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शिवाला घाट

Varanasi, UP

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सत्यापित · पिछली समीक्षा 5 महीने पहले

शिवाला घाट का नाम उसी शिवाला से आया है जो इसकी सीढ़ियों के ऊपर खड़ा है — बनारसी बोली में शिवाला यानी मुहल्ले का अपना शिव मंदिर। यह काशी के दक्षिणी तट पर महानिर्वाणी घाट और गुलरिया घाट के बीच है; ऊपर की ओर महानिर्वाणी और निरंजनी के अखाड़ा-घाट हैं और उनसे आगे चेत सिंह का किलानुमा महल। धरोहर-अभिलेख बताते हैं कि काशी नरेश बलवंत सिंह ने 1767 में इसे पक्का कराया और उनके उत्तराधिकारी चेत सिंह ने 1770 में, अपने महल के निर्माण-काल में, इसका विस्तार किया।

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शिवाला घाट काशी के दक्षिणी तट पर महानिर्वाणी घाट और गुलरिया घाट के बीच पड़ता है। ऊपर की ओर महानिर्वाणी और निरंजनी के अखाड़ा-घाट हैं और उनसे आगे चेत सिंह का किलानुमा महल; नीचे की ओर थोड़ी दूरी पर गुलरिया, दंडी, हनुमान, कर्नाटक और हरिश्चंद्र घाट। नाम में कोई पहेली नहीं है — शिवाला उस शिव मंदिर को कहते हैं जिसे मुहल्ला अपना मानकर सँभालता है, और इन सीढ़ियों के ऊपर खड़े उसी शिवाले से न केवल घाट, बल्कि पूरे मुहल्ले को अपना नाम मिला है।

धरोहर-अभिलेख बताते हैं कि कभी शिवाला घाट इस पूरे भाग में फैला हुआ था, और उन्नीसवीं सदी के मध्य तक यह क्षेत्र पाँच घाटों में बँट गया। आज जो हिस्सा शिवाला कहलाता है वह चौड़ी, इत्मीनान भरी सीढ़ियों का एक विस्तार है, जिसका उपयोग मुख्यतः ऊपर बसे परिवार करते हैं। भोर में स्नान, लोटे में गंगाजल लेकर शिवलिंग तक चढ़ाई, नियत तिथियों पर पितरों का तर्पण, और संध्या को जल पर रखा एक दीया — यही इस घाट का दिन है, और यह बिना किसी आडंबर के दोहराता रहता है।

सीढ़ियों के ऊपर का मुहल्ला एक पुरानी दाक्षिणात्य उपस्थिति सँजोए है। दक्षिण भारत से आने वाले तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए काशी नरेश ने यहाँ ब्रह्मेंद्र मठ की स्थापना कराई, और वाराणसी ज़िले की धरोहर-सूची इस मठ को आज दक्षिण भारत के अय्यर ब्राह्मण तथा तेलुगुभाषी शैव समुदाय का केंद्र बताती है, जिनके परिवार बनारसी परंपराओं के साथ-साथ अपनी परंपराएँ भी निभाते हैं। घाट के पीछे की गलियों में हयग्रीव केशव का स्थान तथा स्वप्नेश्वर और स्वप्नेश्वरी के मंदिर हैं, और एक हनुमान मंदिर भी — छोटे, कार्यरत मंदिर, जहाँ भीड़ नहीं, पर नित्य घरेलू पूजा चलती रहती है।

बीच के भीड़-भरे घाटों से आने वाले यात्री के लिए शिवाला की पहचान उसका ठहराव है। यहाँ स्नान किया जा सकता है, पत्थर पर कुछ देर बैठा जा सकता है, और ऊपर उस शिवाले तक जाया जा सकता है जहाँ कोई आपको जल्दी करने को नहीं कहता।

शिवाला घाट
शिवाला घाट, Varanasi, UP

भक्तों की समझ में काशी शिव की अपनी नगरी है, और यह भक्ति केवल बड़े मंदिरों में नहीं बँधी। शिवाला उसी श्रद्धा का गली-स्तर का रूप है — एक शिवलिंग, जिसे कुछ सौ परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी सँभालते हैं, और जिस पर हर सुबह गंगा से चढ़ाया गया जल वही जल है जो विश्वनाथ पर अर्पित होता है। शिवाला घाट ऐसे ही एक शिवाले की नदी-सीढ़ी है, और इन दोनों के बीच का रोज़ का आना-जाना — नीचे स्नान के लिए, ऊपर जल-अर्पण के लिए — ही इस स्थान की पूरी उपासना-लय है।

