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ऋषिकेश

Dehradun, UK

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सत्यापित · पिछली समीक्षा 15 दिन पहले

ऋषिकेश भगवान विष्णु के ही एक नाम — हृषीकेश, अर्थात् इंद्रियों के स्वामी — को धारण करता है। परंपरा कहती है कि गंगा के इसी तट पर रैभ्य ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें इसी रूप में दर्शन दिए थे। गढ़वाल की तलहटी में गंगा के दाहिने तट पर बसा यह तीर्थ घाटों, आश्रमों और पर्वतीय देवालयों का नगर है, और हिमालय के धामों की ओर निकलने वाले यात्रियों का पारंपरिक प्रस्थान-स्थल भी।

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ऋषिकेश सबसे पहले भगवान का नाम है। हृषीकेश — जो इंद्रियों के स्वामी हैं — विष्णु का ही नाम है, और परंपरा मानती है कि गंगा के इसी तट पर रैभ्य ऋषि ने दीर्घ तपस्या की और भगवान ने उन्हें हृषीकेश रूप में दर्शन दिए। तभी से यह स्थान उन्हीं के नाम से जाना जाता है। इसीलिए श्रद्धालु यहाँ किसी रमणीय पर्वतीय नगर की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे तीर्थ की भावना से आते हैं जिसका नाम ही नारायण का स्मरण है।

यह नगर उत्तराखंड के देहरादून ज़िले में गंगा के दाहिने तट पर, समुद्र तल से लगभग 340 मीटर की ऊँचाई पर बसा है। गंगा यहाँ गढ़वाल के पर्वतों से उतर तो चुकी होती हैं, पर मैदान में फैली नहीं होतीं — वह विस्तार यहाँ से लगभग पच्चीस किलोमीटर नीचे हरिद्वार में होता है। यही कारण है कि ऋषिकेश की गंगा भक्तों को पर्वत की गंगा लगती है — शीतल, वेगवती और अपने उद्गम के निकट। नगर का सबसे प्राचीन भक्ति-केंद्र मायाकुंड का त्रिवेणी घाट है, जिसे गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम माना जाता है। यहीं स्नान होता है, यहीं पितरों को जल दिया जाता है, और यहीं संध्या को सारा नगर आरती के लिए एकत्र होता है।

घाट से भक्ति-जीवन कुछ स्पष्ट दिशाओं में फैलता है। कुछ ऊपर राम झूला पार कर स्वर्गाश्रम पहुँचा जाता है, जहाँ परमार्थ निकेतन, गीता भवन और आश्रमों तथा मंदिरों की लंबी पंक्ति गंगा के सम्मुख खड़ी है। उससे भी ऊपर तपोवन में लक्ष्मण झूला है — सन् 1930 का लोहे का झूला-पुल — ठीक उसी स्थान पर, जहाँ लोक-परंपरा के अनुसार लक्ष्मण जी ने जूट की रस्सियों से गंगा पार की थी। और नदी के पार पर्वतों में, लगभग 32 किलोमीटर दूर, गढ़वाल के सर्वाधिक प्रिय शिव-स्थानों में से एक — नीलकंठ महादेव

बहुत बड़ी संख्या में यात्री अपनी चार धाम यात्रा का आरंभ भी ऋषिकेश से ही करते हैं। उत्तराखंड शासन के अनिवार्य यात्रा-पंजीकरण के काउंटर यहाँ प्रत्येक सत्र में लगते हैं, और यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ तथा बद्रीनाथ का मार्ग इसी नगर से आगे बढ़ता है। इसके साथ-साथ ऋषिकेश लगभग एक शताब्दी से साधना का स्थायी घर भी रहा है — स्वामी शिवानंद ने यहाँ सन् 1936 में डिवाइन लाइफ सोसाइटी की स्थापना की, परमार्थ निकेतन की स्थापना 1942 में हुई, और तब से योग, वेदांत और ध्यान के अध्ययन के लिए देश-विदेश से साधक यहाँ आते रहे हैं। नगर में मांस, मछली और मदिरा की बिक्री पर लगा दीर्घकालीन प्रतिबंध इसी स्वभाव का अंग है — यह नगर जान-बूझकर संयम का स्थान बनाकर रखा गया है।

