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विजयनगरम् घाट

Varanasi, UP

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सत्यापित · पिछली समीक्षा 5 महीने पहले

काशी की तट-रेखा के दक्षिणी भाग पर, लाली घाट और केदार घाट के बीच बसा एक स्नान-घाट, जो उस केदार खंड के चरणों में है जिसे परंपरा केदारेश्वर के अधीन मानती है। धरोहर-अभिलेख बताते हैं कि विजयनगरम के राजा ने 1890 में केदार घाट के इस निचले भाग को पक्का कराया और यहाँ दक्षिण भारतीय शैली का एक छोटा महल बनवाया, जो आगे चलकर स्वामी करपात्री जी को अर्पित हुआ और आज भी उनका आश्रम है। घाट के पश्चिमी छोर पर छोटे शिव-मंदिर हैं, और यहाँ स्नान करने वाले अधिकांश श्रद्धालु सीढ़ियाँ चढ़कर केदारेश्वर के दर्शन को जाते हैं।

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विजयनगरम घाट काशी की तट-रेखा के दक्षिणी विस्तार पर, लाली घाट और केदार घाट के बीच पड़ता है — उस मोहल्ले के चरणों में जिसे परंपरा केदार खंड कहती है। इसकी शुरुआत केदार घाट के निचले हिस्से के रूप में हुई थी, जिसे उन्नीसवीं सदी में अलग कर पक्का किया गया; जल से देखने पर आज भी दोनों एक ही लंबी पत्थर-श्रेणी लगते हैं, और श्रद्धालु उन्हें एक ही मार्ग की तरह बरतते हैं — नीचे जल में स्नान, ऊपर केदारेश्वर का दर्शन।

नाम एक दक्षिण भारतीय राजघराने की स्मृति है। विजयनगरम — आज की वर्तनी में विजयनगरम् (Vizianagaram), आंध्र प्रदेश में — पुसपति गजपति राजू परिवार की रियासत है, और यह घाट उन्हीं के संरक्षण का स्मारक है, हम्पी वाले मध्यकालीन विजयनगर साम्राज्य का नहीं। किसी तेलुगु घराने का गंगा-तट पर पत्थर रखना कोई अनोखी बात नहीं, यही काशी का साधारण स्वभाव है: इस नगरी का तट भारत की हर दिशा के घरानों ने उठाया, ताकि उनके लोग मोक्ष-क्षेत्र में स्नान कर सकें, ठहर सकें और यहीं देह छोड़ सकें। धरोहर-अभिलेख बताते हैं कि यहाँ बना छोटा महल दक्षिण भारतीय वास्तु-शैली में उठाया गया था — बनारसी दीवार में जड़ा हुआ एक दक्खिनी व्याकरण।

आज यह घाट शांत है और बरता जाता है, और यही इसका विशेष वरदान है। यह एक कार्यरत स्नान-घाट है, बीच की भीड़-भरी तट-रेखा के दबाव से मुक्त। भक्त भोर से पहले स्नान और तर्पण के लिए उतरते हैं, साधु और आश्रमवासी ऊपरी सीढ़ियों पर बैठे रहते हैं, और ठीक उत्तर में केदार घाट का लाल-सफ़ेद पत्थर उठ खड़ा होता है। पश्चिमी छोर पर, गली के पास, वे छोटे शिव-मंदिर हैं जिन्हें धरोहर-अभिलेख निष्पनेश्वर और नीलकंठ नाम से दर्ज करते हैं; उनके पीछे वह भवन है जो बहुत पहले स्वामी करपात्री जी को अर्पित हुआ और आज भी आश्रम है — इसलिए यह घाट केवल एक स्नान-पंक्ति नहीं, संन्यास की एक जीवंत पीठ भी वहन करता है।

विजयनगरम् घाट
विजयनगरम् घाट, Varanasi, UP

इस घाट का महत्व इस बात में है कि यह कहाँ खड़ा है। परंपरा काशी को खंडों में बाँटती है, और दक्षिणी खंड केदार खंड है, जिसके अधिपति केदारेश्वर हैं। स्थल के धरोहर-अभिलेख दर्ज करते हैं कि ऊपर केदारेश्वर मंदिर में पूजित लिंग हिमालय के केदारनाथ लिंग का स्वरूप माना जाता है और वाराणसी के ज्योति-लिंगों में गिना जाता है। भक्तजन मानते हैं कि जो पर्वत-यात्रा नहीं कर सकते, उन्हें केदारनाथ का दर्शन यहीं प्राप्त हो जाता है।

