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त्रिपुरा भैरवी घाट

Varanasi, UP

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सत्यापित · पिछली समीक्षा 5 महीने पहले

त्रिपुर भैरवी घाट काशी के मध्य तट का स्नान-घाट है, जिसका नाम देवी त्रिपुर भैरवी का दिया हुआ है — उनका मंदिर घाट को जाती गली में है, और शाक्त परंपरा में भैरवी दस महाविद्याओं में गिनी जाती हैं। धरोहर-अभिलेखों में इसका पुराना नाम वृद्धादित्य घाट दर्ज है, और आज भी घाट के ऊपर पीपल के नीचे सूर्य की प्रतिमा विराजमान है। मान मंदिर घाट और मीर घाट के बीच बसा यह घाट स्नान, गंगा-पूजन और परिवार के संस्कारों का कार्यरत घाट है।

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त्रिपुर भैरवी घाट काशी के मध्य तट पर चौरासी घाटों की परंपरागत गिनती में पैंतालीसवाँ घाट है। ऊपर की ओर मान मंदिर घाट है, राजा मान सिंह के महल और उनके वंशज सवाई जय सिंह की बनवाई वेधशाला के साथ; नीचे की ओर मीर घाट, जिसकी गलियों से विशालाक्षी के दर्शन को चढ़ा जाता है। यह छोटा घाट है, और उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग का विवरण इसे सीधे-सादे शब्दों में बताता है — साफ़, सुव्यवस्थित, जहाँ स्थानीय लोग स्नान करने आते हैं।

घाट का नाम देवी त्रिपुर भैरवी का दिया हुआ है, जिनका मंदिर जल तक उतरते रास्ते पर पड़ता है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के घाट-विवरण में इसे प्राचीन त्रिपुर भैरवी (दुर्गा) मंदिर बताया गया है, जिसका अठारहवीं सदी में पुनर्निर्माण हुआ और उसके बाद घाट देवी के नाम से पुकारा जाने लगा; तट के धरोहर-प्रलेखन में भी मंदिर का निर्माण अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध का बताया गया है और साफ़ लिखा है कि त्रिपुर भैरवी के मंदिर की निकटता ने ही इस घाट को यह नाम दिया। शाक्त परंपरा में भैरवी — जिन्हें त्रिपुर भैरवी भी कहा जाता है — दस महाविद्याओं में गिनी जाती हैं, और भैरव की शक्ति-रूपा मानी जाती हैं।

इन सीढ़ियों पर जो होता है, वह काशी के किसी भी घाट का सामान्य पर पावन कर्म है। भोर की पहली रोशनी में लोग स्नान के लिए उतरते हैं, संकल्प लेते हैं, पितरों के लिए तर्पण करते हैं, जल-किनारे गंगा-पूजन करते हैं। परिवार यहाँ बच्चों का मुंडन कराने आते हैं, और नदी-किनारे विवाह के संस्कार भी होते हैं। तट का धरोहर-प्रलेखन बताता है कि यह घाट तमिल यात्रियों को विशेष प्रिय है, और यहाँ की यात्री-शाला मुख्यत: तमिल और तेलुगु श्रद्धालु उपयोग करते हैं — काशी और दक्षिण को जोड़ने वाले धागों में से एक।

इस नाम से पहले का नाम

धरोहर-प्रलेखन और राज्य पर्यटन विभाग, दोनों बताते हैं कि सत्रहवीं सदी की संस्कृत रचना गीर्वाणपदमंजरी में इन सीढ़ियों को वृद्धादित्य घाट कहा गया है — यहाँ स्थित सूर्यदेव की एक पुरानी प्रतिमा के कारण। काशी की परंपरा में सूर्य ने नगरी में बारह रूपों में स्थान लिया, और वृद्धादित्य उन्हीं द्वादश आदित्यों में से एक हैं, जिनकी दर्शन-यात्रा आज भी की जाती है। देवी का मंदिर बनने के बाद नाम बदल गया, पर पुरानी उपासना मिटी नहीं: घाट के ऊपर बड़े पीपल के नीचे, पुराने पत्थरों के बीच, सूर्य आज भी विराजमान हैं।

त्रिपुरा भैरवी घाट
त्रिपुरा भैरवी घाट, Varanasi, UP

इन सीढ़ियों की पवित्रता सबसे पहले काशी में गंगा की पवित्रता है — वही नदी, वही क्षेत्र, वही पुण्य जो परंपरा असी से आदि केशव तक फैले इस अर्धचंद्र पर कहीं भी किए स्नान से जोड़ती है। इस घाट के वर्तमान नाम से जुड़ा कोई अलग पौराणिक माहात्म्य अभिलेखों में नहीं मिलता, और सच्चा मार्गदर्शन वही है जो यह बात कह दे, कोई कथा गढ़ न ले।

