सिंधिया घाट काशी-तट के उत्तरी हिस्से में है, मणिकर्णिका से लगभग पाँच सौ मीटर आगे — उस महाश्मशान के पड़ोस में, जहाँ रात-दिन अंतिम संस्कार होता रहता है। धरोहर-विवरणों के अनुसार पुराने बनारस में इस हिस्से का नाम कुछ और था: वीरेश्वर घाट, ऊपर की गली में पूजित वीरेश्वर के नाम पर। सिंधिया नाम बाद में आया, ग्वालियर के मराठा घराने के साथ, जिसके संरक्षण में यहाँ पक्की सीढ़ियाँ बनीं।
इस घाट का भक्ति-भार जल-किनारे से ज़्यादा उसके पीछे बसे मुहल्ले में है। सीढ़ियों से ऊपर चढ़ती गलियाँ बनारस में सिद्ध क्षेत्र कहलाती हैं — वह भूमि जहाँ साधना फल देती है। छोटे-छोटे देवालय इतनी सटी हुई गलियों में बैठे हैं कि यात्री लगभग कंधे बचाकर निकलता है। परंपरा कहती है कि अग्निदेव का जन्म इसी क्षेत्र में हुआ था। जल से लौटकर श्रद्धालु वीरेश्वर के पास जाते हैं — नाम का भाव है वीरों के ईश्वर — और बनारसी परिवार पीढ़ियों से पुत्र-प्राप्ति की कामना लेकर इस देहरी पर आते रहे हैं।
घाट अपनी एक और बात के लिए जाना जाता है — उस बात के लिए जो गंगा ने धीरे-धीरे इसके साथ की। उन्नीसवीं सदी में उठाई गई पत्थर की छतें अपनी ही नींव से भारी निकलीं, और चिनाई तभी से नदी में बैठती चली गई। धरोहर-विवरणों में दर्ज है कि कुल मिलाकर दस-बारह फुट जल में समा चुका है, और सीढ़ी-दर-सीढ़ी यह डूबना धीमी गति से लगातार चलता रहा है। आज जल-रेखा पर एक छोटा शिव-मंदिर टेढ़ा खड़ा है, जिसका निचला हिस्सा साल के अधिकांश समय पानी में रहता है। श्रद्धालु अब भी सीढ़ियों से उसे अर्घ्य देते हैं।
इतना सब होने पर भी सिंधिया कोई स्मारक नहीं, एक कार्यरत स्नान-घाट है। सूर्योदय से पहले यह मध्य-तट के सबसे शांत हिस्सों में गिना जाता है — बनारसी यहाँ स्नान के लिए आते हैं, जप के लिए आते हैं, और उस लंबी बैठक के लिए आते हैं जिसके वास्ते ये नीची पत्थर की मढ़ियाँ बनाई ही गई थीं।

सिंधिया काशी की शास्त्रीय पंचतीर्थ-यात्रा के पाँच घाटों में नहीं गिना जाता। इसकी पवित्रता दूसरी तरह की है: यह सिद्ध क्षेत्र का जल-द्वार है, और महाश्मशान इसकी दृष्टि-सीमा में है। जो यहाँ स्नान करता है, वह भक्ति-भाव में उस भूमि की देहरी पर स्नान करता है जहाँ काशी का मोक्ष-वचन सबसे प्रत्यक्ष रूप से घटित होता है।
सिद्ध क्षेत्र और अग्निदेव का जन्म
इन सीढ़ियों के ऊपर बसे गली-मुहल्ले को बनारस सिद्ध क्षेत्र कहता है — वह क्षेत्र जहाँ साधना सिद्ध होती है। लोक-मान्यता है कि अग्निदेव, जो पृथ्वी के हवन-कुंड से देवताओं तक हर आहुति पहुँचाते हैं, यहीं प्रकट हुए। यह मान्यता किसी एक प्रसिद्ध मंदिर में नहीं, बल्कि मुहल्ले की स्मृति और उसके छोटे-छोटे देवालयों में सुरक्षित है — और इसे उसी भाव से लेना चाहिए जिस भाव से बनारस लेता है: पाँव तले की भूमि के बारे में एक पुरानी श्रद्धा, न कि कोई प्रमाणित घटना।
