसरोवर घाट से उतरकर पांडे घाट तक जाती है। इसके ठीक ऊपर नारद घाट है और नीचे खोरी घाट। नगर के घाटों की पारंपरिक गिनती दक्षिण में असी से चलकर उत्तर में आदि केशव तक जाती है, और उसमें यह घाट तीसवें स्थान पर आता है। तट पर पैदल चलते यात्री के लिए यह बड़े समागम-घाटों से काफ़ी पहले पड़ता है — भीड़ में शामिल होने का नहीं, स्नान करके बैठ जाने का ठिकाना।
बहुत समय तक यह घाट अपने संरक्षक के नाम से ही जाना गया। 1821 और 1831 में बनारस का सर्वेक्षण करने वाले जेम्स प्रिंसेप ने इसे अमृतराव घाट लिखा, और 1909 में एडविन ग्रीव्ज़ ने भी यही नाम दर्ज किया; राजा घाट नाम मोतीचंद के 1931 के विवरण में मिलता है और तब से वही चला आ रहा है। दोनों नाम एक ही स्मृति की ओर संकेत करते हैं — एक मराठा संरक्षक, जिसने अपनी संपत्ति काशी में गंगा के किनारे लगा दी।
सीढ़ियों के ऊपर की भूमि स्वयं सीढ़ी से दो भागों में बँटी है। उत्तर की ओर घाट की हवेली है, दक्षिण की ओर अन्नपूर्णा मठ। परिसर की छतों पर तीन मंदिर हैं — अन्नपूर्णा, लक्ष्मीनारायण और शिव — और घाट के ऊपर संरक्षक के बनवाए चार देवालय: अमृतेश्वर, विनायकेश्वर, नारायणेश्वर और गंगेश्वर, तथा उनके साथ चार छोटे मंदिर।
यहाँ वही होता है जो किसी भी कार्यरत घाट पर सदा से होता आया है। दिन शुरू होने से पहले मोहल्ले के लोग स्नान के लिए उतरते हैं; कोई बाद में सूखी सीढ़ी पर संध्या-वंदन के लिए बैठ जाता है; ऊपर के पत्थरों पर कपड़े धुलते और सूखते हैं; नावें आती-जाती रहती हैं। गंगा यह सब बिना भेद के स्वीकार करती हैं, और यही साधारणपन काशी के भक्ति-जीवन का अंग है।
नाम को लेकर एक ज़रूरी बात
काशी में दो घाटों के नाम आपस में उलझ जाते हैं। यह राजा घाट तट के मध्य भाग में है। राजघाट — जिसे भैंसासुर राजघाट भी कहते हैं — बहुत उत्तर में, मालवीय पुल और काशी स्टेशन के पास है, और अपने अलग इतिहास तथा अपने पुरोहितों वाला बिलकुल अलग घाट है। नाव या ऑटो तय करते समय साथ में किसी पड़ोसी घाट का नाम भी बता दें, वरना नगर के दूसरे छोर पर पहुँच जाने की आशंका रहती है।

राजा घाट की अपनी कोई कथा उस तरह नहीं है जैसी दशाश्वमेध या मणिकर्णिका की है, और यह कह देना कोई कथा उधार ले लेने से कहीं बेहतर है। इसकी पवित्रता काशी-तीर्थ की ही पवित्रता है: भक्ति-दृष्टि में नगर के भीतर बहती गंगा का पूरा अर्धचंद्र पावन भूमि है, और उसके किसी भी छोर पर किया गया स्नान काशी क्षेत्र के भीतर ही किया गया स्नान माना जाता है। बड़े घाट उस श्रद्धा को एक जगह इकट्ठा कर देते हैं; कार्यरत घाट बस उसी के भीतर जीते रहते हैं।
संरक्षक ने यहाँ जो देवालय बनवाए, वे लगभग एक छोटी-सी श्रद्धा-घोषणा की तरह पढ़े जाते हैं। अमृतेश्वर और गंगेश्वर शिव के ही रूप हैं — एक अमृत के नाम पर, दूसरा नदी के नाम पर; विनायकेश्वर में गणपति का नाम — जिनका स्मरण हर आरंभ में सबसे पहले होता है — शिव के नाम से जुड़ता है; और नारायणेश्वर में उसी तरह विष्णु का नाम शिव के नाम से जुड़ जाता है — यह जोड़ काशी सदा सहज भाव से निभाती आई है। धरोहर-अभिलेख यह भी दर्ज करते हैं कि अमृत राव ने इसी घाट पर एक तीर्थ का जीर्णोद्धार कराया, जिसे अभिलेखों में प्रभास तीर्थ कहा गया है — यह स्मरण दिलाता हुआ कि काशी की पावन भूगोल ऐसे छोटे तीर्थों से भरी पड़ी है, जो कभी प्रसिद्ध नहीं हुए।
