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सोमनाथ मंदिर

Gir Somnath, GJ

temple 4.2 (15)
सत्यापित · पिछली समीक्षा 6 महीने पहले

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम — आदि ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ महादेव — गुजरात के सौराष्ट्र तट पर प्रभास पाटण में विराजमान हैं, जहाँ परंपरा के अनुसार हिरण, कपिला और सरस्वती त्रिवेणी संगम पर मिलकर सागर में समा जाती हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का आरंभ ही इसी नाम से होता है — सौराष्ट्रे सोमनाथं च। आज जिस मंदिर में भक्त प्रवेश करते हैं उसकी प्राण-प्रतिष्ठा सन् 1951 में हुई, और भक्तों की श्रद्धा है कि प्रभास की उपासना-धारा सहस्र वर्षों की टूट-फूट के बीच भी कभी नहीं रुकी।

templeGJ

सोमनाथ महादेव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाते हैं। मंदिर की व्यवस्था देखने वाला श्री सोमनाथ ट्रस्ट भक्तों का स्वागत इन्हीं शब्दों से करता है — प्रथम आदि ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ महादेव के पावन धाम में आपका स्वागत है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र भी इसी नाम से आरंभ होता है — सौराष्ट्रे सोमनाथं च। भक्ति की दृष्टि से यहाँ खड़ा होना उन बारह स्थानों में से पहले स्थान पर खड़ा होना है, जहाँ शिव ज्योति-रूप में प्रकट माने जाते हैं।

मंदिर वेरावल के निकट प्रभास पाटण में है, उस ज़िले में जिसका नाम अब स्वयं इसी तीर्थ पर पड़ा है — गिर सोमनाथ। पुराण इस भूमि को प्रभास क्षेत्र कहकर सराहते हैं। पास ही त्रिवेणी संगम पर परंपरा हिरण, कपिला और सरस्वती का मिलन मानती है, जहाँ से ये तीनों धाराएँ एक साथ सागर में समा जाती हैं। सोमनाथ आने वाले यात्री प्रायः संगम और आसपास के तीर्थों को भी अपनी उसी यात्रा में जोड़ लेते हैं।

यहाँ पहुँचकर भक्त जो पहली बात अनुभव करता है, वह यह है कि सागर इस मंदिर का अंग है। गर्भगृह खुले जल की ओर मुख किए है और मंडप तथा क्षितिज के बीच कुछ भी नहीं बना। लहरों का स्वर भीतर तक आता है, और संध्या आरती उसी स्वर के ऊपर होती है। तट पर बाण स्तंभ खड़ा है, जिस पर अंकित संस्कृत लेख को अबाधित ज्योतिर्मार्ग के रूप में पढ़ा जाता है — अर्थात इस तट से दक्षिणी ध्रुव तक सीधी रेखा में कोई भूभाग नहीं; ट्रस्ट के अनुसार उस दिशा में निकटतम भूमि लगभग 9,936 किलोमीटर दूर है। भक्त इस स्तंभ को इस स्थान का ही कथन मानते हैं — सोमनाथ वहाँ है जहाँ भारत की भूमि समाप्त होकर सागर को स्वयं सौंप देती है।

सोमनाथ वह तीर्थ भी है जिसे हिन्दू स्मृति ने बार-बार टूटते और बार-बार उठते देखा है। आज का मंदिर 11 मई 1951 को प्रतिष्ठित हुआ, जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की। किंतु इस स्थान की गहरी पहचान भवन नहीं है। भक्तों की श्रद्धा है कि प्रभास में पूजा कभी नहीं रुकी — विध्वंस के बीच भी नहीं, पुनर्निर्माण की प्रतीक्षा में भी नहीं, और उन लंबे वर्षों में भी नहीं जब एक छोटा-सा मंदिर चुपचाप यह परंपरा सँभाले रहा। यात्री यहाँ किसी विजय-स्मारक को देखने नहीं आते; वे उस भगवान को जल चढ़ाने आते हैं जिन्होंने, उनकी श्रद्धा में, यह तट कभी छोड़ा ही नहीं।