देवालय स्वयं दर्ज हैं, और बहुत हैं। इस हिस्से का धरोहर-दस्तावेज़ीकरण उत्तरी छोर पर ऊँची सीढ़ियों के नीचे यमेश्वर लिंग और चढ़ती सीढ़ियों के एक ताक़ में दक्षिणमुखी यमादित्य की प्रतिमा दर्ज करता है — दोनों परंपरा में स्वयं यम के स्थापित माने जाते हैं, और दोनों के लिए काशी खंड (51.108) का हवाला दिया जाता है। इनसे ऊपर वही दस्तावेज़ीकरण वशिष्ठ, वामदेव और जनक से जुड़े लिंगों का सप्तर्षि देवालय, उसके द्वार पर चिंतामणि विनायक, वैकुंठ माधव तथा वीर माधव के विष्णु-देवालय, और हरिश्चंद्रेश्वर लिंग बताता है। इस तरह के शास्त्रीय हवाले धरोहर-अभिलेख देता है; यहाँ श्लोक स्वयं उद्धृत नहीं किए गए।
वीरेश्वर और संतान की कामना
जिस देवालय से घाट को उसका पुराना नाम मिला, वह वीरेश्वर हैं — धरोहर-अभिलेख में आत्मवीरेश्वर — शिव का वह रूप जिसे वीरों का ईश्वर माना जाता है, और जिसे वहाँ स्वयंभू लिंग के रूप में सराहा गया है। भक्तों की धारणा है कि यहाँ की गई उपासना पुत्र-प्राप्ति से फलित होती है, और नि:संतान दंपती पीढ़ियों से यही संकल्प लेकर इस देहरी तक आते रहे हैं। प्रार्थना यहाँ बिना आडंबर के, चुपचाप की जाती है, और देवालय आज भी छोटा ही है — यह याद दिलाता हुआ कि काशी में किसी स्थान का भार उसकी भव्यता से नहीं, इस बात से तय होता है कि लोगों ने उससे क्या-क्या माँगा है।
महाश्मशान के पड़ोस में
मणिकर्णिका यहाँ से थोड़ी दूर, ऊपर की ओर है। दिन भर शवयात्राएँ इन गलियों और घाट-किनारे से होकर श्मशान की ओर जाती हैं, और शोकाकुल परिवार अंतिम संस्कार के बाद का स्नान अकसर सिंधिया की सीढ़ियों पर करते हैं। भक्त मानते हैं कि काशी में जिसका अंतिम संस्कार होता है, उसे स्वयं शिव मोक्ष देते हैं। उस भूमि के इतने पास होने के कारण सिंधिया में भी वही गंभीरता उतर आती है: यह स्नान और मौन का स्थान है, ऊँची आवाज़ में ठहरने का नहीं।
इतिहास
घाट की भक्ति-परंपरा उसके वर्तमान पत्थर से पुरानी है। धरोहर-विवरण संस्कृत रचना गीर्वाणपदमंजरी का हवाला देते हुए बताते हैं कि इस हिस्से का पुराना नाम ऊपर के देवालय के कारण वीरेश्वर घाट था — अर्थात सिंधिया नाम मिलने से पहले भी इस तट का अपना एक भक्ति-नाम था।
आज जो पक्का घाट खड़ा है, वह ग्वालियर के सिंधिया घराने की देन है। धरोहर-अभिलेख संरक्षक के रूप में महारानी बैजा बाई सिंधिया का नाम लेते हैं — दौलतराव सिंधिया की विधवा, जो कुछ वर्षों तक ग्वालियर राज्य की शासिका रहीं। निर्माण का वर्ष विवरणों में 1830 और 1835 दोनों मिलता है, इसलिए दशक पर भरोसा करना अधिक उचित है, वर्ष पर नहीं। इन्हीं संरक्षक को काशी विश्वनाथ के निकट ज्ञानवापी कूप के चारों ओर बने पत्थर के स्तंभ-मंडप का श्रेय भी दिया जाता है — यह याद दिलाता हुआ कि उन्नीसवीं सदी की काशी का कितना दृश्य रूप उन मराठा राजघरानों ने गढ़ा, जिनका राज कहीं और था पर जिनके लिए पुण्य की भूमि काशी ही थी।