यह घाट उस दक्षिणी भाग में है जिसे यात्री असी से केदार घाट तक पैदल नापते हैं, और अनेक लोग यहाँ स्नान इसी सीधे कारण से करते हैं कि यह मध्य के घाटों से शांत है। भक्ति-भाव में काशी क्षेत्र के भीतर गंगा-स्नान का फल इस बात पर निर्भर नहीं माना जाता कि सीढ़ी कितनी प्रसिद्ध है; दक्षिणी घाट सदियों से इसी के लिए सराहे गए हैं — भीड़ के दबाव के बिना लिया गया स्नान और संकल्प, और पास ही वह शिवलिंग जो उसके बाद जल स्वीकार कर ले।

इस भाग में संन्यास-परंपरा की उपस्थिति भी लंबी है, और अनेक यात्रियों के लिए यही इसका अर्थ है। धरोहर-अभिलेख शिवाला से ऊपर की ओर निरंजनी और महानिर्वाणी नागा दशनामी अखाड़ों को रखते हैं, और नीचे दंडी घाट पर द्वारका की शारदा पीठ की एक शाखा, जहाँ दंडी संन्यासी रहते हैं — वे जो दंड धारण करते हैं और गेरुआ पहनते हैं। भोर में यहाँ स्नान करना उन साधुओं की उपस्थिति में स्नान करना है जो अपनी साधना में लगे हैं; भक्त इसे तमाशा नहीं, शुभ संगति मानते हैं।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

इस तट की उपासना उसके पत्थरों से पुरानी है; यहाँ की सीढ़ियाँ पत्थर बनने से बहुत पहले मिट्टी की उतराई थीं। धरोहर-अभिलेख बताते हैं कि काशी नरेश बलवंत सिंह ने सबसे पहले 1767 में शिवाला घाट को पक्का कराया, और उनके उत्तराधिकारी चेत सिंह ने 1770 में इसका विस्तार किया, उन्हीं वर्षों में जब उनका महल बन रहा था।

ठीक ऊपर की ओर बना वह महल एक छोटे किले के रूप में खड़ा किया गया था, और 1781 में उसने चेत सिंह की सेना तथा वॉरेन हेस्टिंग्स की टुकड़ियों के बीच हुआ संघर्ष देखा, जिसके बाद वह किला अंग्रेज़ी नियंत्रण में चला गया; उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में काशी नरेश ने उसका अधिकार पुनः प्राप्त किया। इन सब के बीच घाट की पूजा कभी नहीं रुकी। उन्हीं दशकों में नेपाल के राजा संजय विक्रम शाह ने वह महल बनवाया जो आज भी इन सीढ़ियों के ऊपर खड़ा है, और उसके साथ एक शिव मंदिर भी; और काशी नरेश ने दक्षिण से आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए ब्रह्मेंद्र मठ की स्थापना कराई — वह नींव, जिसने शिवाला को काशी के दाक्षिणात्य शैव परिवारों का बसा हुआ मुहल्ला बना दिया।

बीसवीं सदी के मध्य तक चेत सिंह घाट और शिवाला घाट के बीच का जल बुढ़वा मंगल का स्थल हुआ करता था, जब सजी हुई नावें नदी पर एकत्र होतीं और दिन भर संगीत की महफ़िलें जमतीं। यह परंपरा यहाँ से लुप्त हो गई; बाद में उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग ने राजेंद्र प्रसाद घाट पर इसका एक रूप पुनर्जीवित किया। आज जो सीढ़ियाँ दिखती हैं उन्हें 1988 में राज्य के सिंचाई विभाग ने बनवाया; घाट का क्षेत्र नगर निगम के अधीन है, जबकि ऊपर के मंदिर, मठ और आवास अपने-अपने न्यासों और परिवारों के हैं।