सोमनाथ मंदिर
सोमनाथ मंदिर, Gir Somnath, GJ

शैव परंपरा में ज्योतिर्लिंग अनेक लिंगों में से एक नहीं होता। वह स्वयं शिव की ज्योति मानी जाती है — स्वयंभू, और ऐसे रूप में प्रकट जिसे मनुष्य के हाथ अभिषेक कर सकें और मनुष्य की आँखें दर्शन कर सकें। श्री सोमनाथ ट्रस्ट उसी शास्त्रीय समझ को दोहराता है, जिसमें शिव कहते हैं कि वे सर्वत्र विद्यमान हैं, पर विशेष रूप से बारह रूपों और बारह स्थानों में ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हैं। इन्हीं बारह में सोमनाथ प्रथम गिने जाते हैं।

नाम स्वयं अर्थ खोल देता है। सोम-नाथ अर्थात सोम के नाथ, चंद्रमा के स्वामी। भक्तों की मान्यता है कि सबसे पहले चंद्रदेव ने ही इस तट पर शिव की आराधना की और यहीं क्षय के शाप से मुक्त हुए, और उसी क्षण से शिव ने प्रभास को अपना निवास स्वीकार किया। इसीलिए सोमनाथ को पुनर्जीवन का तीर्थ माना जाता है। जिनके जीवन में कुछ क्षीण हो रहा हो — स्वास्थ्य, बल, मान, वैभव — वे यहाँ उसी प्रार्थना के साथ आते हैं, क्योंकि परंपरा कहती है कि यह वही स्थान है जहाँ क्षय को कृपा मिली थी।

प्रभास क्षेत्र शिव के साथ एक दूसरी पावन स्मृति भी सँभाले हुए है। परंपरा कहती है कि भगवान श्रीकृष्ण भालका में एक व्याध के बाण से आहत होकर हिरण के तट पर आए और वहीं उन्होंने निजधाम प्रस्थान किया। सोमनाथ ट्रस्ट भालका तीर्थ और गोलोकधाम — जिसे देहोत्सर्ग भी कहते हैं — दोनों स्थानों की व्यवस्था देखता है, और ये मुख्य मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर हैं। इसीलिए अनेक भक्तों के लिए सोमनाथ की यात्रा दो भागों में पूरी होती है — तट पर महादेव का दर्शन, और पास ही नदी-तट पर श्रीकृष्ण की विदाई की स्मृति। भारत में ऐसे क्षेत्र बहुत कम हैं जहाँ एक ज्योतिर्लिंग और श्रीकृष्ण का निजधाम-तीर्थ एक ही भूमि पर हों।

कथा और लोक-विश्वास

शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता वह कथा कहती है जिससे सोमनाथ को उसका नाम मिला। दक्ष प्रजापति ने अपनी सत्ताईस कन्याओं — नक्षत्रों — का विवाह चंद्रमा से इस भाव के साथ किया कि वे सबको समान स्नेह देंगे। किंतु चंद्रमा का प्रेम केवल रोहिणी पर टिका रहा और शेष उपेक्षित रह गईं। दक्ष रुष्ट हुए और उन्होंने चंद्रमा को क्षय का शाप दे दिया। चंद्रमा की कांति घटने लगी।

कथा आगे कहती है कि ब्रह्मा ने चंद्रमा को प्रभास क्षेत्र जाने, वहाँ स्नान करने और महामृत्युंजय मंत्र से शिव की उपासना करने का परामर्श दिया। चंद्रमा ने यहीं तप किया — परंपरा कहती है, छह मास तक अखंड, करोड़ों बार उस मंत्र का जप करते हुए। शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने ऐसा वरदान दिया जो न शाप को मिटाता था, न उसे नष्ट करने देता था: एक पक्ष में उनकी कलाएँ घटेंगी, और अगले पक्ष में फिर बढ़ेंगी। भक्तों की मान्यता है कि हर मास आकाश में दिखने वाला चंद्रमा का घटना-बढ़ना वही वरदान है, जो आज भी दिखाई देता है। यही कारण है कि सोमनाथ को ऐसा तीर्थ माना जाता है जहाँ कृपा टूटे हुए को मिटाकर नहीं, बल्कि उसे फिर उगने की लय देकर मिलती है — और आगे चलकर यही भाव स्वयं इस मंदिर की अपनी कथा पर भी उतर आया।

