The tradition
About This Yatra
द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा शैव परंपरा की सर्वोच्च तीर्थयात्रा है — भारत भर में बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों की यात्रा, बारह स्थान जहाँ शिव ने ब्रह्मा और विष्णु को अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए प्रकाश के स्तंभ के रूप में प्रकट होने की कथा है।
बारह महाद्वीप भर में फैले हैं — यहाँ द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र के क्रम में: सोमनाथ (गुजरात), मल्लिकार्जुन (आंध्र), महाकालेश्वर (उज्जैन), ओंकारेश्वर (नर्मदा द्वीप), वैद्यनाथ (झारखंड), भीमाशंकर (सह्याद्रि), रामेश्वरम (तमिलनाडु), नागेश्वर (गुजरात), काशी विश्वनाथ (वाराणसी), त्र्यंबकेश्वर (नाशिक), केदारनाथ (हिमालय, 3,583 मीटर), और घृष्णेश्वर (औरंगाबाद)।
बहुत कम तीर्थयात्री एक ही यात्रा में बारहों पूर्ण करते हैं। अधिकांश वर्षों, कभी-कभी दशकों में चरणों में करते हैं। परंपरा कहती है कि बारहों पूर्ण करना संपूर्ण यात्रा प्रदान करता है।
Why this route
Spiritual Significance
ज्योतिर्लिंग ब्रह्मा और विष्णु के बीच के विवाद से उत्पन्न हुए। शिव उनके बीच अनंत प्रकाश के स्तंभ — ज्योति — के रूप में प्रकट हुए। न तो कोई उसके सिरे ढूँढ सका। शिव ने फिर उन स्तंभों में से बारह को भारत भर में स्थायी तीर्थ के रूप में प्रकट किया।
प्रत्येक ज्योतिर्लिंग शिव के भिन्न पहलू को दर्शाता है — सोमनाथ — सोम अर्थात चंद्रमा के स्वामी, जिन्होंने दक्ष के क्षय-शाप से मुक्ति के लिए यहाँ शिव की आराधना की; महाकाल समय के स्वामी; रामेश्वर वह जहाँ राम ने स्वयं स्थापित किया; काशी विश्वनाथ ब्रह्मांड के स्वामी; केदारनाथ हिमालयी शिव।
बारहों पूर्ण करना चेकलिस्ट नहीं है। यह भारतीय भू-दृश्य के माध्यम से शिव की संपूर्ण ब्रह्मांडविज्ञान का पार करना है।