बनारस के अनेक परिवारों के लिए घर के सबसे पास का घाट ही नित्य साधना का घाट होता है: कार्तिक का पहला स्नान, उगते सूर्य को अर्घ्य, कार्तिक पूर्णिमा का दीपदान, यात्रा से पहले लिया गया संकल्प। भक्त मानते हैं कि गंगा की कृपा इस बात से नहीं तौली जाती कि पैर किस प्रसिद्ध सीढ़ी पर पड़े हैं। राजा घाट उसी तरह का घाट है, और दो सौ वर्षों से वैसा ही बना हुआ है।
अन्नदान — एक उपासना
सीढ़ियों के ऊपर के परिसर में कभी वह परंपरा चलती थी जिसे हिंदू आचार में दान का सर्वोच्च रूप कहा गया है — अन्नदान। लगभग 1980 तक यहाँ ब्राह्मणों, संस्कृत के विद्यार्थियों और साधुओं को भोजन कराया जाता था, और इसी हेतु मुख्य द्वार के पास एक भोजनशाला बनाई गई थी। वह परंपरा अब नहीं रही, पर भवन खड़ा है — और वह इस घाट को किसी भी किंवदंती से अधिक साफ़ ढंग से समझाता है: यह वह जगह थी जहाँ एक परिवार की संपत्ति उपासना में बदल दी गई, पहले पत्थर में और फिर पके अन्न में।
इतिहास
बनारस के तट ने अपना वर्तमान पत्थर-रूप मुख्यतः अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के संरक्षण से पाया, और राजा घाट ठीक उसी कथा का अंग है। तट की धरोहर-प्रलेखन के अनुसार यहाँ की भूमि को पहली बार समतल कर कुछ निर्माण लगभग 1720 में हुआ; अभिलेख उस संरक्षक का नाम राजीराव बालाजी बताते हैं, जिसकी पुष्टि अन्यत्र नहीं मिलती।
आज खड़ा पत्थर-घाट पेशवा अमृत राव का बनवाया माना जाता है। धरोहर-अभिलेख इस काम की अवधि 1780–1807 बताते हैं, पर इसकी पहली तिथि उनके जीवन से मेल नहीं खाती: उनका जन्म लगभग 1770 में हुआ था और 1790 के दशक के मध्य तक वे दक्खन में नज़रबंद रहे। इसलिए यह निर्माण उस पूरी अवधि का नहीं, उसके बाद के भाग का माना जाना चाहिए। अमृत राव बाजीराव द्वितीय के दत्तक भाई थे; 1803 में अंग्रेज़ों से हुए समझौते में उन्होंने पेशवाई का दावा छोड़कर पेंशन और बुंदेलखंड में जागीर ली, और उनका परवर्ती जीवन बनारस से गहरे जुड़ा रहा। नगर उन्हें उनके दान के लिए स्मरण करता है — एक बार उन्होंने बनारस में क़र्ज़ के कारण बंदी बनाए गए सभी लोगों का ऋण चुका दिया था — और 1814 में वे लगभग दो हज़ार लोगों की मंडली के साथ बनारस से बैद्यनाथ की यात्रा पर गए। 6 सितंबर 1824 को बनारस के निकट सिकरौल में उनका देहावसान हुआ।
घाट के साथ ही उन्होंने चार मंदिर बनवाए — अमृतेश्वर, विनायकेश्वर, नारायणेश्वर और गंगेश्वर — तथा चार सहायक देवालय, और उस तीर्थ का जीर्णोद्धार कराया जिसे अभिलेखों में प्रभास कहा गया है। जेम्स प्रिंसेप (1821 तथा 1831) और एडविन ग्रीव्ज़ (1909) के विवरणों में यह अमृतराव घाट है; मोतीचंद के 1931 के विवरण में इसे राजा घाट कहा गया, और आज यही नाम प्रचलित है।
लंबे समय तक परिसर में अन्नदान की परंपरा चलती रही, जिसमें ब्राह्मणों, संस्कृत के विद्यार्थियों और साधुओं को भोजन कराया जाता था; यह क्रम लगभग 1980 तक बना रहा। 1965 में उत्तर प्रदेश सरकार ने घाट का जीर्णोद्धार कर लाल पत्थर की वे सीढ़ियाँ बनवाईं जिन पर आज यात्री उतरते हैं। हवेली-परिसर की देखभाल अब इंटैक (INTACH) पारंपरिक निर्माण-विधियों से करती है; मंदिर-संपत्तियाँ पेशवा मंदिर ट्रस्ट के पास हैं और घाट की सतह नगर निगम के अधीन।

वास्तुकला
राजा घाट सादा घाट है, और उसकी गरिमा अलंकरण में नहीं, अनुपात में है। 1965 में राज्य सरकार की बनवाई सीढ़ियाँ लाल पत्थर की हैं, जो इसे तट के अधिकांश भाग के चुनार वाले बादामी बलुआ पत्थर से रंग में अलग कर देती हैं। यह सीढ़ी केवल यात्रियों को जल तक नहीं ले जाती; यही ऊपर की भूमि को दो भागों में बाँटती है — उत्तर में हवेली, दक्षिण में अन्नपूर्णा मठ।