कथा यह भी कहती है कि तब देवताओं ने शिव से प्रभास में ही स्थिर रहने की प्रार्थना की, और शिव ने ज्योतिर्लिंग रूप में यहीं वास स्वीकार किया।

ट्रस्ट अपनी परंपरा में एक और स्मृति सँजोए है — कि इतिहास के लिखे जाने से पहले यह तट-मंदिर चार बार बन चुका था: सोम ने स्वर्ण से, रवि ने रजत से, श्रीकृष्ण ने काष्ठ से और राजा भीमदेव ने पाषाण से। भक्त इसे तिथियों का लेखा नहीं मानते। वे इसे इस तीर्थ के स्वभाव का कथन मानते हैं — कि सोमनाथ सदा से वह मंदिर रहा है जो फिर बन जाता है।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

प्रभास में उपासना बहुत पुरानी है, और उसकी निरंतरता ही सोमनाथ के इतिहास का असली सूत्र है। दसवीं शताब्दी तक यहाँ गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) राजाओं के अधीन पाषाण-मंदिर खड़ा था। इतिहासकार इनमें सबसे पुराने निर्माण को मूलराज से जोड़ते हैं, जो 997 ई. से पहले का माना जाता है, और यह भी उल्लेख करते हैं कि राजा कुमारपाल ने सन् 1169 में उत्तम पाषाण से इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया।

सदियों में यह मंदिर एक से अधिक बार लूटा और ध्वस्त किया गया — सन् 1026 में महमूद ग़ज़नवी का आक्रमण, सन् 1299 में अलाउद्दीन ख़िलजी के समय का आक्रमण, और सन् 1706 में औरंगज़ेब का ध्वंस-आदेश इनमें सर्वाधिक उल्लिखित हैं। ये सब एक बहुत लंबी गाथा के भीतर एक-एक तथ्य भर हैं। भक्त के लिए इनसे अधिक महत्व उस बात का है जो हर बार इनके बाद हुई — मंदिर फिर खड़ा किया गया, और ज्योतिर्लिंग की पूजा फिर चलने लगी।

इन पुनरुद्धारों में सबसे श्रद्धेय है इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर का कार्य, जिन्होंने सन् 1783 में प्रभास में मंदिर बनवाकर विधिवत प्रतिष्ठा कराई और नित्य पूजा आरंभ करवाई। वही मंदिर आज पुराना सोमनाथ अथवा अहिल्याबाई मंदिर कहलाता है और वर्तमान मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर है। जिन वर्षों में यहाँ कोई बड़ा मंदिर नहीं था, उन वर्षों में यही छोटा मंदिर परंपरा को सँभाले रहा। आज भी भक्त वहाँ दर्शन करते हैं, और ट्रस्ट ने सोमनाथ के दर्शनीय तीर्थों में इसे सबसे पहले गिनाया है।

आज का मंदिर स्वतंत्र भारत के पहले वर्षों की देन है। नवंबर 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल सोमनाथ आए और उन्होंने जनसमूह के सामने संकल्प लिया कि यह मंदिर पुनः बनेगा। महात्मा गांधी से जब यह योजना कही गई तो उनका परामर्श था कि निर्माण का धन राज्य से नहीं, जनता से आना चाहिए — और धन उसी प्रकार जुटाया गया। नवानगर के जामसाहब दिग्विजयसिंहजी आरंभिक बड़े दानदाताओं में थे। मंदिर की व्यवस्था के लिए श्री सोमनाथ ट्रस्ट बना, और सरदार पटेल के न रहने पर के. एम. मुंशी ने इस कार्य को पूर्णता तक पहुँचाया। शिलान्यास 8 मई 1950 को हुआ। 11 मई 1951 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नए गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की। ट्रस्ट इसी तिथि को प्रतिवर्ष सोमनाथ स्थापना दिवस के रूप में मनाता है।