यहाँ की चली आ रही रीति घाट और मंदिर को एक साथ बाँध देती है। श्रद्धालु सीढ़ियों पर गंगा-स्नान करते हैं, और केदारेश्वर की परंपरा यह है कि दर्शन से पहले मंदिर से लगे गौरी कुंड में स्नान किया जाए। इसलिए अनेक भक्तों के लिए विजयनगरम घाट एक छोटी किंतु पूर्ण यात्रा का पहला चरण है: पहले नदी, फिर कुंड, अंत में लिंग।

इससे आगे इसकी पवित्रता स्वयं गंगा की पवित्रता है। बनारसी भक्ति-दृष्टि मानती है कि काशी में गंगा उत्तरवाहिनी हो जाती हैं, और असी से आदि केशव तक का पूरा चाप अलग-अलग तीर्थों की माला नहीं बल्कि एक अखंड तीर्थ है — इसलिए संकल्प और श्रद्धा के साथ किसी शांत सीढ़ी पर लिया गया स्नान उसी पावन जल का स्नान है जो किसी प्रसिद्ध घाट पर है। बनारस विजयनगरम घाट से कोई अलग कथा नहीं जोड़ता, और उसके लिए कोई कथा गढ़ी भी नहीं जानी चाहिए; इसके पास स्थिति है, जल है, मंदिर हैं और आश्रम है — और तीर्थयात्री के लिए यह कम नहीं।

घाट पर बसा आश्रम

घाट के धरोहर-अभिलेख दर्ज करते हैं कि विजयनगरम घराने ने आगे चलकर यहाँ बना यह महल स्वामी करपात्री जी को अर्पित कर दिया, जिन्होंने उसे अपना निवास बनाया और जीवन का बड़ा भाग वहीं बिताया; इसी कारण वह स्वामी करपात्री आश्रम कहलाता है। स्वामी करपात्री (1907–1982), जिनका संन्यास-नाम स्वामी हरिहरानंद सरस्वती था, दशनामी परंपरा के संन्यासी और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती के शिष्य थे। उन्होंने 1940 में धर्म संघ की स्थापना की, वेदांत और धर्म पर विपुल लेखन किया, और जीवन का अधिकांश काल वाराणसी में बिताया, जहाँ उनका देहावसान हुआ। उस परंपरा के भक्तों के लिए इस आश्रम की उपस्थिति इन सीढ़ियों को वह भार देती है जिसका घाट के आकार से कोई संबंध नहीं।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

यहाँ का पत्थर केदार घाट से निकली हुई शाखा है। वाराणसी के घाटों के धरोहर-अभिलेख दर्ज करते हैं कि केदार घाट के निचले भाग को अलग से पक्का करके और दक्षिण भारतीय वास्तु-शैली में एक छोटा महल बनवाकर विजयनगरम के राजा ने 1890 में घाट के रूप में विकसित किया — और उसी संरक्षण से घाट को उसका नाम मिला।

घराने के किस शासक ने और किस दशक में, इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं। विजयनगरम राजपरिवार के अपने न्यास-अभिलेख पुसपति नारायण गजपति राजू (1786–1845) का स्मरण करते हैं, जिन्होंने अपने जीवन का बड़ा भाग वाराणसी में बिताया, और कहते हैं कि केदार घाट तथा विजयनगरम घाट वाराणसी में विजयनगरम के महाराजा द्वारा उन्नीसवीं सदी में बनवाए गए; धरोहर-दस्तावेज़ विशेष रूप से 1890 का वर्ष देता है, जो इसी घराने के किसी परवर्ती शासक के काल में पड़ेगा। दोनों विवरणों में जो समान है और विवाद से परे है, वह यह कि यह घाट आंध्र के विजयनगरम महाराजाओं की देन है।

औपनिवेशिक काल की आरंभिक सूचियों में घाट एक भिन्न नाम से भी मिलता है: ग्रीव्ज़ ने 1909 में इसे इजानगर घाट लिखा है, जो संभवत: विजयनगरम का ही अपभ्रंश है। 1958 में उत्तर प्रदेश सरकार ने घाट का निर्माण एवं जीर्णोद्धार कराया — उसी वर्ष जब सटे हुए केदार घाट को उसका वर्तमान पक्का स्वरूप मिला — और आज यात्री जिन सीढ़ियों पर उतरते हैं वे मुख्यत: उसी काम की हैं।