पर एक देवी-पहचान इस घाट के पास अवश्य है। शाक्त परंपरा में त्रिपुर भैरवी दस महाविद्याओं में पूजी जाती हैं — काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला। भक्तों की मान्यता है कि हर महाविद्या उसी एक शक्ति तक पहुँचने का एक अलग द्वार है। भैरवी उग्र रूप हैं; पुराण और तंत्र उन्हें भैरव की शक्ति-रूपा कहते हैं।

घाट काशी की व्यापक देवी-भूगोल के भीतर भी बैठता है। ठीक नीचे मीर घाट पर विशालाक्षी हैं, जो काशी खंड की बताई नौ गौरी यात्रा में गिनी जाती हैं; घाट के पीछे के मोहल्ले में आदि वाराही का पुराना स्थान है। धरोहर-प्रलेखन इस स्थानीय रीत को सीधे दर्ज करता है: यात्री पहले त्रिपुर भैरवी घाट पर स्नान करते हैं और फिर वाराही देवी के दर्शन को जाते हैं — वाराही की ओर की सीढ़ियाँ दोनों में कम साफ़ रहती हैं।

उन्हीं सीढ़ियों पर सूर्य की स्मृति

यहाँ एक और पुरानी परत है, जिसे भक्त आज भी सँजोए हैं। घाट का पहले का नाम, वृद्धादित्य, काशी की द्वादश आदित्य परंपरा से आता है — वे बारह सूर्य-रूप, जिनमें परंपरा के अनुसार सूर्य ने नगरी में रहना स्वीकार किया। घाट के ऊपरी हिस्से में एक बड़े पीपल के नीचे पुरानी प्रतिमाएँ पंचायतन शैली में स्थापित हैं — बीच में शिवलिंग, चारों ओर शक्ति, विष्णु, गणेश और सूर्य। धरोहर-सर्वेक्षण इनमें से कई खंडों को बारहवीं-तेरहवीं सदी का बताते हैं। यह व्यवस्था काशी का सामान्य क्रम है: यहाँ एक देवता दूसरे को हटाता नहीं, पाँचों साथ पूजे जाते हैं।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

ये सीढ़ियाँ अपने वर्तमान नाम से पुरानी हैं। सत्रहवीं सदी की गीर्वाणपदमंजरी इन्हें वृद्धादित्य घाट कहती है, यहाँ स्थित सूर्यदेव की एक पुरानी प्रतिमा के कारण। अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में त्रिपुर भैरवी का मंदिर बना — राज्य पर्यटन विभाग का विवरण इसे उसी सदी में पुनर्निर्मित प्राचीन मंदिर बताता है — और घाट देवी के नाम से जाना जाने लगा।

बहुत समय तक घाट केवल आंशिक रूप से पत्थर का बना रहा। धरोहर-प्रलेखन मोतीचंद (1962) के हवाले से बताता है कि 1931 तक सीढ़ियों पर पत्थर की पटियाँ कहीं-कहीं ही लगी थीं। बीसवीं सदी के आरंभ में एक गिरि संन्यासी ने घाट को पूरी तरह पक्का कराया और ऊपर एक मठ बनवाया; धरोहर-अभिलेख उनका नाम महानंद गिरि बताते हैं और मठ का पता डी 5/100, जबकि उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग का विवरण दयानंद गिरि नाम देता है और मकान संख्या डी 51/100। दोनों विवरण नाम पर अलग हैं; कार्य और काल पर एक हैं।

1958 में उत्तर प्रदेश सरकार ने घाट की मरम्मत और पुनर्रचना कराई। उसी काम में दक्षिण की ओर का हिस्सा, आदि वाराही के प्राचीन स्थान के पास, पक्का करके अलग कर दिया गया — इसीलिए चौरासी घाटों की कुछ सूचियों में वाराही घाट को स्वतंत्र रूप से गिना जाता है। उस दक्षिणी छोर की पहचान स्वर्गीय कैलाश नाथ चौधरी का घर है, जो डोम राजा थे — धरोहर-प्रलेखन इस पद को "अंत्येष्टि के पुरोहितों का राजा" कहकर समझाता है, वह वंश जिसकी सेवा काशी के अंतिम संस्कार से जुड़ी है — और यह घर उन्हें बनारस के किसी राजा ने दिया था।