प्रतिष्ठा के बाद भी निर्माण चलता रहा। मंदिर नवंबर 1966 में पूर्ण हुआ, और परिसर का औपचारिक प्रवेश-द्वार दिग्विजय द्वार सन् 1970 में बनकर तैयार हुआ। जनवरी 2026 में सोमनाथ में स्वाभिमान पर्व मनाया गया — संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय स्मरणोत्सव, जिसे ट्रस्ट ने भी अपने पर्व-कैलेंडर में 11 जनवरी को अंकित किया — जो सन् 1026 के आक्रमण के एक हज़ार वर्ष और सन् 1951 की प्रतिष्ठा के पचहत्तर वर्ष का स्मरण था, और जिसे विध्वंस की नहीं, बल्कि टिके रहने की स्मृति कहकर प्रस्तुत किया गया।

सोमनाथ मंदिर — historic view

वास्तुकला

वर्तमान मंदिर की रचना स्थपति प्रभाशंकर सोमपुरा ने की, जो पश्चिम भारत की मारु-गुर्जर शैली — अर्थात चालुक्य या सोलंकी मंदिर-परंपरा — में काम कर रहे थे। ट्रस्ट इस स्वरूप को नाम देकर बताता है: कैलास महामेरु प्रासाद, अर्थात वह मंदिर जिसे तट पर उठते हुए शिव के अपने पर्वत के रूप में गढ़ा गया।

योजना शास्त्रीय त्रि-अंग क्रम पर है — गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप। गर्भगृह के ऊपर शिखर उठता है, जिसकी ऊँचाई ट्रस्ट 155 फुट बताता है। शिखर पर स्थित कलश का भार लगभग दस टन है, और मंदिर की ध्वजा जिस ध्वजदंड पर फहराती है वह 27 फुट ऊँचा और एक फुट परिधि का है। तट पर खड़े यात्री उस ध्वजा को देखने के लिए ऊपर निगाह उठाते हैं।

भीतर गर्भगृह का भाव शांत और अनुद्विग्न है। ज्योतिर्लिंग का अभिषेक और शृंगार होता है, और दर्शन दूर से नहीं, निकट से मिलता है। मंडपों का पाषाण पश्चिम भारत की संयत शैली में तराशा गया है — गढ़ी हुई पट्टियाँ, मूर्ति-युक्त तोरण-कोष्ठक, और वृत्ताकार वलयों में उतरती छत — जहाँ अलंकरण गर्भगृह तक ले जाने वाले मार्ग की सेवा करता है, उससे स्पर्धा नहीं करता। मधु-वर्ण पाषाण दिन-भर तट की रोशनी को अलग-अलग रूप में पकड़ता है — दोपहर में उष्ण, और संध्या आरती से ठीक पहले लगभग स्वर्णिम।

नंदी गर्भगृह की ओर मुख किए विराजमान हैं, और मंदिर स्वयं खुले सागर की ओर मुख किए है। यह दिशा-विन्यास केवल स्थान का चयन नहीं, मंदिर के अर्थ का अंग है। तट पर बाण स्तंभ खड़ा है, जिस पर इस बिंदु से दक्षिणी ध्रुव तक अबाधित मार्ग का उल्लेख अंकित है। परिसर का औपचारिक प्रवेश-द्वार दिग्विजय द्वार है। दर्शन के बाद तट पर टहलने वाले भक्त प्रायः इन दोनों के सामने कुछ क्षण ठहरते हैं।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अनुसार दर्शन प्रातः 6 बजे से रात्रि 10 बजे तक होते हैं, और आरती दिन में तीन बार होती है — प्रातः 7 बजे, दोपहर 12 बजे और सायं 7 बजे। इन्हें सामान्यतः मंगला, माध्यन्ह और संध्या आरती कहा जाता है। पर्वों पर और सावन में समय बदल सकता है, इसलिए जो यात्री किसी विशेष आरती के अनुसार अपना दिन बाँधना चाहते हैं, वे मंदिर से वर्तमान समय पहले पूछ लें।

प्रत्येक आरती से पहले ज्योतिर्लिंग का अभिषेक और शृंगार होता है — जल से स्नान और पुष्पों तथा आभूषणों से सज्जा। संध्या आरती, जिसमें मंडप के पीछे सागर सुनाई देता रहता है और अंधकार में मंदिर आलोकित रहता है, वही आरती है जिसे अधिकांश भक्त देखने का प्रयास करते हैं और जो देर तक भीतर बनी रहती है।

