आदि विश्वेश्वर — इस नाम का अर्थ ही है पहले, यानी मूल विश्वेश्वर। यह मंदिर गोदौलिया–चौक मार्ग पर बांसफाटक के उस छोटे परिसर में है, जिसे वह रज़िया बीबी मस्जिद के साथ साझा करता है। काशी की भक्ति-दृष्टि में विश्वेश्वर अनेक देवताओं में से एक नहीं हैं; वे इस क्षेत्र के अधिष्ठाता हैं, और नगर की सारी यात्रा-परंपरा उन्हीं के सापेक्ष सजी है। यह परिसर वही जगह है जहाँ उस नाम की सबसे पुरानी स्मृति सँजोई गई है, और अनेक बनारसी परिवारों के लिए यहाँ तक की यह छोटी-सी पैदल दूरी काशी को ठीक से जानने का हिस्सा है, केवल घूम आने का नहीं।
मंदिर छोटा है। भीतर पहुँचने पर गर्भगृह में लिंग के दर्शन होते हैं; इस स्थल के धरोहर-अभिलेख में यह मान्यता दर्ज है कि लिंग का जो योनि भाग, अर्थात आधार है, वह तेरहवीं शताब्दी के मंदिर का ही बचा हुआ अंश है। गर्भगृह में एकदंत विनायक और सूर्यदेव की मूर्तियाँ हैं; राम और उनके परिवार की मूर्तियाँ बहुत बाद में जोड़ी गईं। परिसर में काशी की दो गौरियों — श्रृंगार गौरी और सौभाग्य गौरी — के स्थान हैं, एक पुराने वृक्ष के नीचे शनिदेव की मूर्ति है, और पास ही यक्ष भैरव का स्थान। यह भव्यता नहीं, एक सघन और घरेलू-सी देव-मंडली है, और यही इसका स्वभाव है।
ठीक बगल में, एक ऊँचे टीले पर रज़िया बीबी मस्जिद खड़ी है। वह न खंडहर है, न कोई प्रदर्शित स्मारक। उसका प्रबंध सुन्नी वक़्फ़ के अधीन है और एक मुतवल्ली उसका प्रतिनिधित्व करते हैं, तथा हर शुक्रवार वहाँ अच्छी-ख़ासी संख्या में नमाज़ी जुटते हैं। अर्थात इस परिसर में आने वाला व्यक्ति ऐसी जगह खड़ा होता है जिसका उपयोग दो समुदाय करते हैं, और जिसके चारों ओर गली का साधारण बनारसी जीवन — दुकानें, घर, बच्चे, आते-जाते सामान — अपनी गति से चलता रहता है। इस दर्शन में तमाशे की कोई जगह नहीं है।
सत्मार्ग इस स्थल को उन यात्रियों के लिए रखता है जो जानना चाहते हैं कि काशी में विश्वेश्वर की उपासना परंपरा किस भूमि से जोड़ी जाती है, और जो उस जानकारी को संयम के साथ थाम सकते हैं। इस भूमि का इतिहास दर्ज है, पर दर्ज करने वाले भी सावधान रहे हैं: धरोहर-अभिलेख स्वयं कहता है कि विश्वेश्वर का प्रथम मूल स्थान आज भी ऐतिहासिक अनुसंधान का विषय है। हम इस पृष्ठ पर वही संयम रखते हैं — जो अभिलिखित है वह कहते हैं, जो परंपरा की मान्यता है उसे मान्यता कहकर कहते हैं, और जिन प्रश्नों को विद्वत्-जगत ने अब तक तय नहीं किया, उन्हें खुला छोड़ देते हैं।
कथा और लोक-विश्वास
इस परिसर से जुड़ा भक्ति-भाव एक ही शब्द में बँधा है — आदि। काशी की परंपरा मानती है कि विश्वेश्वर की पहली प्रतिष्ठा और पहली पूजा यहीं हुई, और आज खड़ा मंदिर उस स्मृति को भव्यता के दावे के रूप में नहीं, एक चिह्न के रूप में आगे बढ़ाता है। यहाँ आने वाले भक्त वैभव देखने नहीं आते; वे उस जगह पर सिर झुकाने आते हैं जिसे परंपरा आरंभ कहती है।
