राणा महल घाट काशी के तट की उस मध्य अर्धचंद्राकार रेखा पर है जहाँ यह चौसट्टी घाट के उत्तरी छोर से जुड़कर दरभंगा घाट तक चला जाता है। नाम इसे ऊपर खड़े राणा महल से मिला है। वाराणसी के घाटों की धरोहर-दस्तावेज़ी में दर्ज है कि यह महल उदयपुर (मेवाड़) के महाराणा जगत सिंह ने बनवाया था, और काशी-यात्रा पर आए महाराणा ने यहीं आश्रय लिया था। वही दस्तावेज़ी समय लगभग 1670 बताती है; यह वर्ष मेवाड़ के जिन महाराणा जगत सिंह का नाम लिया गया है उनके शासन-काल से मेल नहीं खाता, इसलिए वर्ष की जगह सत्रहवीं सदी कहना अधिक सुरक्षित है। महल उदयपुर का है, यह स्वतंत्र रूप से पुष्ट है: सन् 1905 में तट का वर्णन करते हुए ई. बी. हैवेल ने लिखा — कि इस घाट पर “उदयपुर के राणा ने एक महल बनवाया है”।
यह घाट तीर्थयात्री को कोई भव्य आयोजन नहीं देता; देता है गंगा का वह अटूट, रोज़ का काम। सीढ़ियाँ ऐसी बनी हैं कि हर पाँचवीं सीढ़ी पर एक चौड़ा चबूतरा आता है — बरसात में गंगा चढ़ें या जाड़े में उतरें, स्नान करने वालों, धोबियों और नाव बाँधने वालों को जल के किनारे कोई न कोई चबूतरा हमेशा मिल जाता है। ऊपर की सीढ़ियों में उत्तर और दक्षिण की ओर छोटे-छोटे आले हैं जिनमें शिवलिंग विराजते हैं; दिन भर आते-जाते लोग उन पर गंगाजल और बिल्वपत्र चढ़ाते रहते हैं। घाट के ठीक ऊपर की गली में वक्रतुण्ड विनायक का स्थान है — उन्हीं गणेश-स्थानों में से एक, जो तट के पीछे की गलियों में जगह-जगह बसे हुए हैं।
घाटों की कतार में इसका स्थान भी इसकी पहचान का हिस्सा है। नदी के किनारे उत्तर की ओर चलते हुए यात्री पहले चौसट्टी घाट पार करता है, फिर राणा महल, फिर दरभंगा और मुंशी, फिर अहिल्याबाई और शीतला — और तब दशाश्वमेध पहुँचता है। इसलिए अधिकांश लोग राणा महल तक जान-बूझकर नहीं, चलते-चलते पहुँचते हैं। अपने दोनों पड़ोसी घाटों से यह कहीं अधिक शांत है, और बहुतों के लिए यही शांति इसका काम है — दशाश्वमेध की भीड़ जमा होने से कुछ देर पहले, या आरती के दीप उठ जाने के बाद, गंगा के साथ थोड़ी देर बैठ जाने की जगह।

राणा महल का अपना कोई अलग माहात्म्य नहीं है। इन सीढ़ियों से जुड़ी कोई पौराणिक कथा नहीं मिलती। इसकी पवित्रता वही है जो काशी के पूरे तट की पवित्रता है — यहाँ गंगा उत्तरवाहिनी हैं, अपनी ही धारा के विरुद्ध उत्तर की ओर मुड़ी हुई, और परंपरा मानती है कि इस अर्धचंद्र पर कहीं भी किया गया स्नान तीर्थ-स्नान है। जो भक्त राणा महल पर स्नान करता है वह किसी प्रसिद्ध घाट पर स्नान करने वाले से कम नहीं करता; गंगा तो एक ही हैं।
जो चीज़ इस घाट के पास सचमुच है, वह है एक बनारसी मुहल्ले की छोटी, रोज़ की भक्ति। ऊपर की सीढ़ियों के आलों में विराजे शिवलिंग कोई बड़ी प्रतिष्ठा नहीं हैं — ये वे शिवलिंग हैं जिन्हें स्नान करके लौटता आदमी अंजुरी भर गंगाजल चढ़ा देता है, और हाथ में हो तो एक बिल्वपत्र भी। संकल्प, पितरों के लिए तर्पण, सूर्य को अर्घ्य — ये सब यहाँ वैसे ही हो सकते हैं जैसे किसी और घाट पर; पूछने पर पड़ोसी घाटों के पंडा परिवार को बिठाकर विधि करा देते हैं।
ऊपर गली में वक्रतुण्ड विनायक
घाट के ऊपर की गली में वक्रतुण्ड विनायक का स्थान काशी की उस बड़ी रचना का अंग है जिसमें गणेश किसी एक मंदिर में नहीं, बल्कि छप्पन विनायकों के रूप में पूरे नगर में विराजते हैं — दिशाओं और वृत्तों के एक क्रम में गलियों पर ही उतरा हुआ मंडल। भक्त मानते हैं कि किसी भी काम के आरंभ में पहले विनायक का स्मरण होता है, और दर्शन के लिए निकलता यात्री अक्सर नदी की ओर मुड़ने से पहले अपनी गली के गणेश को छू लेता है।