जो भक्त अपने नाम से अनुष्ठान कराना चाहते हैं, उनके लिए ट्रस्ट सोमनाथ में होने वाली मुख्य पूजाएँ इस प्रकार बताता है:

  • होमात्मक लघुरुद्र
  • होमात्मक महारुद्र
  • होमात्मक अतिरुद्र
  • सवालक्ष संपुट महामृत्युंजय जाप

महामृत्युंजय जाप का इस क्षेत्र से विशेष संबंध है, क्योंकि परंपरा कहती है कि चंद्रदेव ने प्रभास में इसी मंत्र से शिव की आराधना की थी। हवन और यज्ञ की बुकिंग ट्रस्ट के माध्यम से होती है; प्रसाद और विशेष पूजा भी ट्रस्ट के आधिकारिक माध्यमों से बुक की जा सकती है। फिर भी अनेक भक्त जल, बिल्वपत्र और जुड़े हाथों के अतिरिक्त कुछ नहीं चढ़ाते — और परंपरा ने इसे सदा पर्याप्त माना है।

संध्या में ट्रस्ट मंदिर परिसर में जय सोमनाथ ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम प्रस्तुत करता है, जो रात्रि 8 बजे से 9 बजे तक चलता है और इस तीर्थ का इतिहास सुनाता है। सन् 2017 में आरंभ हुए त्रि-आयामी प्रक्षेपण वाले स्वरूप में यह वर्णन अमिताभ बच्चन के स्वर में है। वर्षा ऋतु में यह कार्यक्रम नहीं होता।

उत्सव एवं पर्व

उत्सवकबभीड़
महाशिवरात्रिअत्यधिक — रात-भर लंबी कतारें
सावन मासअत्यधिक — पूरे मास, और सोमवारों को सर्वाधिक
कार्तिक पूर्णिमाबहुत अधिक — पाँच दिन का मेला पूरे कस्बे में
सोमनाथ स्थापना दिवसमध्यम
गोलोकधाम उत्सवमध्यम

महाशिवरात्रि: शैव वर्ष की सबसे बड़ी रात। भक्तों की मान्यता है कि इस रात का जागरण, उपवास और अभिषेक शिव की साक्षात कृपा खींच लाता है, और ज्योतिर्लिंग पर वह कृपा और भी निकट मानी जाती है।

सावन मास: परंपरा सावन को वह मास मानती है जिसमें शिव को किया गया अर्पण सबसे अधिक फल देता है। सावन में, और विशेषकर सावन सोमवार को किया गया जलाभिषेक शैव भक्ति का सबसे सरल और सबसे प्रिय कर्म है।

कार्तिक पूर्णिमा: कार्तिक पूर्णिमा वर्ष की सबसे पावन पूर्णिमाओं में गिनी जाती है, जब तीर्थ पर स्नान और अर्पण का विशेष महत्व है। सोमनाथ में यह दिन मंदिर को पास के त्रिवेणी संगम की स्नान-परंपरा से जोड़ देता है।

सोमनाथ स्थापना दिवस: यह दिन उत्सव से अधिक कृतज्ञता का है — भक्तों की स्मृति में वह दिन, जब लंबे अंतराल के बाद प्रभास में पूर्ण मंदिर की पूजा फिर आरंभ हुई।

गोलोकधाम उत्सव: भगवान श्रीकृष्ण के निजधाम प्रस्थान का स्मरण, जिसे परंपरा भालका में व्याध के बाण से आहत होने के बाद इसी स्थान पर मानती है। यही उत्सव सोमनाथ क्षेत्र को ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ वैष्णव आयाम भी देता है।

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सोमनाथ कैसे पहुँचें

मंदिर सौराष्ट्र तट पर गिर सोमनाथ ज़िले के प्रभास पाटण में है। ट्रस्ट के अनुसार सोमनाथ रेलवे स्टेशन मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर और वेरावल लगभग 7 किलोमीटर दूर है; निकटतम हवाई अड्डे दीव लगभग 85 किलोमीटर, राजकोट लगभग 200 किलोमीटर और अहमदाबाद लगभग 390 किलोमीटर पर हैं। अधिकांश यात्री वेरावल या सोमनाथ तक रेल से आते हैं, अथवा सौराष्ट्र की सड़कों से।

