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योगमाया मंदिर (महरौली)

South Delhi, DL

temple
सत्यापित · पिछली समीक्षा 1 महीने पहले

महरौली का योगमाया मंदिर दिल्ली के सबसे पुराने जीवित देवालयों में है — देवी योगमाया को समर्पित, जिन्हें परंपरा श्रीकृष्ण की बहन के रूप में पूजती है। यह क़ुतुब मीनार से कुछ ही क़दम की दूरी पर है, और स्थानीय अभिलेख इसे सल्तनत-पूर्व दिल्ली का एकमात्र ऐसा मंदिर मानते हैं जिसमें पूजा अखंड चलती आई है।

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योगमाया मंदिर पुरानी महरौली के हृदय में, क़ुतुब परिसर से कुछ मिनट की पैदल दूरी पर है। गर्भगृह छोटा है और उन्नीसवीं शताब्दी के पुनर्निर्माण की रीति में संगमरमर-मंडित; उसके केंद्र में, संगमरमर के घेरे में नीचे स्थापित, देवी योगमाया का काले पत्थर का विग्रह है — वे देवी जिन्हें परंपरा श्रीकृष्ण की बहन मानती है: यशोदा की वह पुत्री जो नवजात कृष्ण से बदली गई, कंस के हाथ से छूटकर आकाश में प्रकट हुई, और उसके काल के आगमन की घोषणा कर गई।

परंपरा इस देवालय को बहुत लंबी स्मृति देती है। स्थानीय मान्यता इसका मूल पांडवों तक ले जाती है, और महरौली क्षेत्र का पुराना नाम — योगिनीपुरा, "योगिनी की नगरी" — इसी मंदिर से निकला माना जाता है। स्थल की जो भी प्राचीनता कही जाए, वर्तमान देवालय का अभिलेख स्वयं विलक्षण है: महरौली के दस्तावेज़ इसे सल्तनत-पूर्व दिल्ली का एकमात्र मंदिर बताते हैं जो निरंतर पूजा में बना रहा।

मंदिर का सबसे प्रिय उत्सव फूल वालों की सैर में उसकी भूमिका है — दिल्ली के फूल-विक्रेताओं का उत्सव: हर शरद में फूलों के पंखे यहाँ देवी को और निकट ही हज़रत क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी की दरगाह को अर्पित होते हैं — एक ही शोभायात्रा दोनों का मान करती है, पुरानी दिल्ली के साझा जीवन की जीवित परंपरा। नवरात्र में मंदिर भर जाता है; सामान्य दिनों में यह संसार के एक महान स्मारक के पास देवी-पूजा का शांत, गहरा स्थानीय स्थान है।

योगमाया मंदिर (महरौली)
योगमाया मंदिर (महरौली), South Delhi, DL

योगमाया महामाया हैं — प्रभु की अपनी लीला और आवरण की शक्ति रूप में देवी। कृष्ण-कथा में वे वही शिशु हैं जिन्होंने मथुरा की कारागार में उनका स्थान लिया: कंस ने जब उन्हें पकड़ा, वे उसके हाथ से छूटकर अष्टभुजा देवी रूप में प्रकट हुईं और घोषणा की कि उसका संहारक सुरक्षित पहुँच चुका है। योगमाया की पूजा उस शक्ति को प्रणाम है जिसकी सम्मति से हर दिव्य कार्य छिपता और प्रकट होता है।

तीर्थयात्री के लिए महरौली का यह देवालय दो दुर्लभ बातें जोड़ता है: कृष्ण-चरित की देवी की स्वतंत्र पूजा, और एक ही स्थल पर शताब्दियों में गिनी जाने वाली पूजा-निरंतरता। फूल वालों की सैर का पंखा-अर्पण तीसरी बात जोड़ता है: एक उत्सव जिसमें मंदिर और पड़ोसी दरगाह एक ही शोभायात्रा से सम्मानित होते हैं — साझा श्रद्धा की दिल्ली की सबसे पुरानी भंगिमा के केंद्र में देवी का यह देवालय।

सत्यापित आध्यात्मिक महत्व

इतिहास

परंपरा यहाँ योगमाया-देवालय की स्थापना पांडव-युग से जोड़ती है, और क्षेत्र का मध्यकालीन नाम योगिनीपुरा इसी मंदिर की छाप माना जाता है। महरौली के अपने अभिलेख इस देवालय को सल्तनत-पूर्व दिल्ली का एकमात्र ऐसा मंदिर बताते हैं जो निरंतर पूजा में बचा रहा — नगर के स्वामी बदलते रहे, देवालय फिर-फिर बनता रहा।

वर्तमान संरचना मुख्यतः उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ की है, जब मुग़ल बादशाह अकबर द्वितीय के काल में लाला सेठमल ने इसका पुनर्निर्माण कराया। इसी युग से मंदिर का फूल वालों की सैर से नाता है — अकबर द्वितीय के काल में आरंभ हुई फूल-विक्रेताओं की शोभायात्रा, जिसमें फूलों के पंखे इस मंदिर और बख़्तियार काकी की दरगाह — दोनों को चढ़ते हैं। यह उत्सव बीच में रुका और स्वतंत्रता के बाद पुनर्जीवित होकर प्रतिवर्ष चलता है।