शिवाला घाट — historic view

वास्तुकला

शिवाला एक चौड़ा घाट है; धरोहर-प्रलेखना में दर्ज 0.58 हेक्टेयर का आँकड़ा शिवाला–गुलरिया–दंडी के संपूर्ण भाग के लिए है, अकेले शिवाला के लिए नहीं। सीढ़ियाँ 1988 में इसी भाग में प्रयुक्त सादे तराशे पत्थर से बनीं, और यहाँ न कोई आरती-मंच है न कोई आयोजन-स्थल। घाट की बनावट दो ही कामों के लिए है — जल तक उतरना, और बैठना।

तट की ऊपरी रेखा को स्वरूप देता है शिवाला महल, जिसे उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में राजा संजय विक्रम शाह ने बनवाया था; नदी की ओर उसका लंबा अग्रभाग अब समय की मार से काफ़ी क्षीण हो चुका है। जिस छोटे शिव मंदिर से घाट को नाम मिला वह अग्रभाग के उत्तरी हिस्से में है, और ब्रह्मेंद्र मठ ऊपर के मुहल्ले में है।

ऊपर की ओर, निरंजनी और महानिर्वाणी के अखाड़ा-घाटों से आगे, चेत सिंह का किला है — गंगा के ऊपर बनी छत पर मंडपों वाला एक तटवर्ती निवास, जिसमें प्रवेश एक भव्य द्वार से होता है, जिसकी छत के दो कोनों पर अष्टकोणीय गुंबददार मंडपों से ढँकी विशाल संरचनाएँ हैं, और जिसके परिसर में अठारहवीं–उन्नीसवीं सदी के तीन शिव मंदिर खड़े हैं। नाव से देखने पर शिवाला किसी मंदिर-मुख की तरह नहीं, एक आवासीय तट की तरह दिखता है — मठ, महल और घरेलू शिवाला एक-दूसरे से सटे हुए, और उनके बीच से जल तक उतरती सीढ़ियाँ।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

शिवाला की उपासना घरेलू और नित्य है। भक्त भोर के साथ गंगा स्नान के लिए उतरते हैं, लोटे में जल भरकर ऊपर शिवाले तक ले जाते हैं, और शिवलिंग पर जल तथा बिल्वपत्र अर्पित करते हैं। काशी में कोई अनुष्ठान आरंभ करने वाले परिवार यहीं संकल्प लेते हैं, और नियत तिथियों तथा पितृपक्ष में पितरों का तर्पण किया जाता है।

शैव ऋतुएँ सबसे अधिक भीड़ लाती हैं। सावन के सोमवारों पर, जब पूरी काशी में शिव को गंगाजल अर्पित करने का भाव अपने चरम पर होता है, सीढ़ियों पर भोर से पहले ही आवाजाही शुरू हो जाती है; और महाशिवरात्रि यहाँ के शिवाले में वैसे ही मनाई जाती है जैसे काशी के अन्य शिव मंदिरों में। शेष वर्ष लय सीधी-सादी रहती है — स्नान, दर्शन, और संध्या को जल पर रखा एक दीया।

शिवाला पर दशाश्वमेध जैसी औपचारिक संध्या गंगा आरती नहीं होती; जो यात्री आरती में सम्मिलित होना चाहते हैं वे पैदल या नाव से नीचे की ओर जाते हैं। घाट के ऊपर के छोटे मंदिरों का समय उनके अपने पुजारी और न्यास तय करते हैं और वह यात्रियों के लिए निश्चित नहीं है; उसी दिन स्थानीय रूप से पूछकर पुष्टि कर लेना उचित रहता है।

उत्सव एवं पर्व

उत्सवकबभीड़
महाशिवरात्रिअधिक, पर मध्य के घाटों से कहीं कम
सावन सोमवारसोमवारों को अधिक, शेष सप्ताह मध्यम
देव दीपावलीनगर भर में बहुत अधिक; इस घाट पर मध्यम
कार्तिक पूर्णिमा स्नानभोर से पहले से ही अधिक
गंगा दशहरामध्यम से अधिक