ऋषिकेश
ऋषिकेश, Dehradun, UK

ऋषिकेश का माहात्म्य तीन बातों के मेल से बनता है — विष्णु का नाम, गंगा की उपस्थिति, और इस भूमि का दीर्घकालीन तप-स्थल होना। भक्त मानते हैं कि जिस तीर्थ पर स्वयं भगवान का नाम है, वहाँ निवास और नाम-स्मरण मात्र से भी कल्याण होता है। बहुत से यात्री कोई और विधि आरंभ करने से पहले गंगा-तट पर खड़े होकर केवल 'हृषीकेश' नाम का उच्चारण करते हैं।

ऋषिकेश में गंगा का दर्शन उनके पर्वतीय प्रवाह के रूप में होता है। परंपरा गंगा को उस देवी के रूप में समझती है जो पितरों के उद्धार के लिए अवतरित हुईं, और यही समझ त्रिवेणी घाट पर होने वाले सारे कर्म को आकार देती है। भक्तों की मान्यता है कि इस संगम पर किया गया स्नान संचित पाप का क्षय करता है, और यहाँ पितरों को अर्पित जल उन्हें शांति देता है। यात्री एक दिन रुके या पूरा मास, नगर का भक्ति-जीवन घाट पर ही एकत्र होता है।

ऋषिकेश एक देहरी भी है। हिमालय के धामों की ओर जाने वालों के लिए यह खुले प्रदेश का अंतिम नगर है, इसके आगे मार्ग गढ़वाल की चढ़ाई पकड़ लेता है। इसीलिए बहुत से यात्री यहीं स्नान करते हैं, किसी मंदिर में अर्पण करते हैं और यात्रा का संकल्प लेकर आगे बढ़ते हैं। भक्ति की दृष्टि में यात्रा तब आरंभ नहीं होती जब गाड़ी चलती है, बल्कि तब होती है जब संकल्प बोला जाता है — और अनेक परिवारों में पीढ़ियों से यह संकल्प ऋषिकेश में ही लिया जाता रहा है।

अंततः यह भूमि तपोभूमि है। इन तटों और ऊपर के पर्वतों ने बहुत लंबे समय से तपस्वियों को आश्रय दिया है, और यह परंपरा टूटी नहीं है — यहाँ के आश्रमों में आज भी हवन, जप, सत्संग और शास्त्र-अध्ययन का वही दैनिक क्रम चलता है जिसे किसी भी युग का साधक पहचान लेगा। बीसवीं शताब्दी में योग का नाम ऋषिकेश से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़ा — भक्ति की दृष्टि से यह किसी बहुत पुरानी बात का बाद वाला अध्याय भर है।

कथा और लोक-विश्वास

गंगा के इस तट से अनेक कथाएँ जुड़ी हैं। उन्हें यहाँ वैसे ही कहा जा रहा है जैसे परंपरा कहती है।

रैभ्य ऋषि और नगर का नाम। परंपरा कहती है कि रैभ्य ऋषि ने इसी तट पर कठोर तपस्या की, और भगवान विष्णु ने उन्हें हृषीकेश — इंद्रियों के स्वामी — के रूप में दर्शन दिए। तभी से यह स्थान भगवान के उसी नाम से जाना गया, और आज तक वही नाम धारण किए हुए है।

लक्ष्मण जी का पार जाना। लोक-परंपरा मानती है कि श्रीराम के अनुज लक्ष्मण जी ने तपोवन में जूट की रस्सियों के सहारे गंगा पार की थी और इसी तट पर तप किया था। उसी स्थान पर बना झूला-पुल उन्हीं की स्मृति में लक्ष्मण झूला कहलाता है, और दोनों छोरों पर बसे छोटे-छोटे मंदिर — लक्ष्मण मंदिर, त्र्यंबकेश्वर और रघुनाथ जी का मंदिर — इसी भक्ति-स्मृति के अंग हैं।