दूसरा, कहीं अधिक कोमल विश्वास परिसर की गौरी-प्रतिमाओं से जुड़ा है। सौभाग्य गौरी की पूजा सौभाग्य के लिए होती है — गृहस्थी के कल्याण और दांपत्य की मंगलकामना के लिए। काशी की नवगौरी यात्रा, जिसे परंपरा काशी खंड से जोड़ती है, चैत्र नवरात्र की तृतीया को भक्तों को सौभाग्य गौरी के इसी स्थान पर लाती है। उस सुबह यह शांत गली फूल, सिंदूर और चुनरी लिए स्त्रियों से भर जाती है। अनेक बनारसी परिवारों के लिए वर्ष का वही एक दिन है जब यह परिसर सबसे अधिक जीवंत दिखाई देता है।

काशी की पवित्र व्यवस्था में विश्वेश्वर केवल एक देवता नहीं हैं। वे क्षेत्र के अधिष्ठाता हैं, और नगर की समस्त यात्रा-परंपरा उन्हीं के चारों ओर बुनी गई है। इस परिसर का महत्व उसके नाम के पहले शब्द से ही खुलता है: भक्त मानते हैं कि काशी में विश्वेश्वर की उपासना यहीं से आरंभ हुई। इतिहास इस पहचान को अंततः सिद्ध कर पाएगा या नहीं, यह अलग प्रश्न है; पर यह मान्यता नगर ने सदियों से सँभाल रखी है, और भक्तों को इस गली तक लाने वाली वही मान्यता है।
इसलिए शैव भक्त के लिए आदि विश्वेश्वर का दर्शन निरंतरता का दर्शन है। यहाँ का लिंग छोटा है और गर्भगृह सादा; भक्त प्रायः कहते हैं कि बात ही यही है — काशी में महादेव की उपस्थिति सोने या विस्तार पर नहीं टिकी, और एक बहुत सादा देवालय भी उसे उतनी ही पूर्णता से थामे रहता है जितना कोई भव्य देवालय। जो यात्री इस भाव से यहाँ खड़े होते हैं, उन्हें लगता है कि यहाँ बिताए कुछ मिनट बाद में काशी विश्वनाथ में लिए जाने वाले दर्शन का अर्थ भी चुपचाप बदल देते हैं।
परिसर की दूसरी धारा शक्ति की है। काशी जितनी शिव की नगरी है, उतनी ही देवी की भी, और शास्त्रीय नवगौरी यात्रा नौ गौरी-स्थानों को पुरानी गलियों में पिरोती चलती है। उस क्रम में यहाँ सौभाग्य गौरी की उपासना होती है, चैत्र नवरात्र की तृतीया को; इसी से यह स्थल केवल एक ऐतिहासिक पता नहीं रह जाता, बल्कि एक जीवित यात्रा-क्रम का पड़ाव बन जाता है। धरोहर-अभिलेख इसी परिसर में श्रृंगार गौरी का एक स्थान भी दर्ज करता है। भक्त मानते हैं कि सौभाग्य गौरी की कृपा गृहस्थी को छूती है — दांपत्य का कुशल, घर की स्थिरता, संतान का सौभाग्य।
यहाँ भैरव की उपस्थिति भी है। पास ही यक्ष भैरव का स्थान है, और काशी की समझ में भैरव क्षेत्र के कोतवाल हैं, जो नगर की रक्षा करते हैं और यहाँ रहने की अनुमति देते हैं। परिसर के छोर पर उनका होना काशी की उसी पुरानी व्यवस्था के अनुरूप है — बीच में शिव, साथ में देवी, सीमा पर भैरव, और सेवा में गणेश तथा सूर्य।
अंत में, यह परिसर यात्री से एक ऐसी बात भी माँगता है जो भक्ति की नहीं। यहाँ एक ही छोटी-सी भूमि पर दो समुदाय अपनी-अपनी उपासना बहुत समय से निभाते आए हैं, और ऐसी जगहों पर काशी का अपना ढंग यही रहा है — चुपचाप पूजा जारी रखना, और बहस विद्वानों तथा उचित मंचों पर छोड़ देना। यही भाव लेकर यहाँ आना चाहिए।
इतिहास
इस भूमि का इतिहास दर्ज है, पर एक स्पष्ट चेतावनी के साथ दर्ज है, और वह चेतावनी सबसे पहले रखनी चाहिए। नगर के विद्वानों के सर्वेक्षण से बने वाराणसी धरोहर-अभिलेख में साफ़ लिखा है कि विश्वेश्वर अथवा विश्वनाथ का प्रथम मूल स्थान “ऐतिहासिक अनुसंधान का विषय है”। यही ईमानदार स्थिति है, और यह पृष्ठ उसी पर टिका रहता है।