राजघराने नदी पर क्यों बसे
घाट के ऊपर खड़ा महल जितना स्थापत्य की बात है उतनी ही भक्ति की भी। राजपूत, मराठा, बंगाली और बिहारी — अनेक घरानों ने काशी के तट पर घर इसलिए बनवाए कि उनका परिवार काशीवास कर सके, नित्य गंगा-स्नान कर सके, और वृद्धावस्था में उस मृत्यु की आशा रख सके जिसे परंपरा इस क्षेत्र में मोक्षदायिनी मानती है। मेवाड़ के घराने ने भी यहाँ उसी कारण से बनवाया जिस कारण से बाक़ी सबने — काशी में गंगा पर एक देहरी पाने के लिए।
इतिहास
वाराणसी के घाटों के लिए तैयार धरोहर-दस्तावेज़ी इस घाट के ऊपर के महल को मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह का बनवाया हुआ दर्ज करती है, और यह भी कि महाराणा अपनी काशी-यात्रा के दौरान यहीं ठहरे थे। इसी संरक्षण से घाट को वह नाम मिला जो आज तक चला आ रहा है। दस्तावेज़ी यहाँ उदयपुर के काम का समय लगभग 1670 बताती है, और सटे हुए चौसट्टी घाट वाली प्रविष्टि भी यही कहती है — कि लगभग 1670 में उदयपुर के राजा ने उस घाट का जीर्णोद्धार और विस्तार कराया। इस तरह मेवाड़ से संबंध और तिथि, दोनों दो जगह दर्ज हैं। कमज़ोर कड़ी नाम है: 1670 में मेवाड़ में कोई महाराणा जगत सिंह गद्दी पर नहीं थे, इसलिए सदी भले निश्चित हो, व्यक्ति को अनिश्चित ही मानना चाहिए।
दो सदियों से भी अधिक समय बाद यह संबंध आने वालों को स्पष्ट दिखता था। सन् 1905 में तट का वर्णन करते हुए ई. बी. हैवेल मुंशी घाट से दक्षिण बढ़ते हैं और लिखते हैं कि “आगे राणा घाट है, जहाँ उदयपुर के राणा ने एक महल बनवाया है”। उन्होंने यह भी लिखा कि तट के इस हिस्से की अनेक इमारतों में ब्राह्मण संन्यासी रहते थे, जिनका निर्वाह हिंदू राजाओं और सामंतों की दी हुई वृत्ति से चलता था — यानी ये नदी-किनारे के भवन केवल आते-जाते राजाओं के ठिकाने नहीं थे, बल्कि ऐसी व्यवस्थाएँ थीं जिनसे यहाँ एक स्थायी साधना-जीवन चलता रहा।
आधुनिक काल में यह संपत्ति बँट गई है। धरोहर-दस्तावेज़ी के अनुसार महल से जुड़ी मंदिर-संपत्तियों की देखरेख आज भी उदयपुर एस्टेट का न्यास करता है, जबकि महल का बड़ा हिस्सा निजी हाथों में चला गया और उसका एक भाग अब आतिथ्य-व्यवसाय में लगा है। नीचे की सीढ़ियाँ — यानी वह हिस्सा जो तीर्थयात्री के काम का है — नगर निगम की हैं और उसी की देखरेख में हैं। इन सब बदलावों के बीच घाट का साधारण उपयोग बना रहा: आज भी सुबह लोग इन्हीं सीढ़ियों से उतरकर गंगा में स्नान करते हैं — और सीढ़ियाँ इसी के लिए बनी थीं।

वास्तुकला
राणा महल बनारसी तट पर खड़ी एक राजपूत इमारत है, और वह इस बात को छिपाती नहीं। घाट की धरोहर-दस्तावेज़ी में गंगा की ओर मुँह किए तीन ओसारों (बरामदों) और पत्थर की जालीदार खिड़कियों का वर्णन है — राजस्थान की वही बारीक जाली, जो देश पार करके काशी में गंगा के ऊपर आ बैठी। ठीक उत्तर में दरभंगा महल के बलुआ पत्थर के अग्रभाग और यूनानी शैली के स्तंभों के बग़ल में खड़ा राणा महल साफ़ तौर पर मेवाड़ का लगता है।
नीचे का घाट विस्तार में छोटा है — दस्तावेज़ में इसका क्षेत्रफल लगभग 0.06 हेक्टेयर दर्ज है — और इसकी बनावट पूरी तरह व्यावहारिक है। जल के किनारे से ऊपर तक हर पाँचवीं सीढ़ी पर एक चबूतरा रखा गया है, ताकि नदी किसी भी स्तर पर हो, उतरने-चढ़ने की जगह बनी रहे। ऊपर की सीढ़ियों में उत्तर और दक्षिण की ओर शिवलिंग रखने के लिए आले काटे गए हैं।
