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वाराणसी में देव दीपावली — जब दस लाख दीपों से घाट जगमगा उठते हैं

·16 April 2026·5 मिनट पठन

देव दीपावली क्या है?

देव दीपावली — शब्दशः "देवताओं की दिवाली" — भारत के सबसे अद्भुत उत्सवों में से एक है। कार्तिक पूर्णिमा की रात (दिवाली के ठीक पंद्रह दिन बाद आने वाली पूर्ण चंद्र-रात्रि) मनाया जाने वाला यह उत्सव पूरे देश में सिर्फ़ और सिर्फ़ वाराणसी का है।

मान्यता है कि इसी रात देवता स्वयं स्वर्ग से उतरकर काशी के घाटों पर आते हैं — पवित्र गंगा में स्नान करने और अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव मनाने। उनके स्वागत में बनारस के लोग दस लाख से भी ज़्यादा मिट्टी के दीये जलाते हैं — असी घाट से लेकर उत्तर के राजघाट तक, हर घाट की हर सीढ़ी पर।

हज़ारों दीयों से जगमगाते वाराणसी के घाट देव दीपावली की रात

पूरा छह किलोमीटर लंबा तट आग की एक बहती हुई नदी बन जाता है, और गंगा उसका दर्पण। अतिशयोक्ति नहीं — यह भारत की सबसे नयनाभिराम रात है, और दुनिया में सबसे अधिक कैमरों में क़ैद होने वाले दृश्यों में से एक।

2026 में देव दीपावली कब है?

देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा को पड़ती है — कार्तिक मास की पूर्णिमा की रात। 2026 में यह मंगलवार, 24 नवंबर को है (ठीक तारीख़ पंचांग पर निर्भर करती है, आमतौर पर दिवाली के पंद्रह दिन बाद)।

छोटी सलाह: मुख्य आयोजन पूर्णिमा की रात होता है, मगर तैयारियाँ और छोटे-छोटे दीप-जलाव दो-तीन दिन पहले से शुरू हो जाते हैं। अगर आप थोड़ा पहले पहुँच जाएँ, तो स्वयंसेवकों को घंटों लगाकर दस लाख दीये क़रीने से सजाते देख पाएँगे — यह दृश्य अपने-आप में अद्भुत है।

क्या-क्या होगा — घंटे-दर-घंटे

यह उत्सव किसी सावधानी से सँजोई गई कथा की तरह खुलता है। एक आम देव दीपावली की शाम कुछ यूँ बीतती है:

शाम 4:30 बजे — घाटों पर हलचल शुरू। स्वयंसेवक थालियों में दीये लिए हर सीढ़ी पर क़तार से रखते जाते हैं। हवा में सरसों के तेल और धूप की गंध घुलने लगती है।

शाम 5:00 बजे — पहला दीया जलता है। दशाश्वमेध घाट से शुरू होकर हज़ारों हाथ एक साथ दीये रोशन करते हैं। एक-एक करके घाट सुनहरी आभा से भर उठते हैं।

देव दीपावली की रात वाराणसी में जला हुआ मिट्टी का दीया

शाम 6:00 बजे — दशाश्वमेध घाट पर भव्य गंगा आरती शुरू होती है। इस ख़ास रात सामान्य सात के बजाय इक्कीस पुरोहित आरती करते हैं, जिससे इसका वैभव कई गुना बढ़ जाता है। कई किलो वज़न की पीतल की दीपमालाएँ, शंखनाद, घंटों की गूँज और मंत्रोच्चार — सब मिलकर एक ऐसा वातावरण रचते हैं जो भूलना असंभव है।

शाम 7:00 बजे — हज़ारों फूल और जलते हुए दीये गंगा में प्रवाहित किए जाते हैं। जहाँ तक नज़र जाए, नदी काँपती हुई रोशनियों का दर्पण बन जाती है।

शाम 7:30 से आगे — नदी के ऊपर आसमान में आतिशबाज़ी छूटने लगती है। नाव पर बैठकर देखने वाले को पूरा नगर-क्षितिज एक साथ दस लाख बिंदुओं में जगमगाता दिखता है।

दशाश्वमेध घाट पर पुजारियों के हाथों में धधकते दीप और गंगा आरती

देखने की सबसे अच्छी जगहें

आप देव दीपावली कहाँ से देखते हैं — इसी से पूरा अनुभव बदल जाता है। बेहतरी के क्रम में कुछ विकल्प:

1. गंगा की नाव से (सबसे बेहतर) — यही असली देव दीपावली है। नाव से आपको पूरे छह किलोमीटर लंबे तट का एक साथ दृश्य मिलता है, और पानी पर दस लाख दीयों का प्रतिबिंब — ऐसी चीज़ जिसे कोई भी तस्वीर पूरी तरह नहीं पकड़ पाती। नाव कम-से-कम दो-तीन दिन पहले बुक कर लें — उस रात दाम तीन से पाँच गुना तक बढ़ जाते हैं।