अभिलेख जिसे स्वीकृत मानता है, वह यह है कि इस स्थल का सबसे पुराना देवालय 1194 में क़ुतुबुद्दीन ऐबक के अभियान के दौरान ध्वस्त हुआ, और विश्वेश्वर का मंदिर वहीं था जहाँ आज रज़िया मस्जिद है। रज़िया सुल्ताना (शासनकाल 1236–1240) के समय उस रिक्त भूमि पर मस्जिद बनी; उन्हीं के नाम से बनारस आज भी इसे रज़िया बीबी मस्जिद कहता है।
इसके आगे की शताब्दियों के विवरण आपस में मेल नहीं खाते, और दोनों पक्ष यहाँ बिना किसी निर्णय के रखे जा रहे हैं। धरोहर-अभिलेख के अनुसार 1448 में जौनपुर के महमूद शाह शर्क़ी ने वहाँ पड़े अवशेष हटवाकर रज़िया बीबी मस्जिद का विस्तार कराया, और तेरहवीं शताब्दी के अंत तक अविमुक्तेश्वर के परिसर में पुनः स्थापित विश्वनाथ की उपासना पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य तक चलती रही। दूसरे प्रकाशित विवरण कहते हैं कि पुनर्निर्मित मंदिर जौनपुर के शर्क़ी शासकों के समय क्षतिग्रस्त हुआ और बाद में पंद्रहवीं शताब्दी के अंत में सिकंदर लोदी के शासन में गिराया गया — प्रकाशित विवरण इस वर्ष को कहीं 1490 और कहीं 1494 बताते हैं। इतिहासकारों ने इसे तय नहीं किया है, और हम भी नहीं करते।
जिस बात पर कोई मतभेद नहीं, वह है इस पूरे क्षेत्र में उपासना की निरंतरता। काशी की मुख्य विश्वनाथ-उपासना स्थान बदलती रही — अविमुक्तेश्वर के परिसर में पुनर्निर्मित हुई, फिर 1585 में अकबर के काल में पंडित नारायण भट्ट के प्रयत्न और राजा टोडरमल के सहयोग से पुनः खड़ी हुई, और अंततः 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा उस मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित हुई जिसे आज यात्री काशी विश्वनाथ के नाम से जानते हैं। इस सारे उलटफेर के बीच काशी ने शिव को विश्वेश्वर कहकर पुकारना कभी नहीं छोड़ा।
इसी परिसर की बात करें तो आज खड़ा मंदिर बाद में, भूमि के पश्चिमी भाग में बना, और वह आदि विश्वेश्वर — प्रथम विश्वेश्वर — के नाम से जाना जाता है। इसकी देखभाल एक मंदिर न्यास करता है, जो प्रबंध, मरम्मत, सफ़ाई और पुताई सँभालता है; इसके संरक्षण के लिए कोई अलग धरोहर-संस्था नहीं है। बगल की मस्जिद का प्रबंध सुन्नी वक़्फ़ नामक धर्मार्थ न्यास के अधीन है, और एक मुतवल्ली उसका प्रतिनिधित्व करते हैं जो पुजारी और प्रबंधक दोनों की भूमिका निभाते हैं। दोनों व्यवस्थाएँ इस गली में बहुत समय से साथ-साथ चल रही हैं।

वास्तुकला
परिसर छोटा है — धरोहर सर्वेक्षण दोनों संपत्तियों में से प्रत्येक के लिए लगभग छह सौ वर्गमीटर दर्ज करता है — और इसकी स्थापत्य-रुचि लगभग पूरी तरह इस बात में है कि यहाँ का पत्थर स्वयं क्या बताता है।
मस्जिद एक ऊँचे टीले पर है, इतनी ऊँचाई पर कि उसका आँगन अब आसपास उग आए घरों की छतों के लगभग बराबर आ गया है। पश्चिम दिशा में गोल बुर्जीनुमा शीर्ष वाली एक पुरानी दीवार आज भी दिखाई देती है। नमाज़-कक्ष की योजना असामान्य है: अग्रभाग के बीच से केंद्रीय द्वार आगे निकला हुआ है और उसके दोनों ओर तीन-तीन मेहराबदार खंड हैं। भीतर एक मोटी दीवार जगह को दो कक्षों में बाँटती है, जिनके बीच तीन मेहराबों से आवाजाही है। सर्वेक्षण दर्ज करता है कि ये दोनों कक्ष ऐसे स्तंभों, सरदलों और शिलापट्टों से बने हैं जो सन् 1000 ईसवी से भी पुरानी किसी इमारत से