निर्माण विशाल था, और उसका भार स्वयं उसकी समस्या बन गया। छतें नरम तटवर्ती भूमि में बैठने लगीं, और धरोहर-विवरण इस घाट को धँसा हुआ बताते हैं — कुल दस-बारह फुट डूब चुका, और सीढ़ियाँ धीरे-धीरे और भी। इससे पूजा कभी नहीं रुकी। घाट की मरम्मत होती रही, जल-किनारे का देवालय टेढ़ा होते हुए भी अर्घ्य लेता रहा, और सीढ़ियाँ रोज़ के काम में बनी रहीं। सिंधिया घाट का इतिहास खंडहर होने का नहीं — एक ऐसे तट का है जो बरता जाता रहा, जबकि नदी उसे चुपचाप वापस लेती रही।

वास्तुकला
सिंधिया घाट की सबसे पहचानी विशेषता उसकी नीची पत्थर-मढ़ियों की सीढ़ीदार क़तारें हैं — तीन पंक्तियों में, हर मढ़ी की अपनी छोटी-सी सीढ़ी। ये बैठने और सुस्ताने के लिए ही बनाई गई थीं, और आज भी उसी काम आती हैं: यात्री इनमें धूप काटते हैं और स्नान के बाद लोग इन्हीं में बैठते हैं। पत्थर वही बलुआ पत्थर है जो बनारस के तट पर सर्वत्र है, नंगे पाँवों और गंगाजल से घिसकर चिकना।
घाट की अवस्था भी उसकी वास्तु-कथा का हिस्सा है। उन्नीसवीं सदी की छतें अपनी नींव से भारी पड़ीं, इसलिए चिनाई की पूरी-पूरी पंक्तियाँ जल-रेखा के नीचे चली गईं, और जल-किनारे का छोटा शिव-मंदिर स्पष्ट रूप से एक ओर झुका दिखता है। दक्षिणी मढ़ी के पास खड़ा एक और मंदिर जीर्ण अवस्था में है। यह सब पर्यटक-दृष्टि का रमणीय खंडहर नहीं है — यह एक कार्यरत तट है, जो हर बरसात अपने नीचे की मिट्टी काटती नदी से धीमी बातचीत करता रहता है।
प्रसिद्ध झुके मंदिर के विषय में एक सावधानी आवश्यक है: जिस रत्नेश्वर महादेव की तस्वीर सबसे अधिक खींची जाती है और जिसका गर्भगृह वर्ष के अधिकांश समय जल में डूबा रहता है, उसे मानक सन्दर्भ-विवरण मणिकर्णिका घाट पर बताते हैं, यहाँ से ऊपर की ओर — यद्यपि बनारस के कुछ धरोहर-पृष्ठ इसी हिस्से के आधे डूबे मंदिर को भी उसी नाम से लिखते हैं, इसलिए दोनों को हमेशा अलग नहीं रखा जाता। उसका संरक्षक हर विवरण में विवादित है: राजस्व अभिलेख 1825-1830 की ओर संकेत करते हैं, मंदिर के पुजारी राजा मान सिंह के एक सेवक की कथा कहते हैं जिसने अपनी माँ रत्ना बाई के लिए इसे बनवाया, और कुछ विवरण ग्वालियर की बैजा बाई या अमेठी घराने को श्रेय देते हैं। ईमानदार स्थिति यही है कि यह श्रेय अब तक तय नहीं है।
अनुष्ठान एवं परंपराएँ
सिंधिया सबसे पहले एक स्नान-घाट है। सूर्योदय से बहुत पहले बनारसी परिवार और तीर्थयात्री यहाँ स्नान, संकल्प और पितरों के तर्पण के लिए उतरते हैं। स्थानीय लोगों में यह घाट भोर के समय मध्य-तट का एक शांत हिस्सा माना जाता है, और बहुत से लोग स्नान के बाद मढ़ियों की सीढ़ियों पर बैठकर जप और ध्यान के लिए ही यहाँ आते हैं।
झुके शिव-देवालय की पूजा जल-स्तर के अनुसार चलती है; जब नदी उतरती है और चबूतरा खुलता है तो पुष्प, बिल्वपत्र और गंगाजल सीधे अर्पित किए जाते हैं, और जब जल चढ़ा हो तो ऊपर की सीढ़ियों से ही अर्घ्य दिया जाता है। कार्तिक में दीपदान यहाँ भी वैसे ही होता है जैसे पूरे तट पर।