आज देख-रेख बँटी हुई है। घाट से लगी मंदिर-संपत्तियाँ मंदिर-न्यासों और मठों के पास हैं; घर उनके निवासियों के; और घाट स्वयं नगर निगम के अधीन। धरोहर-सर्वेक्षण बताते हैं कि न्यास अपनी संपत्तियों की जो देखभाल करते हैं, उससे आगे इन सीढ़ियों के लिए कोई विशेष संरक्षण योजना नहीं है।

त्रिपुरा भैरवी घाट — historic view

वास्तुकला

त्रिपुर भैरवी छोटा घाट है — धरोहर-सर्वेक्षण इसका क्षेत्रफल मध्य तट पर लगभग 0.167 हेक्टेयर बताते हैं — और पूरी तरह पक्का है; राज्य पर्यटन विभाग का विवरण इसे साफ़ और सुव्यवस्थित बताता है, जहाँ स्थानीय लोग स्नान करने आते हैं। जो इमारतें महत्व की हैं, वे सीढ़ियों के सिरे पर और पीछे की गली में हैं।

बीसवीं सदी के आरंभ में घाट पूरा कराने वाले गिरि संन्यासी का बनवाया मठ ऊपर खड़ा है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के विवरण में घाट पर त्रिपुरेश्वर और रुद्रेश्वर शिव मंदिरों का उल्लेख है, और जल तक उतरते रास्ते पर देवी त्रिपुर भैरवी का मंदिर है।

घाट पर सबसे पुरानी चीज़ सबसे सादी भी है। घाट के ऊपरी हिस्से में एक बड़े पीपल के नीचे पुरानी प्रतिमाएँ पंचायतन क्रम में स्थापित हैं — बीच में शिवलिंग, चारों ओर शक्ति, विष्णु, गणेश और सूर्य — और उनके पास एक छोटा मंदिर, जिसमें सूर्य की प्रतिमा है। धरोहर-प्रलेखन इनमें से कई खंडों को बारहवीं-तेरहवीं सदी का बताता है, और पास ही हनुमान तथा एक देवी की प्रतिमाओं वाले स्थान का उल्लेख करता है। ये खंडित पत्थर संग्रहालय में नहीं, पूजा में रखे गए हैं।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

यह स्नान-घाट है, और इसकी साधना नदी की साधना है। श्रद्धालु पहली रोशनी में स्नान के लिए आते हैं, जल में उतरने से पहले संकल्प लेते हैं, पितरों के लिए तर्पण करते हैं, और जल-किनारे मिट्टी के दीये, फूल तथा थोड़े दूध से गंगा-पूजन करते हैं। ऊपरी सीढ़ियों पर बैठे पंडे विधिवत पूजा कराने में सहयोग करते हैं।

घाट के सरकारी विवरण में लिखा है कि यहाँ मुंडन — बच्चे का पहला केश-संस्कार — और विवाह के संस्कार नियमित रूप से होते हैं, गंगा-पूजन के साथ। ये पारिवारिक संस्कार हैं, कोई सार्वजनिक आयोजन नहीं; ऐसे किसी क्षण से सामना हो तो परिवार को जगह देकर आगे बढ़ जाना ही शिष्टता है।

स्नान के बाद बहुत से लोग देवी के मंदिर में दर्शन करने चढ़ते हैं, और घाट पर स्थित त्रिपुरेश्वर तथा रुद्रेश्वर शिव मंदिरों में भी। कुछ आगे पीछे के मोहल्ले में आदि वाराही के पुराने स्थान तक जाते हैं; धरोहर-प्रलेखन बताता है कि यात्री पहले यहीं स्नान करते हैं और उसके बाद वह दर्शन करने जाते हैं। देवी को चढ़ाई जाने वाली वस्तुएँ काशी के किसी भी देवी-स्थान जैसी ही हैं — लाल फूल, चुनरी, सिंदूर, दीपक।

इन सीढ़ियों पर कोई औपचारिक गंगा आरती नहीं होती — वह भव्य संध्या आरती थोड़ी दूर ऊपर दशाश्वमेध पर है। यहाँ के मंदिरों के समय अनौपचारिक हैं; किसी छपे हुए समय-पत्रक पर भरोसा करने के बजाय घाट पर ही पूछ लेना बेहतर है।

उत्सव एवं पर्व

उत्सवकबभीड़
नवरात्रिदेवी के मंदिर पर सामान्य से अधिक
देव दीपावलीपूरे तट पर अत्यधिक
कार्तिक पूर्णिमा स्नानबहुत अधिक
गंगा दशहराअधिक
मकर संक्रांतिअधिक
नित्य गंगा स्नानभोर से लगातार