नीलकंठ और हलाहल। पुराण कहते हैं कि समुद्र मंथन के समय अमृत से पहले हलाहल विष निकला, और सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उसे पी लिया तथा कंठ में ही धारण कर लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया। भक्तों की मान्यता है कि यह घटना उसी स्थान पर हुई जिसे आज नीलकंठ महादेव कहा जाता है — ऋषिकेश के ऊपर मणिकूट की पहाड़ियों में — और उसके पश्चात् भगवान वहीं दीर्घकाल तक ध्यानस्थ रहे। मंदिर के शिखर पर समुद्र मंथन के दृश्य उकेरे हुए हैं।

त्रिवेणी घाट। तीन नदियों के संगम के अतिरिक्त, लोक-कथन इस घाट को श्रीराम से भी जोड़ता है, जो रावण-युद्ध के बाद यहाँ प्रायश्चित्त के लिए आए बताए जाते हैं, और श्रीकृष्ण से भी। इन्हीं संबंधों के बल पर यह घाट ऋषिकेश में पितृ-कर्म के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान माना जाता रहा है।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

ऋषिकेश का इतिहास शासन की नहीं, उपासना की निरंतरता का इतिहास है। इसका सबसे पुराना अटूट सूत्र मायाकुंड स्थित भरत मंदिर की नित्य पूजा है, जो हृषीकेश नारायण को समर्पित है — अर्थात् विष्णु, उसी नाम से जो नगर धारण करता है। मंदिर का अपना विवरण इस देवालय को आदि शंकराचार्य से भी प्राचीन बताता है और इसके प्रमाण में पालि-प्राकृत का एक पुराना लेख तथा खुदाई में मिली ईंटें और मिट्टी के बर्तन गिनाता है; साथ ही यह भी अंकित करता है कि नवीं शताब्दी के आरंभ में जीर्णोद्धार के समय आदि शंकराचार्य ने गर्भगृह में श्रीयंत्र की स्थापना की थी। पर्यटन मंत्रालय का विवरण केदारखंड के आधार पर मुख्य संरचना का श्रेय शंकराचार्य को देता है और यह भी बताता है कि सन् 1398 के आक्रमण के पश्चात् मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ — बाहरी संरचना का जीर्णोद्धार सन् 1832 में नाभा के महाराजा यशवंत सिंह ने कराया। स्थल के उत्खनन में एक बुद्ध-प्रतिमा भी मिली है, जिससे लगता है कि किसी पूर्व युग में यह भूमि विहार-उपयोग में रही होगी। इन सब परिवर्तनों के बीच काले शालिग्राम के एकाश्म से गढ़ी हृषीकेश नारायण की पाँच फुट ऊँची प्रतिमा ही उपासना का केंद्र बनी रही।

पुलों की कथा वस्तुतः इस बात की कथा है कि यात्री दूसरे तट तक कैसे पहुँचते रहे। परंपरा तपोवन में रस्सियों के पुल को स्मरण करती है; वहाँ 284 फुट का एक पुल तब तक रहा जब तक अक्टूबर 1924 की भीषण बाढ़ उसे बहा नहीं ले गई। उसके स्थान पर बना लोहे का झूला-पुल — लक्ष्मण झूला, 450 फुट का विस्तार, छह फुट चौड़ा मार्ग, ग्रीष्म-जल-स्तर से लगभग 59 फुट ऊँचा — सन् 1927 से 1929 के बीच बना और 11 अप्रैल 1930 को आवागमन के लिए खोला गया। लगभग नौ दशकों तक उसने यात्रियों का भार उठाया। 12 जुलाई 2019 को राज्य प्रशासन ने उसे बंद कर दिया, क्योंकि जाँच में उसके कई अंग जर्जर पाए गए और अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश ने कहा कि अब उस पर पैदल आवागमन की भी अनुमति नहीं दी जा सकती। वह तब से खुला नहीं है। नीचे की ओर राम झूला — लगभग 230 मीटर लंबा लोहे का झूला-पुल, जो सन् 1986 में शिवानंदनगर और स्वर्गाश्रम के बीच बना — आज यात्रियों का अधिकांश भार वहन करता है। लक्ष्मण झूला की जगह लेने के लिए काँच के फ़र्श वाला बजरंग सेतु उसी स्थान पर बनाया गया है; सन् 2026 के पूर्वार्ध तक उसका तकनीकी परीक्षण पूरा हो चुका था, पर विधिवत उद्घाटन नहीं हुआ था, और टूटे काँच के पटल बदले जाने तक काँच वाले मार्ग पर आवाजाही सीमित रखी गई थी।