2. दशाश्वमेध घाट (मुख्य आरती के लिए) — यहीं से पूरा आयोजन शुरू होता है। जगह पाने के लिए शाम 4 बजे तक पहुँच जाइए। भीड़ भयानक होगी, पर ऊर्जा बिजली-सी।

3. पंचगंगा घाट (तस्वीरों के लिए) — यहाँ सबसे ऊँची सीढ़ियाँ हैं, इसलिए ऊपर से पूरे घाट-क्रम का विहंगम दृश्य मिलता है। भीड़ दशाश्वमेध से कम होती है, और फ़ोटोग्राफ़रों के बीच यह जगह बहुत लोकप्रिय है।

4. असी घाट (परिवारों के लिए) — सबसे दक्षिण का बड़ा घाट, जहाँ उत्सव थोड़ा शांत और पड़ोस-जैसा महसूस होता है। बच्चों या बुज़ुर्गों के साथ आ रहे हैं तो यही उचित है।

व्यावहारिक सुझाव

देव दीपावली पर लाखों लोग आते हैं। इसे बिना तनाव के कैसे जीएँ:

होटल जल्दी बुक करें। घाट के पैदल दायरे के होटल दो-तीन महीने पहले ही भर जाते हैं। जैसे ही पंचांग से तिथि पक्की हो, बुकिंग कर लें।

एक-दो दिन पहले पहुँचें। उत्सव से पहले के दिनों में शहर का मिज़ाज ही बदल जाता है। घाटों पर टहलने, नाव का इंतज़ाम करने और बनारस की अपनी लय में ढलने के लिए समय देना ज़रूरी है।

कपड़े परतों में पहनें। नवंबर की वाराणसी की शामें ठंडी होती हैं (15–20 डिग्री)। हल्की जैकेट या शॉल ज़रूर रखें, ख़ासकर अगर नाव में बैठना है।

सामान कम रखें। घाटों पर भयानक भीड़ होती है। क़ीमती चीज़ें होटल में छोड़ दें। फ़ोन, थोड़े पैसे और एक हल्का झोला — इतना काफ़ी।

फ़ोटोग्राफ़ी का सामान: अगर तस्वीरों की गंभीरता है तो नाव के लिए तिपाई रखिए (पानी पर दीयों के प्रतिबिंब वाली लंबी एक्सपोज़र तस्वीरें ग़ज़ब की आती हैं) और आरती के लिए तेज़ अपर्चर वाला लेंस। कम रोशनी में फ़ोन के कैमरे हाथ-पैर छोड़ देते हैं।

सुनहरी शाम में गंगा पर नावें और घाटों की रोशनी
सुरक्षा की बात: घाटों पर तेल और मोम से सीढ़ियाँ फिसलन भरी हो जाती हैं। अच्छी पकड़ वाले जूते पहनिए। सीढ़ियाँ असमान हैं और कहीं रेलिंग नहीं। सतर्क रहिए, बच्चों के साथ ख़ास तौर पर।

देव दीपावली के लिए वाराणसी कैसे पहुँचें

हवाई जहाज़ से: लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (VNS) घाटों से 25 किमी दूर है। फ़्लाइट काफ़ी पहले बुक कर लें — उत्सव के आसपास दाम ऊपर चढ़ते हैं।

रेल से: वाराणसी जंक्शन (BSB) और वाराणसी सिटी (BCY) मुख्य स्टेशन हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से रोज़ गाड़ियाँ चलती हैं। पक्की बर्थ के लिए दो-तीन महीने पहले बुकिंग कराएँ।

सड़क से: वाराणसी राजमार्गों से अच्छी तरह जुड़ा है। लखनऊ (300 किमी, क़रीब 6 घंटे), प्रयागराज (120 किमी, क़रीब 3 घंटे), पटना (290 किमी, क़रीब 6 घंटे)।

देव दीपावली क्यों ज़रूर देखें

उत्सव तो बहुत हैं, और फिर देव दीपावली है। कोई तस्वीर, कोई वीडियो आपको इसके पैमाने के लिए तैयार नहीं कर सकती — एक पूरा पुरातन नगर दस लाख छोटी-छोटी लपटों से जगमगाता हुआ, उनका प्रतिबिंब दुनिया की सबसे पवित्र नदी में काँपता हुआ, और हज़ारों साल से गाए जा रहे मंत्रों की ध्वनि हवा में तैरती हुई।

अगर आप जीवन में बस एक बार वाराणसी आ सकते हैं, तो कोशिश कीजिए कि वह रात देव दीपावली की हो। यह भारत का सबसे असाधारण दृश्य-उत्सव है — और पूरी धरती पर शायद इसकी कोई तुलना नहीं।

24 नवंबर 2026 को वहाँ रहने की योजना है? नावें हफ़्तों पहले बुक हो जाती हैं। तिथि, नाव के विकल्प और बाज़ार भाव के लिए हमारी देव दीपावली 2026 नाव बुकिंग मार्गदर्शिका देखें, या पूरी काशी यात्रा में इस रात को शामिल करें — दर्शन, भोर की नौका यात्रा और दीपों की रात, एक ही योजना में।

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