ऊपर का महल रियासती हाथों से धार्मिक हाथों में तब गया जब वह स्वामी करपात्री जी को अर्पित होकर आश्रम बना, और आज भी न्यास की देखरेख में है। घाट स्वयं नगर निगम के अधीन है, जबकि उसके ऊपरी छोर की बनी हुई संपत्तियाँ स्वामी करपात्री न्यास, स्वामी भूमानंद न्यास और निजी निवासियों के पास हैं — यह बँटी हुई देखरेख ही कारण है कि यहाँ संरक्षण असमान रहा है।

विजयनगरम् घाट — historic view

वास्तुकला

घाट बनारसी पत्थर की एक सादी और ईमानदार श्रेणी है: चरणों में जल तक उतरती सीढ़ियाँ, बीच-बीच में चबूतरे जहाँ स्नानार्थी कपड़े रखते हैं और साधु दिन भर बैठते हैं। बीच की तट-रेखा के महल-घाटों जैसी अलंकृत मुख-रचना यहाँ नहीं है — दृष्टि नदी पर जाती है, और ठीक उत्तर में उठते केदार घाट के लाल-सफ़ेद धारीदार पत्थर पर, जिसे धरोहर-अभिलेख के अनुसार उसी लाल-सफ़ेद धारी से दूर से पहचाना जा सकता है।

निर्मित रूप में विशिष्ट वस्तु ऊपर का छोटा महल है, जिसे धरोहर-अभिलेख दक्षिण भारतीय वास्तु-शैली में बना बताते हैं। इस तट पर यह असामान्य है। बनारस के बड़े नदी-तटीय भवन प्राय: मराठा, राजपूत और बंगाली व्याकरण के हैं, और उनके बीच एक दक्खिनी मुहावरा इस बात का सीधा वास्तुगत अभिलेख है कि इस घाट का व्यय किसने उठाया और वे कहाँ से आए थे। यह भवन आज स्वामी करपात्री आश्रम है, और इसे घूमने योग्य स्मारक नहीं, संन्यासियों का निवास समझा जाना चाहिए।

घाट के पश्चिमी छोर पर, पीछे जाती गली के पास, वे दो छोटे मंदिर हैं जिन्हें धरोहर-अभिलेख निष्पनेश्वर और नीलकंठ नाम से दर्ज करते हैं। ये उसी प्रकार की विनम्र रचनाएँ हैं जो पूरे काशी-तट पर पंक्तिबद्ध मिलती हैं — एक लिंग, एक छोटा गर्भ-घेरा, एक दीपक — और ये प्रदर्शन के लिए नहीं, पूजा के लिए हैं।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

यह स्नान-घाट है और इसकी साधना आयोजनपरक नहीं, नित्य है। यहाँ अपनी कोई आरती नहीं होती और न कोई संगठित संध्या-अनुष्ठान।

सूर्योदय से पहले भक्त गंगा स्नान के लिए उतरते हैं, जल की ओर मुख कर संकल्प लेते हैं, और गंगाजल तथा कुश से पितरों को तर्पण अर्पित करते हैं। इसके बाद अनेक लोग केदारेश्वर की ओर चढ़ते हैं, मंदिर से लगे गौरी कुंड में स्नान करने की परंपरा निभाते हुए दर्शन में प्रवेश करते हैं, और लिंग पर बिल्वपत्र तथा गंगाजल अर्पित करते हैं। घाट के पश्चिमी छोर के छोटे मंदिरों को गली की साधारण नित्य पूजा मिलती है — जल, पुष्प, एक दीपक।

कार्तिक मास भर कार्तिक-व्रत धारण करने वाले यहाँ प्रतिदिन प्रात: स्नान करते हैं, और घाट-पंक्ति पर वैसे ही दीप उठाए जाते हैं जैसे पूरे बनारस में। संध्या को मिट्टी के दीये धारा पर छोड़े जाते हैं। ऊपर का आश्रम संन्यास की अपनी लय में चलता है; यात्री उसे देखने की वस्तु नहीं, निजी साधना समझें। केदारेश्वर के दर्शन का समय उसी दिन मंदिर पर पूछकर निश्चित कर लेना सबसे उचित है।