बीसवीं शताब्दी ने ऋषिकेश को उसकी आश्रम-पट्टी दी। स्वामी शिवानंद ने गंगा के दाहिने तट पर निवास किया और नगर से लगभग तीन किलोमीटर ऊपर शिवानंदनगर में सन् 1936 में डिवाइन लाइफ सोसाइटी की स्थापना की — आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार तथा चिकित्सालयों, औषधालयों, विद्यालयों और प्रकाशनों के माध्यम से दीन-दुखियों की सेवा के संकल्प के साथ। परमार्थ निकेतन की स्थापना सन् 1942 में पूज्य स्वामी शुकदेवानंद जी ने की, जो आगे चलकर एक हज़ार से अधिक कक्षों वाला ऋषिकेश का सबसे बड़ा आश्रम बना। साठ के दशक में महर्षि महेश योगी ने नदी के ऊपर वन में चौरासी कुटिया नामक ध्यान-अकादमी स्थापित की, और सन् 1968 में बीटल्स के वहाँ प्रवास ने नगर को वह अंतरराष्ट्रीय पहचान दी जो आज तक बनी हुई है। सन् 1999 से प्रतिवर्ष मार्च में परमार्थ निकेतन में अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव आयोजित होता है, जिसे अब पर्यटन मंत्रालय का सहयोग भी प्राप्त है।

नगर का नागरिक स्वभाव उसके धार्मिक स्वभाव के पीछे-पीछे चला है। ऋषिकेश में मांस और मछली की बिक्री सन् 1956 से प्रतिबंधित है, और मदिरा पर प्रतिबंध सम्पूर्ण नगर निगम क्षेत्र में लागू है — वीरभद्र मंदिर के दो किलोमीटर के दायरे में यह प्रतिबंध और भी स्पष्ट रूप से लागू किया गया है।

ऋषिकेश — historic view

वास्तुकला

ऋषिकेश में कोई एक ऐसा विशाल मंदिर नहीं है जो सब कुछ अपने में समेट ले। यहाँ का धार्मिक स्थापत्य बिखरा हुआ है — पुराने नगर में विष्णु का देवालय, पहाड़ पर शिव का स्थान, जल तक उतरते सीढ़ीदार घाट, और दोनों तटों को जोड़ने के लिए बने झूला-पुल।

भरत मंदिर भारी पत्थर से बना है। इसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी छत है — तीन-तीन की पंक्तियों में खड़े नौ गुंबद — और शिखर का सबसे ऊपरी भाग एक ही चट्टान का बताया जाता है, जिसका भार लगभग 125 टन है। भीतर हृषीकेश नारायण की पाँच फुट ऊँची प्रतिमा काले शालिग्राम के एक ही खंड से गढ़ी गई है — उसी पवित्र शिला से, जिससे बद्रीनाथ और तिरुपति की प्रतिमाएँ बनी मानी जाती हैं।

नीलकंठ महादेव, मणिकूट की पहाड़ियों में लगभग 1,330 मीटर की ऊँचाई पर, गढ़वाल के लिए असामान्य है। इसका शिखर क्रमशः घटती हुई मंज़िलों में उठता है — जो आसपास के पर्वतीय पाषाण-शिखरों की अपेक्षा दक्षिण भारतीय गोपुर के अधिक निकट जान पड़ता है — और इसकी सतहों पर समुद्र मंथन के दृश्य उकेरे गए हैं, उसी मंथन के, जिसकी स्मृति यह स्थान संजोए हुए है। मंदिर के पास एक प्राकृतिक जलस्रोत है, जहाँ दर्शन से पूर्व श्रद्धालु स्नान करते हैं। यह देवालय पंकजा और मधुमती धाराओं के संगम के निकट, मणिकूट, ब्रह्मकूट और विष्णुकूट की घाटियों के बीच स्थित है।