ट्रस्ट सोमनाथ में अपने अतिथि-गृह चलाता है — सागर दर्शन अतिथि गृह, लीलावती अतिथि भवन और माहेश्वरी अतिथि भवन — जिनकी बुकिंग ऑनलाइन पहले से की जा सकती है। महाशिवरात्रि, सावन और कार्तिक पूर्णिमा के मेले के समय, जब पूरा कस्बा भर जाता है, यह बुकिंग बहुत पहले से कर लेना ही ठीक रहता है।

यात्रियों के लिए तैयारी

  • मंदिर के भीतर सभी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ पूर्णतः वर्जित हैं — मोबाइल, कैमरा, स्मार्टवॉच, लैपटॉप और टैबलेट। फ़ोटो खींचने की अनुमति नहीं है।
  • मंदिर में निःशुल्क क्लोक रूम और लॉकर की व्यवस्था है। अपनी वस्तुएँ बाहर किसी दुकान पर छोड़ने के बजाय वहीं रखें।
  • चूँकि फ़ोन बाहर ही छोड़ना होगा, भीतर जाने से पहले परिवार के साथ मिलने की जगह तय कर लें।
  • वस्त्र मर्यादित पहनें। ट्रस्ट का कथन है कि मिनी स्कर्ट और असम्मानजनक वेशभूषा वर्जित है; सामान्य भारतीय परिधान का स्वागत है।
  • मंदिर के आसपास किसी भी समय धूम्रपान वर्जित है।
  • वरिष्ठ नागरिकों और चलने में असमर्थ यात्रियों के लिए मुख्य द्वार पर व्हीलचेयर और गोल्फ कार्ट उपलब्ध रहती है।
  • यदि सायं 7 बजे की आरती और रात 8 बजे का ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रम दोनों देखने हों, तो संध्या का समय खुला रखें।
  • तट पर वर्ष का अधिकांश समय आर्द्र रहता है। पानी साथ रखें, और बुज़ुर्गों के साथ हों तो दोपहर का कार्यक्रम हल्का रखें।

प्रभास क्षेत्र के अन्य तीर्थ और आने का समय

सोमनाथ का दर्शन अकेले कम ही लिया जाता है। ट्रस्ट ने थोड़ी ही दूरी के भीतर क्षेत्र के तीर्थ गिनाए हैं — अहिल्याबाई मंदिर, भालका तीर्थ, शशिभूषण मंदिर, त्रिवेणी संगम घाट, गोलोकधाम तीर्थ, हरिहर महाप्रभुजी की बैठक और प्राची तीर्थ। जिनके पास पूरा दिन है, वे प्रायः प्रातः त्रिवेणी संगम और भालका के दर्शन कर लेते हैं और मंदिर को संध्या आरती के लिए रख छोड़ते हैं।

कुछ और दूरी पर सासण गिर लगभग 65 किलोमीटर, दीव लगभग 85, जूनागढ़ लगभग 90, पोरबंदर लगभग 130 और द्वारका लगभग 230 किलोमीटर पर है — यही कारण है कि सोमनाथ और द्वारका को प्रायः सौराष्ट्र की एक ही यात्रा में जोड़ लिया जाता है।

इस तट पर अक्टूबर से फरवरी तक का समय सबसे सुखद रहता है। सावन और महाशिवरात्रि आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वाधिक प्रबल हैं और भीड़ भी तभी सबसे अधिक होती है; नवंबर में कार्तिक पूर्णिमा का मेला पाँच दिन तक सोमनाथ को भरा रखता है। जो भक्त शांत और बिना भीड़-भाड़ के दर्शन चाहते हैं, उनके लिए सामान्य कार्यदिवस की सुबह सबसे अच्छी है, जब प्रातः 7 बजे की आरती बिना लंबी प्रतीक्षा के मिल जाती है।

स्थान

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