योगमाया मंदिर (महरौली) — historic view

वास्तुकला

मंदिर बनारसी देवी-तीर्थों की उसी शान्त शैली में बना है — एक सघन गर्भगृह जिसमें योगमाया का विग्रह विराजमान है, बाहर एक मंडप जहाँ दिन-भर के अर्पण रखे जाते हैं, और एक छोटी कोठरी जहाँ छोटे बच्चों को देवी के सम्मुख रखा जाता है। इस तीर्थ की शक्ति आकार में नहीं, समीपता में है; भक्त किसी भव्य द्वार से नहीं, पुराने शहर की दैनिक गलियों से होकर माँ के पास पहुँचता है।

विग्रह योगमाया की पारंपरिक प्रतिमा-शैली में है — खड़ा अष्टभुजा रूप, खड्ग, त्रिशूल, शंख, चक्र, कमल और धनुष धारण किए, अभय-मुद्रा में उठा हुआ हाथ, और एक चरण ऐसा संतुलित जैसे कंस की पकड़ से छूटकर अभी आकाश में उठी हों। देवी को तिथि के अनुसार वस्त्र पहनाए जाते हैं — मंगल और शुक्रवार को लाल, गुरुवार को पीला उनके कृष्ण-भगिनी रूप के लिए, और सोमवार को श्वेत।

द्वार-पाटी पर अष्टभुजा देवी की आकृति उकेरी है। मंडप की छत पर शैलीकृत कृष्ण-कथा का दृश्य है — बाढ़ में बहती यमुना, वसुदेव के हाथों में डलिया, और शेषनाग का फण — जो दर्शन के क्षण भक्त को कथा के भीतर ले जाता है। फर्श की शिला पीढ़ियों के नंगे पाँवों से काली पड़ चुकी है, और जहाँ शिशुओं को रखा जाता है वह छोटी कोठरी असंख्य प्रथम-आशीर्वादों की सौम्य घिसाई संजोए हुए है।

अनुष्ठान एवं परंपराएँ

योगमाया मंदिर की उपासना बनारसी देवी-तीर्थ की लय में चलती है, इस रूप के लिए कुछ विशेष परंपराओं के साथ। समय बदल सकते हैं; भक्तों से अनुरोध है कि वर्तमान समय मंदिर अधिकारियों से पुष्ट कर लें, विशेषकर जन्माष्टमी और नवरात्रि के समय जब तीर्थ अपने चरम पर होता है।

दिन की शुरुआत भोर से पहले मंगला आरती से होती है, जब देवी को जगाया जाता है। फिर पंचामृत अभिषेक होता है; मूर्ति को नए वस्त्र पहनाकर ताज़े पुष्पों से शृंगारित किया जाता है — भक्त प्रायः लाल गुलाब और गुड़हल लाते हैं — और दिन की पूजा भोग, संध्या आरती और शयन के क्रम में पूर्ण होती है।

यहाँ की कुछ विशेष परंपराएँ भक्तों को अत्यंत प्रिय हैं:

  • बाल-आशीर्वाद। माता-पिता शिशुओं और छोटे बच्चों को थोड़ी देर के लिए देवी के सम्मुख रखते हैं — प्रथम दर्शन या वार्षिक आशीर्वाद के लिए। शिशु कृष्ण की रक्षक के रूप में योगमाया की भूमिका इसे इस तीर्थ की सबसे प्रिय सेवा बनाती है।
  • माया-विमोचन संकल्प। इस तीर्थ का विशेष व्रत — मिथ्या प्रतीति को हटाने की प्रार्थना के रूप में। भक्त एक निश्चित दिन-संख्या (प्रायः 21 या 41) के लिए यह संकल्प धारण करते हैं, आरंभ और समापन के दिन तीर्थ पर एक छोटी योगमाया-स्तुति पढ़ते हैं और बीच के दिनों में घर पर नित्य।
  • कृष्ण-योगमाया युगल दर्शन। अनेक कृष्ण-भक्त इस तीर्थ की यात्रा काशी के किसी कृष्ण-संबंधी मंदिर के साथ, या आगामी मथुरा-वृन्दावन यात्रा की योजना के साथ करते हैं, और भाई-बहन के बंधन को यात्रा का भीतरी सूत्र मानते हैं।
  • अष्टमी पालन। प्रत्येक पक्ष की चन्द्र अष्टमी और स्वयं कृष्ण जन्माष्टमी — दोनों यहाँ विशेष रूप से मनाई जाती हैं; जन्माष्टमी पर तो योगमाया का उसी रात का जन्म पाठ में स्मरण होता है।
  • मंगलवार और शुक्रवार। पारंपरिक देवी-दिन यहाँ मनाए जाते हैं; संध्या आरती विस्तृत होती है, और लाल पुष्प प्रिय अर्पण हैं।