घाट जान-बूझकर सादे हैं — चौड़ी पत्थर की सीढ़ियाँ वेगवती जलधारा तक उतरती हैं, स्नान-स्थलों पर ज़ंजीरें और रेलिंग लगी हैं, और खुले चबूतरे हैं जहाँ संध्या-आरती होती है तथा दिन भर पितृ-कर्म संपन्न किए जाते हैं। परमार्थ निकेतन का अपना घाट सीधे गंगा में उतरता है, जहाँ उथले जल में शिव की चौदह फुट ऊँची प्रतिमा विराजमान है।

झूला-पुलों को यहाँ धार्मिक स्थापत्य में ही गिना जाना चाहिए, क्योंकि वे भक्ति का भार उठाने के लिए बने थे। लक्ष्मण झूला का पतला लोहे का विस्तार और छह फुट चौड़ा मार्ग पैदल यात्रियों के लिए ही बनाया गया था; राम झूला, लगभग 230 मीटर लंबा, सन् 1986 में उसी प्रयोजन से बना। नदी के ऊपर वन में चौरासी कुटिया की पंक्तियाँ हैं — एकांत साधना के लिए बनी छोटी-छोटी गुंबददार पाषाण-कुटियाँ, संख्या में चौरासी, उन चौरासी लाख योनियों के प्रतीक जिन्हें परंपरा गिनती है।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

ऋषिकेश की उपासना किसी एक गर्भगृह से कहीं अधिक गंगा के चारों ओर व्यवस्थित है। ऋतु और जल-स्तर के अनुसार समय बदलता रहता है, इसलिए यात्री उस दिन का क्रम घाट समिति, आश्रम या मंदिर से पूछकर ही निश्चित करें।

स्नान। अधिकांश यात्रियों का पहला कर्म गंगा-स्नान होता है, प्रायः त्रिवेणी घाट पर। धारा तेज़ है और जल शीतल; श्रद्धालु ज़ंजीर और रेलिंग वाले भाग में ही स्नान करें, उससे आगे न बढ़ें।

पितृ-कर्म। त्रिवेणी घाट तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध के लिए मान्य स्थान है, और मुंडन के लिए भी। प्रातःकाल घाट पर पुरोहित बैठते हैं। संकल्प और दक्षिणा की बात कर्म आरंभ होने से पहले स्पष्ट रूप से तय कर लेना उचित रहता है।

गंगा आरती। संध्या को दो आरतियाँ सारे नगर को खींच लेती हैं। त्रिवेणी घाट पर आरती गंगा सेवा समिति द्वारा संपन्न होती है — गंगा-स्तुति, एक साथ उठते दीप, और जल पर तैरते पत्तों के दोनों में रखे दीये। प्रचलित विवरणों के अनुसार यह संध्या छह बजे के आसपास आरंभ होकर लगभग पौन घंटे चलती है, और आरती में सम्मिलित होकर अर्पण करने के इच्छुक श्रद्धालुओं से एक नाममात्र का सहयोग लिया जाता है, जो घाट की व्यवस्था में लगता है। राम झूला से लगभग पाँच सौ मीटर दूर परमार्थ निकेतन में आरती सूर्यास्त के समय आश्रम के वेदपाठी विद्यार्थियों द्वारा हवन, मंत्र और भजन के साथ की जाती है। यह सबके लिए खुली है — देश, जाति या संप्रदाय का कोई भेद नहीं।

नीलकंठ महादेव में। भक्त शिवलिंग पर बेलपत्र, नारियल, पुष्प, दूध, मधु, फल और जल अर्पित करते हैं, और बहुत से लोग पहले मंदिर के पास के जलस्रोत में स्नान करते हैं। दर्शन प्रायः प्रातः से संध्या तक उपलब्ध रहता है। श्रावण मास में तथा दोनों शिवरात्रियों पर पंक्ति बहुत लंबी हो जाती है और पहाड़ी मार्ग धीमा।

यात्रा से पूर्व संकल्प। धामों की ओर जाने वाले यात्री प्रायः ऋषिकेश में स्नान कर, किसी मंदिर में अर्पण कर और संकल्प लेकर ही आगे प्रस्थान करते हैं।