लिए गए थे — यह तथ्य इन अंगों की तराश में साफ़ दिखाई देता है, और विद्वान इससे मस्जिद नहीं, बल्कि उसमें लगी सामग्री की तिथि निकालते हैं। उत्तर की दीवार पहले सीधे एक बाग़ में खुलती थी, जहाँ केवल सरदल थामे दो युगल स्तंभ थे; वह खुलापन अपेक्षाकृत हाल में चुनवा दिया गया। योजना का बारीक अध्ययन बताता है कि मस्जिद कभी पूरी नहीं हुई और दक्षिणी कक्ष मूलतः केंद्र में रखा जाना था। दक्षिणी कक्ष को तेरहवीं शताब्दी का, यानी रज़िया सुल्ताना के काल का, और क़िबला दीवार के पीछे प्रस्तावित विस्तार तथा उत्तर दीवार के ताखों को पंद्रहवीं शताब्दी का माना जाता है।
परिसर के पश्चिमी भाग का मंदिर रूप में सादा और आकार में साधारण है, जो काशी की गलियों के पुराने देवालयों का स्वभाव है, कोई कमी नहीं। इसका भक्ति-भार उसके भीतर की चीज़ों से बनता है: गर्भगृह में लिंग, जिसका योनि-आधार तेरहवीं शताब्दी के देवालय का बचा हुआ अंश माना जाता है; भीतर एकदंत विनायक और सूर्य की मूर्तियाँ; बहुत बाद में जुड़ीं राम और उनके परिवार की मूर्तियाँ; परिसर में खड़े श्रृंगार गौरी और सौभाग्य गौरी के स्थान; पुराने वृक्ष के नीचे शनिदेव की मूर्ति; और पास ही यक्ष भैरव का स्थान। चूने की पुताई, थोड़े पीतल के पल्ले, दीये और घिसा हुआ पत्थर — यह एक चलता हुआ मोहल्ला-मंदिर है, और दिखता भी वैसा ही है।
जो इस परिसर को स्थापत्य की दृष्टि से पढ़ना चाहें, वे धीरे पढ़ें। यहाँ जो कुछ दिखाई देता है, उसका बड़ा हिस्सा किसी अलग शताब्दी का चिह्न लिए हुए है।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
आदि विश्वेश्वर की पूजा काशी की गलियों के किसी छोटे शिवालय जैसी ही सहज और बिना जल्दबाज़ी की है। भक्त स्नान या हाथ-मुँह धोकर आते हैं, लिंग पर गंगाजल चढ़ाते हैं, बिल्वपत्र, थोड़ा चंदन और पुष्प अर्पित करते हैं, दीया जलाते हैं और कुछ क्षण हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। बहुत से लोग पंचाक्षर ॐ नमः शिवाय का जप करते हैं या मन ही मन हर हर महादेव कहते हैं। यहाँ बड़े मंदिरों जैसी टिकट-कतार या बुकिंग की व्यवस्था नहीं है; आप आते हैं, सिर झुकाते हैं, और अगले भक्त के लिए जगह छोड़ देते हैं।
यहाँ के समय बड़े मंदिरों की तरह कहीं केंद्रीय रूप से प्रकाशित नहीं होते। शिवालय मोहल्ले की लय में सुबह-शाम के साधारण दर्शन-समय पर खुलता है, और इसकी देखभाल किसी सरकारी प्रबंध की नहीं, बल्कि इसके अपने मंदिर न्यास की है। किसी विशेष दर्शन की योजना बना रहे यात्री उसी दिन स्थानीय स्तर पर समय पूछ लें, और यह न मान लें कि काशी विश्वनाथ के समय यहाँ भी लागू होंगे।
परिसर का सबसे विशिष्ट अनुष्ठान देवी से जुड़ा है। सौभाग्य गौरी, जिनका स्थान इसी परिसर में है, काशी की नवगौरी यात्रा का तीसरा पड़ाव हैं — वह नौ गौरी-स्थानों का क्रम जिसे परंपरा काशी खंड से जोड़ती है और जो चैत्र नवरात्र में पूरा किया जाता है। चैत्र नवरात्र की तृतीया को भक्त, जिनमें बड़ी संख्या स्त्रियों की होती है और प्रायः पूरे परिवार साथ आते हैं, सौभाग्य गौरी के दर्शन के लिए यहाँ पहुँचते हैं और फूल, चुनरी, चूड़ियाँ, सिंदूर तथा मिष्ठान्न अर्पित कर गृहस्थी के सौभाग्य की कामना करते हैं। वर्ष में यही एक दिन है जब यह गली सचमुच भर जाती है, और यही वह दिन है जब यात्री इस परिसर को उसके सबसे जीवंत रूप में देखता है।