महाशिवरात्रि: परंपरा मानती है कि इस रात्रि शिवलिंग पर जल और बिल्वपत्र का अर्पण विशेष कृपा-दायी है। शिवाला जैसे मुहल्ला-मंदिर के लिए यह वर्ष की सबसे भरी हुई रात है।

सावन सोमवार: श्रावण शिव का अपना मास माना गया है, और शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करना पूरी काशी में इस मास का केंद्रीय भक्ति-कर्म है।

देव दीपावली: परंपरा कहती है कि देव दीपावली त्रिपुरासुर पर शिव की विजय और देवताओं के गंगा-स्नान हेतु अवतरण का स्मरण है; सीढ़ियों पर रखे दीये उन्हीं के स्वागत में अर्पित माने जाते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा स्नान: पुराण कार्तिक पूर्णिमा के स्नान और दान को महान यज्ञों का फल देने वाला कहते हैं; काशी में पूरा तट यह दिन निभाता है।

गंगा दशहरा: भक्त मानते हैं कि इस दिन का स्नान गंगा मैया के पृथ्वी पर आगमन का सम्मान है, और नदी इस दिन के अर्पण को विशेष कृपा से स्वीकार करती हैं।

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कैसे पहुँचें

शिवाला घाट भी है और एक जाना-पहचाना मुहल्ला भी, इसलिए सबसे सरल रास्ता शिवाला चौराहे से है, जहाँ से एक छोटी गली मठ और महल के अग्रभाग के पास से होती हुई सीढ़ियों तक उतरती है। घाट-मार्ग से आने वाले यात्री दक्षिण में असी से चलकर तुलसी, भदैनी, जानकी, आनंदमयी, जैन, निषादराज, पंचकोट, प्रभु, चेत सिंह, निरंजनी और महानिर्वाणी घाट पार करते हुए यहाँ पहुँच सकते हैं; उत्तर में दशाश्वमेध से चलें तो केदार, विजयानगरम, लाली, हरिश्चंद्र, कर्नाटक, हनुमान, दंडी और गुलरिया घाट होते हुए रास्ता आता है। वृद्ध यात्रियों के लिए असी या दशाश्वमेध से साझा नाव सबसे सुगम है, और नदी से घाट की पहचान ऊपर खड़े शिवाला महल के लंबे, पुराने अग्रभाग से हो जाती है।

यात्रियों के लिए तैयारी

  • जल्दी आएँ। भोर से लगभग नौ बजे तक का समय सबसे अच्छा है, जब स्नान चल रहा होता है और पत्थर ठंडे रहते हैं।
  • यदि शिवाले तक गंगाजल ले जाना हो तो छोटा लोटा साथ रखें, और स्नान करना हो तो बदलने के वस्त्र।
  • दीया, अर्पण और दक्षिणा के लिए कुछ छुट्टे पैसे साथ रखें।
  • सीढ़ियों पर रेलिंग नहीं है और जहाँ हाल में जल उतरा हो वहाँ फिसलन रहती है; पकड़ वाले जूते पहनें और निचले पत्थरों पर सावधानी रखें।
  • शिवाला दक्षिणी घाटों की आधे दिन की पैदल यात्रा में स्वाभाविक रूप से जुड़ जाता है — असी, तुलसी, चेत सिंह, शिवाला, हनुमान, हरिश्चंद्र और केदार — जो एक इत्मीनान भरी सुबह में पूरी हो जाती है।
  • घाट पर सुविधाएँ बहुत कम हैं; चाय की दुकानें और शौचालय ऊपर की गलियों में मिलते हैं।

आने का सर्वोत्तम समय

अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल ऋतु है — साफ़ सुबहें और शांत, नीची धारा। सावन (जुलाई–अगस्त) और महाशिवरात्रि इस घाट की अपनी भक्ति-चरम हैं। वर्षा-काल में निचली सीढ़ियाँ जल में डूब जाती हैं और उपयोग योग्य घाट ऊपरी हिस्से तक सिमट जाता है, इसलिए धारा तेज़ होने पर स्नान से बचना उचित है। देव दीपावली पर पूरा तट दीपों से जगमगाता है, और शिवाला मुख्य भीड़ से हटकर होने के कारण उसे देखने के शांत स्थानों में से एक बन जाता है।

स्थान

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