आश्रमों में। शिवानंदनगर और स्वर्गाश्रम की आश्रम-पट्टी में प्रातःकालीन हवन, जप, सत्संग और शास्त्र-प्रवचन दिन भर चलते रहते हैं। जो शांत भाव से और मर्यादा का पालन करते हुए आते हैं, उनके लिए अधिकांश आश्रम खुले हैं।

उत्सव एवं पर्व

उत्सवकबभीड़
महाशिवरात्रिअत्यधिक भीड़, विशेषकर नीलकंठ महादेव में
श्रावण मास और कांवड़ यात्राअत्यंत अधिक; मार्ग, पुल और पूरा नगर प्रभावित
चार धाम यात्रा-कालकपाट खुलने के साथ ही अधिक
अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सवआश्रम-पट्टी में अधिक
भरत मंदिर में अक्षय तृतीयापुराने नगर में मध्यम से अधिक

महाशिवरात्रि: भक्तों की मान्यता है कि नीलकंठ वही स्थान है जहाँ भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकला हलाहल पान किया था। इसीलिए यहाँ शिवरात्रि विशेष भाव और तीव्रता के साथ मनाई जाती है।

श्रावण मास और कांवड़ यात्रा: श्रावण शिव का मास है। नीलकंठ की श्रावण शिवरात्रि और कांवड़ की यात्राएँ ऋषिकेश के वर्ष का सर्वाधिक भक्तिमय काल हैं।

चार धाम यात्रा-काल: ऋषिकेश हिमालयी धामों की ओर प्रस्थान का पारंपरिक स्थल है। अनेक यात्री यहीं स्नान कर, मंदिर में अर्पण कर और संकल्प लेकर आगे चढ़ाई आरंभ करते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय योग महोत्सव: यह महोत्सव ऋषिकेश तथा योग, ध्यान और शास्त्र-अध्ययन की परंपरा के बहुत पुराने संबंध का आधुनिक रूप है।

भरत मंदिर में अक्षय तृतीया: अक्षय तृतीया वह तिथि मानी जाती है जिसका पुण्य क्षीण नहीं होता। नगर के सबसे प्राचीन मंदिर में यह दिन उन्हीं भगवान की परिक्रमा से मनाया जाता है जिनका नाम स्वयं यह नगर धारण करता है।

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नगर की बनावट

ऋषिकेश एक स्थान नहीं, गंगा के किनारे कई किलोमीटर में फैली बस्तियों की एक शृंखला है। इस क्रम को जान लेने से बहुत भाग-दौड़ बच जाती है।

  • मायाकुंड और त्रिवेणी घाट — पुराना नगर और उसका मुख्य घाट, पास ही भरत मंदिर। स्नान, पितृ-कर्म और संध्या-आरती सब यहीं होते हैं।
  • मुनि की रेती और शिवानंदनगर — दाहिने तट पर नगर से लगभग तीन किलोमीटर ऊपर; शिवानंद आश्रम और डिवाइन लाइफ सोसाइटी।
  • राम झूला और स्वर्गाश्रम — सन् 1986 का पुल बाएँ तट पर ले जाता है, जहाँ परमार्थ निकेतन, गीता भवन और आश्रमों-मंदिरों की लंबी पंक्ति गंगा के सम्मुख है। परमार्थ निकेतन पुल से लगभग पाँच सौ मीटर दूर है।
  • तपोवन और जोंक — नगर से लगभग पाँच किलोमीटर उत्तर-पूर्व, लक्ष्मण झूला के दोनों छोरों पर; आसपास लक्ष्मण मंदिर, त्र्यंबकेश्वर और रघुनाथ जी के मंदिर।
  • नीलकंठ महादेव — नदी पार पहाड़ों में लगभग 32 किलोमीटर दूर; स्वर्गाश्रम की ओर से सँकरे घुमावदार मार्ग द्वारा, अथवा उसी तट से वन-मार्ग द्वारा पैदल।