वीरेश्वर के दर्शन के इच्छुक श्रद्धालु सीढ़ियों से ऊपर सिद्ध क्षेत्र की गलियों में चढ़ते हैं। वहाँ के देवालय छोटे हैं, प्राय: परिवारों द्वारा सँभाले जाते हैं, और उनका कोई निश्चित सार्वजनिक समय नहीं होता; आरती का समय मान लेने के बजाय वहीं पूछ लेना बेहतर है।
दिन भर इस हिस्से से शवयात्राएँ मणिकर्णिका की ओर जाती रहती हैं। स्नान और पूजा उनके बीच चलती रहती है; यहाँ की स्वीकृत रीति सीधी-सी है — रास्ता दें, मौन हो जाएँ, और उन्हें जाने दें।
उत्सव एवं पर्व
| उत्सव | कब | भीड़ |
|---|---|---|
| दà¥à¤µ दà¥à¤ªà¤¾à¤µà¤²à¥ | — | बहà¥à¤¤ ठधिठâ पà¥à¤°à¤¾ तठà¤à¤° à¤à¤¾à¤¤à¤¾ हà¥; सà¤à¤§à¥à¤¯à¤¾ सॠà¤à¤¾à¤«à¤¼à¥ पहलॠपहà¥à¤à¤à¥à¤ |
| à¤à¤¾à¤°à¥à¤¤à¤¿à¤ पà¥à¤°à¥à¤£à¤¿à¤®à¤¾ सà¥à¤¨à¤¾à¤¨ | — | बहà¥à¤¤ ठधिठ|
| à¤à¤à¤à¤¾ दशहरा | — | ठधिठ|
| महाशिवरातà¥à¤°à¤¿ | — | ठधिठ|
| मà¤à¤° सà¤à¤à¥à¤°à¤¾à¤à¤¤à¤¿ | — | ठधिठ|
| नितà¥à¤¯ à¤à¤à¤à¤¾ सà¥à¤¨à¤¾à¤¨ | — | मधà¥à¤¯à¤®; सà¥à¤°à¥à¤¯à¥à¤¦à¤¯ सॠपहलॠहलà¥à¤à¤¾ |
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| Pilgrim Guidance | कैसे पहुँचेंसिंधिया घाट-श्रृंखला के उत्तरी, पुराने हिस्से में है। अधिकांश यात्री काशी विश्वनाथ से मणिकर्णिका होते हुए गलियों से पैदल आते हैं, या दशाश्वमेध से तट के साथ-साथ उत्तर की ओर चलते हैं — भीड़ के अनुसार बीस से तीस मिनट। गाड़ी बाहरी गलियों तक ही आती है; अंतिम हिस्सा हमेशा पैदल है। दूसरा रास्ता दशाश्वमेध या अस्सी से नाव का है, और जल में डूबे देवालय तथा मढ़ियों की क़तारों को सबसे साफ़ इसी तरह देखा जा सकता है। नाव में बैठने से पहले किराया साफ़ तय कर लें। आने का सर्वोत्तम समयसूर्योदय के आगे-पीछे का एक घंटा इस घाट का अपना समय है — ठंडा, बिना भीड़ का, और स्नान तथा जप को समर्पित। नाव से आने वालों के लिए देर दोपहर का प्रकाश मढ़ियों और झुके देवालय पर सुंदर पड़ता है। कुल मिलाकर अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल ऋतु है। बरसात में जल निचली छतों के ऊपर आ जाता है, पत्थर फिसलन भरा हो जाता है, और डूबा देवालय पूरी तरह अदृश्य हो जाता है — यदि उसे देखना ज़रूरी हो तो उसी हिसाब से समय चुनें। महाश्मशान के पड़ोस में क्या अपेक्षित हैयह एक शांत घाट है जिसका पड़ोसी श्मशान है। यहाँ शवयात्राएँ गुज़रती दिखेंगी और शोक में डूबे परिवार स्नान करते मिलेंगे। कभी-कभी लोग दाह-संस्कार की लकड़ी के लिए दान माँगते हुए भी मिल सकते हैं — मणिकर्णिका के आसपास की गलियों में यह एक जानी-पहचानी बात है, और विनम्रता से मना कर देना पूरी तरह उचित है। सच्चे अर्पण और दक्षिणा के लिए कुछ छुट्टे पैसे साथ रखें, ऊपर की गलियों में सामान सँभालकर चलें, और थोड़ा अतिरिक्त समय रखें: सिद्ध क्षेत्र की गलियों में दिशा भूल जाना सामान्य है, और किसी दुकानदार से रास्ता पूछ लेना यहाँ बिलकुल स्वाभाविक माना जाता है। |
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Varanasi, UP
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