भोर की पहली रोशनी में नाव से देखने पर यह घाट एक लंबे अग्रभाग का एक पट्ट भर लगता है: दक्षिण में चौसट्टी की सीढ़ियाँ, फिर राणा महल के ओसारे और जालियाँ, फिर बग़ल में उठते दरभंगा और मुंशी। यह निरंतर कतार — एक के बाद एक महल, हर एक भारत के अलग हिस्से के अलग घराने का बनवाया, और सब एक ही नदी की ओर मुँह किए — वही है जिसे वाराणसी के घाटों को विश्व धरोहर सूची में रखवाने के लिए तैयार की गई धरोहर-दस्तावेज़ी दर्ज और सुरक्षित करना चाहती है।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
राणा महल आयोजनों का घाट नहीं, स्नान का घाट है, और इसकी लय घरेलू है। सूर्योदय से बहुत पहले आसपास की गलियों के लोग स्नान के लिए उतरते हैं, लौटते समय आलों के शिवलिंगों पर अंजुरी भर जल चढ़ाते हैं और अपने दिन में लग जाते हैं। काशी आए परिवार यहाँ भी वैसे ही संकल्प और पितृ-तर्पण कराते हैं जैसे किसी और घाट पर; पूछने पर पड़ोसी घाटों के पंडा साथ बैठकर विधि करा देते हैं।
दिन भर सीढ़ियों पर नदी का साधारण जीवन चलता रहता है — पत्थर पर सूखते कपड़े, नीचे के चबूतरों से बँधी नावें, बीच की छतों पर खेलते बच्चे। कार्तिक के महीने में तो पौ फटने से पहले ही यह पूरा हिस्सा कार्तिक-व्रत रखने वालों से भर जाता है।
यात्रियों को यह जान लेना चाहिए कि राणा महल पर कोई नियमित संध्या गंगा आरती नहीं होती। मध्य तट की बड़ी आरती दशाश्वमेध पर होती है, जो यहाँ से कुछ ही मिनट उत्तर है; और एक छोटी आरती दक्षिण में अस्सी घाट पर। राणा महल इसके बदले जो देता है वह है जल के किनारे बिना जल्दबाज़ी के एक दीप जलाकर बहा देने की जगह।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
|---|---|---|
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Practical guidance to help you plan your pilgrimage
| Pilgrim Guidance | कैसे पहुँचेंराणा महल घाट मध्य तट पर चौसट्टी घाट और दरभंगा घाट के बीच है। अधिकांश यात्री घाटों पर पैदल चलते हुए ही यहाँ पहुँचते हैं — दशाश्वमेध से दक्षिण की ओर शीतला, अहिल्याबाई और मुंशी पार करते हुए थोड़ी दूर। शहर की ओर से रास्ता दशाश्वमेध और सोनारपुरा के पीछे की गलियों से आता है; गलियाँ सँकरी हैं और आख़िरी हिस्सा पैदल ही तय करना पड़ता है। नदी से आएँ तो मध्य घाटों पर चलने वाली कोई भी साझा या निजी नाव इसके सामने से गुज़रती है, और महल का अग्रभाग जल से ही सबसे अच्छा दिखता है। यह घाट किस पैदल-यात्रा का हिस्सा हैराणा महल को अलग गंतव्य मानने के बजाय तट की उस परंपरागत पैदल-यात्रा का अंग मानना ठीक रहता है। एक प्रचलित प्रात:क्रम इस तरह है:
सर्वोत्तम समयघाटों पर पैदल चलने के लिए अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल है। भोर से लगभग आठ बजे तक का समय वह है जब घाट एक साथ सबसे जीवंत और सबसे शांत होता है। देर दोपहर की धूप सीधे महल के अग्रभाग पर पड़ती है — ओसारे और जाली का काम देखने के लिए नाव से यही सबसे अच्छा समय है। बरसात में नीचे के चबूतरे जल में डूब जाते हैं और सीढ़ियाँ फिसलन भरी हो जाती हैं; धीरे चलें, और बुज़ुर्गों या बच्चों के साथ हों तो ऊपर की छतों पर ही रहें। |
स्थान
Varanasi, UP
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