लक्ष्मण झूला के विषय में ध्यान दें। यह पुल 12 जुलाई 2019 से बंद है और इस पर से आर-पार नहीं जाया जा सकता। इसे देखा जा सकता है, और दोनों छोरों के मंदिर, गलियाँ तथा बाज़ार पहले की तरह खुले हैं, पर पुल पार करना संभव नहीं है। इसकी जगह लेने के लिए काँच के फ़र्श वाला बजरंग सेतु उसी स्थान पर बनाया गया है, पर सन् 2026 के पूर्वार्ध तक उसका विधिवत उद्घाटन नहीं हुआ था और टूटे पटल बदले जाने तक काँच वाले मार्ग पर आवाजाही सीमित थी। जिस दिन आप पहुँचें, उस दिन वह खुला है या नहीं — यह स्थानीय स्तर पर पूछ लें, पहले से पार जाने की योजना न बनाएँ। पैदल आवागमन के लिए राम झूला भरोसे का पुल है।

यदि आपकी चार धाम यात्रा ऋषिकेश से आरंभ हो रही है

उत्तराखंड शासन की नीति के अनुसार यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के लिए तथा हेमकुंड साहिब के लिए पंजीकरण अनिवार्य है। यात्रा से पूर्व राज्य के पोर्टल registrationandtouristcare.uk.gov.in पर अथवा 'टूरिस्ट केयर उत्तराखंड' ऐप से पंजीकरण करा लें; सत्र के दौरान ऋषिकेश, हरिद्वार और विकासनगर में ऑफ़लाइन काउंटर भी लगते हैं। पंजीकरण के बाद क्यूआर कोड सहित यात्रा-पत्र मिलता है, जिसे साथ रखना और जाँच-चौकियों पर दिखाना आवश्यक है; प्रत्येक धाम पर पुनः सत्यापन होता है। यात्रियों के साथ-साथ वाहनों का पंजीकरण भी अनिवार्य है।

यात्रा-काल गरम महीनों में चलता है — कपाट अप्रैल में खुलते हैं और नवंबर में बंद होते हैं, और तिथियाँ प्रतिवर्ष नए सिरे से घोषित होती हैं; उदाहरण के लिए, सन् 2026 के सत्र में केदारनाथ के कपाट 22 अप्रैल को खोले गए। तिथियाँ मान लेने के बजाय घोषित तिथियों के अनुसार ही योजना बनाएँ, और पंजीकरण, स्नान तथा विश्राम के लिए ऋषिकेश में एक दिन का अवकाश अवश्य रखें।

तैयारी और उपयुक्त समय

  • अक्टूबर से मार्च तक मौसम सुखद और स्वच्छ रहता है। पहाड़ ठंडे होते हैं, इसलिए गरम वस्त्र साथ रखें — विशेषकर नीलकंठ के लिए और घाट पर प्रातःकाल के लिए।
  • वर्षा-काल में, लगभग जुलाई से सितंबर तक, भारी वर्षा होती है, पहाड़ी मार्ग फिसलन भरे हो जाते हैं और नीलकंठ मार्ग पर भूस्खलन की आशंका रहती है। श्रावण इसी अवधि में पड़ता है और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी है, पर यात्रा की योजना सावधानी से बनानी होती है।
  • यहाँ की गंगा पर्वतीय नदी हैं — ग्रीष्म में भी वेगवती और शीतल। स्नान केवल रेलिंग वाले घाट-भाग में करें और बच्चों को हाथ की पहुँच में रखें।
  • नीलकंठ के लिए नक़द साथ रखें — पहाड़ पर मोबाइल संकेत कमज़ोर रहता है और डिजिटल भुगतान भरोसेमंद नहीं।
  • नगर में मांस, मछली और मदिरा की बिक्री प्रतिबंधित है। कृपया इन्हें साथ लेकर न आएँ।
  • आश्रम का निवास सादा और नियमबद्ध होता है — भोजन का निश्चित समय, मौन के घंटे, द्वार बंद होने का समय। इनकी बुकिंग पहले से करा लेना ज़रूरी है।
  • नक़्शे पर दूरियाँ कम दिखती हैं, पर बीच में पुल, सीढ़ियाँ और सँकरी गलियाँ पड़ती हैं। वृद्धजनों के साथ यात्रा कर रहे हों तो घाट, आश्रम-पट्टी और नीलकंठ को अलग-अलग दिनों में रखें।

स्थान

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सामुदायिक सुधार

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