नवरात्रि: नवरात्रि पूरी काशी में देवी-उपासना का प्रमुख काल है। जो भक्त महाविद्या रूपों के माध्यम से देवी तक पहुँचते हैं, उनके लिए भैरवी का यह स्थान इन दिनों के लिए स्वाभाविक है।

देव दीपावली: परंपरा मानती है कि इस रात देवगण काशी में गंगा-स्नान के लिए उतरते हैं, और घाटों पर दीये उन्हीं के स्वागत में जलाए जाते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा स्नान: पुराण कार्तिक मास के स्नान की, और उसमें भी कार्तिक पूर्णिमा की, विशेष महिमा गाते हैं। अनेक परिवार पूरे मास नित्य गंगा-स्नान का कार्तिक व्रत रखते हैं।

गंगा दशहरा: भक्तों की मान्यता है कि इस दिन गंगा-स्नान विशेष रूप से पावन करता है; काशी में यह वर्ष के प्रमुख गंगा-उपासना दिनों में है।

मकर संक्रांति: सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण के आरंभ का पर्व; इस दिन स्नान और दान का विशेष पुण्य माना जाता है।

नित्य गंगा स्नान: किसी एक पर्व से अधिक यही रोज़ का उपयोग वह कारण है जिसके लिए यह घाट पक्का कराया गया था और जिसने इसे पूजा में बनाए रखा है।

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कैसे पहुँचें

घाट मध्य तट पर मान मंदिर घाट और मीर घाट के बीच है। पैदल आना सबसे सरल है — दशाश्वमेध से तट के किनारे प्रयाग, राजेंद्र प्रसाद और मान मंदिर घाट पार करते हुए कुछ ही मिनट का रास्ता। ऊपर से आना हो तो बाँसफाटक और विश्वनाथ गली से निकलती गलियाँ मीर घाट और इसी हिस्से की ओर उतरती हैं; गाड़ी गोदौलिया तक ही जाती है, आख़िरी हिस्सा पैदल है। नाव से आने पर मध्य घाटों पर चलने वाली कोई भी साझा या निजी नाव कहने पर यहाँ उतार देती है।

यात्रा की तैयारी

  • यह स्मारक नहीं, कार्यरत स्नान-घाट है — दिन भर शांत रहता है, सबसे अधिक चहल-पहल भोर में होती है।
  • यहाँ सीढ़ियाँ बड़े घाटों से सँकरी हैं, और जल के पास पत्थर वहाँ फिसलन भरा होता है जहाँ बरसात की गाद जमी हो। धीरे उतरें।
  • गंगाजल के लिए छोटा लोटा, बदलने के कपड़े, और सीढ़ियों पर मर्यादा से कपड़े बदलने के लिए एक चादर साथ रखें।
  • दीया, फूल, देवी के लिए चुनरी और दक्षिणा के लिए खुले पैसे रखें।
  • ऊपरी सीढ़ियों पर बैठे पंडे संकल्प, तर्पण या गंगा-पूजन कराने का प्रस्ताव देंगे। दक्षिणा पहले तय कर लें; विनम्रता से मना कर देना भी पूरी तरह ठीक है।
  • देवी के मंदिर और पीछे वाराही के स्थान पर दर्शन करना हो तो चढ़ने से पहले वहीं पूछ लें — छोटे मंदिरों के समय बँधे हुए नहीं होते।
  • ऊपर मान मंदिर घाट और नीचे मीर घाट पर विशालाक्षी — तीनों थोड़ी-सी पैदल दूरी पर हैं, एक ही फेरे में हो जाते हैं।

सबसे अच्छा समय

भोर से लगभग नौ बजे तक घाट सबसे भावपूर्ण और सबसे कम भीड़-भरा रहता है। मौसम की दृष्टि से अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल है। चैत्र और आश्विन की नवरात्रि में देवी के मंदिर पर सबसे बड़ी भीड़ जुटती है; कार्तिक — और उसमें भी कार्तिक पूर्णिमा तथा देव दीपावली — पूरे तट को दीयों से भर देती है और भीड़ भी बहुत बड़ी होती है। बरसात में गंगा निचली सीढ़ियों के ऊपर चढ़ आती हैं और घाट का उपयोग-योग्य हिस्सा काफ़ी घट जाता है; उन दिनों जल में उतरने से पहले स्थानीय सलाह ज़रूर लें।

स्थान

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Varanasi, UP

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सामुदायिक सुधार

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