योगमाया को प्रिय अर्पण —

  • लाल पुष्प — गुड़हल और गुलाब
  • कुमकुम, सिंदूर और हल्दी
  • छोटी लाल या पीली चुनरी
  • मिठाई, विशेषकर लड्डू और पेड़ा

उत्सव एवं पर्व

उत्सवकबभीड़
कृष्ण जन्माष्टमीअत्यधिक
शरद नवरात्रिअधिक
चैत्र नवरात्रिमध्यम से अधिक
अष्टमी (प्रत्येक पक्ष)मध्यम
राधाष्टमीमध्यम से अधिक
कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली)मध्यम

कृष्ण जन्माष्टमी: तीर्थ का वार्षिक चरम। योगमाया परंपरा के मूल क्षण का स्मरण होता है, और भक्त मानते हैं कि उनकी उपस्थिति इस रात्रि सबसे सुलभ होती है।

शरद नवरात्रि: प्रमुख नवरात्रि, जब योगमाया दिव्य माँ के अबाध रूपों में से एक के रूप में पूजी जाती हैं।

चैत्र नवरात्रि: दूसरी प्रमुख नवरात्रि, यहाँ भी उसी आदर से मनाई जाती है।

अष्टमी (प्रत्येक पक्ष): पाक्षिक देवी-तिथि। योगमाया के लिए अष्टमी तिथि जन्माष्टमी की मासिक प्रतिध्वनि का अतिरिक्त भाव वहन करती है।

राधाष्टमी: कृष्ण-भक्त प्रायः इस दिन को जन्माष्टमी यात्रा के साथ जोड़ देते हैं, और दोनों को एक ही फेरे में धारण करते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली): कार्तिक की पूर्णिमा को यहाँ बच्चों के आशीर्वाद की परंपरा के लिए विशेष मांगलिक माना जाता है।

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दर्शन-मार्ग और काशी-संदर्भ

योग माया मंदिर काशी के पुराने केंद्रीय क्षेत्र में स्थित है। विश्वनाथ धाम से गली-मार्ग से बारह-पंद्रह मिनट की पैदल दूरी पर; ऑटो-रिक्शा गली के बाहरी छोर तक आ सकती है और आगे थोड़ी पैदल यात्रा है। स्थानीय लोग इसे "योग माया मंदिर" और "योगमाया" दोनों नामों से जानते हैं। अनेक भक्त विश्वनाथ दर्शन के बाद इस तीर्थ को काशी यात्रा का अंग बनाते हैं, या काशी के कृष्ण-संबंधी मंदिरों के साथ इसे जोड़ देते हैं ताकि भाई-बहन का बंधन एक ही फेरे में पूरा हो जाए।

यात्रियों के लिए तैयारी

  • शालीन, सुविधाजनक वस्त्र पहनें; अनेक स्त्रियाँ देवी के सम्मुख दुपट्टे से सिर ढकती हैं।
  • प्रवेश से पहले चमड़े की वस्तुएँ (जूते, बेल्ट, बटुए) उतार दें।
  • यदि छोटे बच्चे को आशीर्वाद के लिए ला रहे हैं, तो थोड़ा अधिक समय रखें; पुजारी एक छोटा-सा आशीर्वाद-विधि सम्पन्न कराते हैं, और यहाँ के नियमित भक्त तथा पुजारी छोटे बच्चों के प्रति बहुत कोमल हैं।
  • यदि माया-विमोचन संकल्प लेना हो, पहली ही यात्रा पर पुजारी से कह दें; समापन-पाठ अंतिम दिन तीर्थ पर ही होता है।
  • कृष्ण-योगमाया युगल दर्शन के लिए, योगमाया का दर्शन पहले रखें — परंपरा कहती है कि बड़ी बहन की कृपा भाई के दर्शन की उचित तैयारी है।
  • यदि परंपरागत अर्पण करना चाहें तो लाल पुष्प, कुमकुम या छोटी चुनरी साथ लाएँ; दक्षिणा के लिए छोटे नोट साथ रखें।
  • विग्रह की फोटोग्राफी वर्जित है; मंडप की छत की कृष्ण-कथा आकृति को शान्त अनुमति के साथ देखा जा सकता है।

आने का सर्वोत्तम समय

मंगलवार और शुक्रवार साप्ताहिक देवी-दिन हैं; प्रत्येक पक्ष की अष्टमी यहाँ विशेष रूप से पावन मानी जाती है। कृष्ण जन्माष्टमी (अगस्त के अंत / सितंबर का प्रारंभ) यहाँ का वार्षिक चरम है — कृष्ण के जन्म और योगमाया के उसी-रात के जन्म का एक साथ स्मरण होता है, और तीर्थ संध्या से प्रात:काल तक भरा रहता है। शरद नवरात्रि (सितंबर-अक्टूबर) और चैत्र नवरात्रि (मार्च-अप्रैल) विस्तृत पूजाओं के साथ मनाई जाती हैं। यात्रा के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे अनुकूल है, और प्रात:काल या संध्या आरती सबसे शान्त दर्शन के क्षण हैं।

स्थान

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