उत्सव एवं पर्व

उत्सवकबभीड़
महाशिवरात्रिऊपर मंदिर पर बहुत अधिक; घाट स्वयं चलने योग्य बना रहता है
श्रावण सोमवारमास भर सोमवारों को अधिक
कार्तिक पूर्णिमा और कार्तिक स्नानमास भर अधिक, पूर्णिमा पर बहुत अधिक
देव दीपावलीबहुत अधिक, किंतु मध्य के घाटों से शांत
गंगा दशहराअधिक
मकर संक्रांतिअधिक

महाशिवरात्रि: परंपरा महाशिवरात्रि को शिव-कृपा की रात्रि मानती है, और इस रात काशी के किसी लिंग पर किया गया अभिषेक विशेष पुण्यदायी कहा गया है। केदार खंड इसे विशेष भाव से मनाता है, क्योंकि केदारेश्वर इस खंड के अधिपति हैं।

श्रावण सोमवार: श्रावण शिव को सबसे प्रिय मास माना गया है और उसके सोमवार अभिषेक के लिए सबसे शुभ दिन। गंगा से भरा जल सीधे लिंग पर अर्पित करना अर्पण का सबसे सरल और सबसे प्रिय रूप है।

कार्तिक पूर्णिमा और कार्तिक स्नान: पुराण कार्तिक मास में गंगा-तीर्थ पर स्नान को महान पुण्यदायी कहते हैं, और कार्तिक पूर्णिमा इस मास का सबसे शुभ स्नान-दिवस मानी जाती है।

देव दीपावली: परंपरा मानती है कि इस रात देवता काशी में गंगा-स्नान के लिए उतरते हैं और घाटों के दीये उन्हीं के स्वागत में जलाए जाते हैं। भक्तजन इस दिन को त्रिपुरासुर पर शिव की विजय से भी जोड़ते हैं।

गंगा दशहरा: परंपरा कहती है कि इस दिन गंगा-तीर्थ पर स्नान दस प्रकार के पापों को हर लेता है — वही दश-पाप जिनसे पर्व का नाम बना है।

मकर संक्रांति: सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण के आरंभ का चिह्न। इस दिन गंगा-तीर्थ पर स्नान और दान विशेष पुण्यदायी माने गए हैं।

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कैसे पहुँचें

सामान्य रास्ता सोनारपुरा या केदार घाट की ओर की गलियों से है — केदारेश्वर मंदिर के पास से उतरकर, फिर सीढ़ियों-सीढ़ियों दक्षिण। केदार घाट का लाल-सफ़ेद धारीदार पत्थर ही स्थलचिह्न है, और विजयनगरम उसी के ठीक नीचे और आगे पड़ता है। अस्सी घाट से तट के सहारे सीधी उत्तर की चाल है, और दशाश्वमेध से दक्षिण की। जल-मार्ग से कोई भी नाव आपको इन सीढ़ियों पर उतार देगी। घाट तक कोई वाहन नहीं आता; अंतिम हिस्सा सदा पैदल ही है।

क्या अपेक्षा रखें

यह शांत, स्थानीय घाट है, और यही इसका स्वभाव है — स्नान करते लोग, आश्रमवासी, ऊपरी सीढ़ियों पर बैठे साधु, कुछ नावें। यहाँ न कोई आयोजित समारोह है, न टिकट वाला दर्शन-स्थल। जल-रेखा के पास सीढ़ियाँ फिसलन भरी रहती हैं और वर्षा-ऋतु में डूब जाती हैं, तब स्नान की पंक्ति ऊपर खिसक आती है और धार तेज़ रहती है। ऊपर का आश्रम धार्मिक निवास है, घूमने की धरोहर-इमारत नहीं; भीतर न जाएँ।

आने का सर्वोत्तम समय

काशी यात्रा के लिए अक्टूबर से मार्च सबसे अनुकूल ऋतु है। पहली किरण से लगभग नौ बजे तक का समय घाट का सबसे भक्तिमय समय है, और यहाँ के स्नान को केदारेश्वर के दर्शन से जोड़ने की भी यही स्वाभाविक घड़ी है। कार्तिक में ये सीढ़ियाँ मास-पर्यंत स्नान से हर सुबह भरी रहती हैं, और महाशिवरात्रि तथा श्रावण के सोमवारों पर केदारेश्वर की ओर भीड़ चढ़ती है। यदि आपका उद्देश्य एक शांत स्नान और नदी, कुंड तथा लिंग की छोटी-पूर्ण यात्रा है, तो पर्व-सप्ताहों से हटकर किसी कार्यदिवस की भोर सर्वोत्तम है।

स्थान

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