महाशिवरात्रि और सावन के सोमवार यहाँ भी वैसे ही मनाए जाते हैं जैसे काशी के अन्य शिवालयों में — अभिषेक और विशेष अर्पण के साथ — यद्यपि उन दिनों नगर की अधिकांश भीड़ इस गली की ओर नहीं, मुख्य विश्वनाथ मंदिर की ओर जाती है।
परिसर की मस्जिद की अपनी साप्ताहिक लय है। धरोहर-अभिलेख में दर्ज है कि वहाँ शुक्रवार की नमाज़ के लिए अच्छी-ख़ासी संख्या में लोग जुटते हैं। शुक्रवार को मंदिर आने वाले यात्री अपने दर्शन का समय इसे ध्यान में रखकर तय करें, नमाज़ के समय गली खुली रखें, और वहाँ रुककर देखने के बजाय आगे बढ़ जाएँ।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
|---|---|---|
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Prepare for Your Visit
Practical guidance to help you plan your pilgrimage
| Pilgrim Guidance | कैसे पहुँचेंयह परिसर पुराने शहर में गोदौलिया–चौक मार्ग पर बांसफाटक में है, उस गली में जिसे स्थानीय लोग आदि विश्वनाथ गली कहते हैं। यह काशी विश्वनाथ क्षेत्र वाले उसी सघन पुराने शहर के भीतर पड़ता है और वहाँ पैदल ही पहुँचा जाता है; इन गलियों में गाड़ियाँ नहीं जातीं। अधिकांश यात्री ऑटो या ई-रिक्शा से गोदौलिया तक आते हैं और वहाँ से पैदल भीतर जाते हैं; बांसफाटक का नाम लेकर पूछ लें तो कोई भी दुकानदार रास्ता बता देगा। गोदौलिया से वाराणसी जंक्शन थोड़ी ही दूरी पर है, और बाबतपुर स्थित लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डा शहर के इस हिस्से से सड़क मार्ग से लगभग 25–30 किलोमीटर है; दोनों ओर की यात्रा में पुराने शहर के जाम के लिए समय खुले हाथ से रखें। चूँकि यह परिसर किसी मंदिर-परिसर में नहीं, बल्कि एक रिहायशी गली में है, इसलिए यहाँ बड़े मंदिरों जैसे साइनबोर्ड, पार्किंग, क्लोकरूम या जूता-घर की अपेक्षा न रखें। हाथ खाली और सामान कम रखकर आने की योजना बनाएँ। यात्रियों की तैयारी
दर्शन का सर्वोत्तम समयपुराने शहर में पैदल घूमने के लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय सुविधाजनक रहता है, और इस परिसर के लिए तड़के का समय सबसे अच्छा है — गली शांत रहती है, दुकानें खुल ही रही होती हैं, और दर्शन बिना हड़बड़ी के हो जाता है। चैत्र नवरात्र, और विशेषकर उसकी तृतीया, वह अवसर है जब सौभाग्य गौरी के दर्शन के लिए सचमुच भीड़ उमड़ती है; यदि आपका उद्देश्य यही है तो जल्दी पहुँचें और प्रतीक्षा के लिए तैयार रहें। शुक्रवार को मस्जिद की दोपहर वाली नमाज़ के समय का ध्यान रखकर योजना बनाएँ। बड़े समूह में आने से बचें, शोर के साथ पहुँचने से बचें, और ऐसे दिनों से बचें जब पुराना शहर पहले से ही किसी बड़े पर्व के दबाव में हो, जब तक कि वह पर्व ही आपके आने का कारण न हो। |
स्थान
Varanasi, UP
यात्रियों की तस्वीरें
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संपादन इतिहास
अभी तक कोई संशोधन नहीं।
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