परिसर की सबसे विशिष्ट इमारत मुख्य द्वार के पास की वह भोजनशाला है, जो ब्राह्मणों और साधुओं को भोजन कराने के लिए बनी थी। यह दो मंज़िला भवन है, ऊपर छत; हर मंज़िल पर एक रसोई, एक भंडार और स्तंभों की पंक्तियों पर टिका एक बड़ा हॉल, जिसे बीच का खुला चौकोर आँगन प्रकाश देता है। यह भवन पूरी तरह एक धार्मिक प्रयोजन से गढ़ा गया है, और देखने में भी वैसा ही लगता है।
परिसर की छतों पर तीन मंदिर हैं — अन्नपूर्णा, लक्ष्मीनारायण और शिव। अमृत राव के बनवाए चार देवालय और उनके साथ के चार छोटे मंदिर घाट के ऊपरी छोर को पूरा करते हैं। घाट तथा मंदिर-परिसर का मुख्य पावन क्षेत्र अभिलेखों में लगभग 0.30 हेक्टेयर दर्ज है — नीचे के भव्य घाटों की तुलना में छोटा, और जो काम इससे लिया जाता है उसके लिए पूरी तरह पर्याप्त।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
यहाँ का आचरण काशी-तट का सामान्य आचरण है, बिना किसी आडंबर के निभाया हुआ। सूर्योदय से पहले स्नान आरंभ हो जाता है; निचली सीढ़ियों से उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है; कुछ लोग बाद में ऊपरी चबूतरे की छाँव में संध्या-वंदन या जप के लिए बैठ जाते हैं। पितरों के लिए तर्पण यहाँ भी वैसे ही होता है जैसे गंगा के किसी भी घाट पर, और सबसे अधिक पितृ पक्ष में।
सीढ़ियों के ऊपर के देवालयों — अमृतेश्वर, गंगेश्वर, विनायकेश्वर, नारायणेश्वर — तथा छतों पर बने अन्नपूर्णा, लक्ष्मीनारायण और शिव मंदिरों का दर्शन प्रायः संक्षिप्त और शांत होता है। अर्पण सरल हैं: गंगाजल, बिल्वपत्र, पुष्प, एक दीप। दशाश्वमेध जैसी कोई नियत सार्वजनिक आरती यहाँ नहीं होती, और न ही ऐसा कोई आयोजन जिसके लिए समय देखकर पहुँचना पड़े।
छोटे मंदिरों के पट उनके ट्रस्टों की अपनी रीति से खुलते हैं, किसी छपी हुई सूची से नहीं। कोई विशेष पूजा करानी हो तो एक दिन पहले मंदिर ट्रस्ट या स्थानीय आचार्य से बात कर लें, और यात्रा से पहले समय स्थानीय स्तर पर सत्यापित कर लें।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
|---|---|---|
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à¤à¤à¤à¤¾ दशहरा: à¤à¤à¥à¤¤ मानतॠहà¥à¤ à¤à¤¿ à¤à¤¸ दिन à¤à¤à¤à¤¾-सà¥à¤¨à¤¾à¤¨ दस पà¥à¤°à¤à¤¾à¤° à¤à¥ दà¥à¤·à¥à¤ à¤à¥ हर लà¥à¤¤à¤¾ हà¥, à¤à¤° à¤à¤¸à¥ सॠà¤à¤¸ परà¥à¤µ à¤à¤¾ नाम दशहरा पड़ा।
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| Pilgrim Guidance | कैसे पहुँचेंराजा घाट तक पहुँचने का सबसे सहज मार्ग दशाश्वमेध से तट-तट पैदल चलना है — पांडे और खोरी घाट पार करते हुए धारा की उलटी दिशा में लगभग पंद्रह-बीस मिनट। नगर की ओर से रास्ता दशाश्वमेध–सोनारपुरा मार्ग के नीचे की गलियों से जाता है; यदि राजा घाट का नाम कोई न पहचाने तो नारद घाट या पांडे घाट पूछ लें और थोड़ा-सा पैदल चल लें। जब नदी चढ़ी हुई न हो, तब दशाश्वमेध या असी से ली गई साझा या निजी नाव भी सीधे इन्हीं सीढ़ियों पर उतार देती है। यात्रियों के लिए तैयारी
आने का सर्वोत्तम समयपौ फटने से लेकर लगभग नौ बजे तक का समय वह है जब घाट स्नान और शांत साधना से भरा रहता है। बनारस में अक्टूबर से मार्च तक का मौसम सबसे अनुकूल है। मानसून में निचली सीढ़ियाँ जल में डूब जाती हैं और घाट का काम-काज ऊपर की सीढ़ियों पर चला आता है; तब नावें किनारे न लग पाएँ, यह भी संभव है। कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली पर यहाँ भी काशी के हर घाट की तरह दीप जलते हैं — पर नीचे के घाटों की तुलना में कहीं कम भीड़ के साथ। |
स्थान
Varanasi, UP
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